अनुनाद

जिन नदियों को पृथ्वी पर जगह न मिली उन्होंने चुन लिया मनुष्य की आँखों में रहना!/ज्योतिकृष्ण वर्मा की कविताएं

ज्‍योतिकृष्‍ण वर्मा की ये कविताएं आकार में छोटी और कहन में बड़ी हैं। हमारे आस-पास के रूपकों को बरतते हुए वे आख्‍यान के रूप में पाठकों के सामने आती हैं। अनुनाद पर ज्‍योति……. की कविताओं का यह प्रथम प्रकाशन है, उनका यहां स्‍वागत है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               -अनुनाद         

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आशियाना

मजदूर

खुली आँखों से

तुम्हारे लिए

बंद आँखों में

अपने लिए

बनाते हैं

घर!

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इच्छा

एक

बिछौना

देना चाहता हूँ

तुम्हें

कुछ देर

तुम भी

आराम कर लो

मृत्यु!

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तान

मैं

अपने

दुख

सौंप देना चाहता हूँ

मधुर तान वाली

किसी

बाँसुरी को!

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जो लिखा नहीं

डायरी लिखते हुए

वह लिखती है सब

पर छोड़ देती है

कुछ बातें

जान-बूझकर

चाहती है

कि रहें कुछ बातें

शेष

सिर्फ़ उसकी स्मृतियों में।

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विकल्प

जिन

नदियों को

पृथ्वी पर

जगह न मिली

उन्होंने

चुन लिया

मनुष्य की

आँखों में

रहना!

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संकल्प

मेरे शहर में

आ जाए

चहचहाती गौरैय्या

मैं हटा दूँगा 

गेट पर टंगा बोर्ड –

किराये के लिये मकान खाली है”

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राहगीर

ऐ समंदर

दुनिया भर का

ख़ज़ाना तो है तुम्हारे पास

फिर क्या ढूँढती है

लहरें तुम्हारी

दिन-रात

इधर से उधर

क्यों रहते हो तुम

इतने अशांत?

आख़िर किसकी तलाश है तुम्हें?

समंदर ने कहा

उदास होकर

कि आज फिर

एक थका-हारा

प्यास से तड़पता राहगीर

चला गया

इधर से

दो घूँट

पानी की तलाश में।

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ओढ़नी

सूरज ने

ठिठुर कर

जम गए पानी को

ओढ़ा दी

धूप

पहाड़ से

हौलेहौले

बह निकली

नदी!

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निशान

मैं

रेत पर

गिरवी

रख आया था

पैरों के

निशान

रात 

बेईमान हो गईं

समंदर की

लहरें!

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बहुत पहले

यह

तब की बात है

जब मनुष्य

लिखता नहीं था

कविता

इतिहासकारों ने

इसीलिए शायद 

नाम दिया उसे

पाषाण-युग!

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बनते-बिगड़ते

उसके

घर बनाने से

खोखला होता है

घर

किसी और का

लगता है

लांछन यही

जहाँ-तहाँ

बनाती है घर

दीमक!

***

 

ज्योतिकृष्ण वर्मा

प्रकाशन :

“खुले आकाश में” (कविता-संग्रह)

“मीठे पानी की मटकियाँ” (कविता-संग्रह)

कविताएं, कहानियां तथा लेख – वागर्थ, हंस, परिंदे, नया ज्ञानोदय, कृति बहुमत, पाखी, विपाशा, आजकल, मधुमती, सरस्वती, समकालीन भारतीय साहित्य, परिकथा, प्रश्नचिन्ह, माटी, व्यंग यात्रा, वाचन, नई धारा, मंतव्य, अनुगूँज, अक्षर पर्व, विभोम-स्वर, सृजन कुंज, दोआबा, कविकुंभ, दस्तावेज़, युद्धरत आम आदमी, साक्षात्कार, अलाव, कथन, गौरवशाली भारत, संवदिया, हिंदी जगत, बालवाटिका, प्रतिमान (पंजाबी), जागती जोत (राजस्थानी), नंदन, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान टाइम्स, पंजाब केसरी, कुबेर टाइम्स तथा अन्य प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। वेब पोर्टल ‘हिन्दवी’ तथा ‘हिन्दीनेस्ट’ पर भी कविताएं प्रकाशित तथा कई कविता संकलनों में शामिल। इसके अतिरिक्त कई कविताओं का असमिया, अंग्रेजी, कन्नड़, मराठी, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, राजस्थानी और तेलुगु में अनुवाद और प्रकाशन।

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