
जल, जंगल और ज़मीन का स्वर : कमल जीत चौधरी की कविता में पर्यावरणीय चेतना/बलवान सिंह
सारांश : कमल जीत चौधरी की कविताओं में जल, जंगल और ज़मीन के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं,

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धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका, और

मुझे यात्रा संस्मरण बहुत लुभाते हैं। यह, अपने भीतर के उन खाली कोनों को भरने का इलहाम देते हैं, जो भरे

कुबेरनाथ राय और धर्मवीर भारती ने समर्पित कलासाधक को ‘संपाती’ के तुल्य बताया है। सौंदर्य का ऐसा उपासक जो सच्ची कला

ग़ालिब नामवर सिंह के बहुत प्रिय कवि रहे। जिस मिसरे को मैं इस लेख का शीर्षक बना रहा हूं, उसका पहला

‘मृत्यु कविताएँ’ जीवन-विरोधी कविताएँ नहीं हैं – रविभूषण निराला के बाद अरुण देव संभवतः हिन्दी के अकेले कवि हैं, जिन्होंने मरण का

कवियों का दुःख संसार का कठोरतम जीव मुझे कवि समझ में आता है। देसी भाषा में कहूँ तो बिलकुल ‘कठ करेज’।

विजयदेव नारायण साही का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। वह मूलतः कवि थे। यह अलग बात है कि वह हिंदी आलोचना

विज्ञान एक बड़ी सी गेंद है जिसे लपकने के लिए आपके दोनों हाथों की ज़रुरत पड़ती है पर उसे आसमान

रचनाकारों की दुनिया में अमूमन एक वर्ग ऐसा होता है जो किसी रचनाकार के पहले संग्रह को उसके लेखन के शैशवकाल