
ये कैसी हूक सी उठती है ख़ामोशी के सीने से…आत्मा को मथता आर्तनाद/ जगजीत सिंह पर कौशलेन्द्र सिंह का लेख
स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन

स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन

बैजनाथ मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में गोमती नदी के किनारे बसा है, जो अल्मोड़ा से लगभग 70 किमी उत्तर-पश्चिम में

आदमी भले ही खाली हाथ हो उसकी भाषा हमेशा उसके साथ होती है। आज से कई साल पहले जब हमारे बड़े-बुजुर्ग,

जांठि को घुङुर, कै थें कूनूं दुखि-सुखि, को दिलो हुंङुर। (लाठी का घुंघरु (बजता है) मैं किससे कहूं अपने सुख-दु:ख, कौन

अछ्यान मी कैं बड़ै सोच पड़ि रूनान। पैली ले कभतै सोचनै छ्युं कि हमरि बोलि क्यै नटी उंणै। हमि आपणि दुदबोलि


इस बार तो कंग्डाली भाम देखने जाना ही है आखिर इतनी बातें जो सुनी हैं इसके बारे में और फिर

पाश्चात्य ज्ञान मीमांसा मुख्य रूप से सामाजिक परिदृश्य तथा प्राकृतिक क्षेत्र के मध्य विरोध पर आधारित है।1 ऐसा विरोध पारिस्थितिक परिप्रेक्ष्य

जब मनुष्य घर के पास नहीं होता तो कोई न कोई कारण देकर घर उसे अपने पास बुला लेता है और
“ पंडित शाङ्ग॔देव द्वारा वर्णित उत्तम वाग्गेयकार के रूप में पंडित कुमार गन्धर्व का स्थान ” १३ वीं शताब्दी