अनुनाद

जल, जंगल और ज़मीन का स्वर: कमल जीत चौधरी की कविता में पर्यावरणीय चेतना/बलवान सिंह

सारांश :

    कमल जीत चौधरी की कविताओं में जल, जंगल और ज़मीन के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं, जो हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रश्नों को सामने लाते हैं। उनकी रचनाओं में प्रकृति केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं है, बल्कि जीवन, संघर्ष और अस्तित्व का आधार भी है। आदिवासी, किसान, मज़दूर और स्त्री—सभी को प्रकृति से गहरे जुड़ा हुआ दिखाया गया है। चौधरी की कविताएँ यह उजागर करती हैं कि लालच और उपभोक्तावादी प्रवृत्तियाँ कैसे जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही हैं, जंगलों की कटाई कर रही हैं और ज़मीन को बेगाना बना रही हैं। कवि ने प्रकृति के शोषण, विस्थापन और उसके दुष्परिणामों को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करते हुए पर्यावरणीय चेतना को एक सामाजिक और मानवीय सरोकार के रूप में स्थापित किया है। इस प्रकार उनकी कविताएँ केवल साहित्यिक सृजन न होकर एक चेतावनी और भविष्य के लिए संदेश भी हैं कि यदि जल, जंगल और ज़मीन सुरक्षित नहीं रहेंगे तो मानव सभ्यता का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।

 

मुख्य शब्द :

पर्यावरणीय चेतना,  जल, जंगल और ज़मीन, शोषण और विस्थापनआदिवासी और किसान जीवन, सामाजिक सरोकार

 

भारत की पारंपरिक जीवन पद्धति में प्रकृति देवतुल्य रही है। जल, जंगल और ज़मीन जीवन के मूल तत्व हैं। लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति और अंधाधुंध विकास की दौड़ ने इन संसाधनों का विनाश आरंभ किया है। कमलजीत चौधरी की कविताएँ इस संकट की प्रत्यक्ष गवाही देती हैं।

कमल जीत चौधरी हिन्दी के सुपरिचित कवि-लेखक-अनुवादक व संपादक हैं। लगभग साठ हिन्दी पत्रिकाओं, दस साझा संकलनों व आठ कविता-विशेषांकों में इनकी कविताएँ, आलेख, अनुवाद और लघु कथाएँ प्रकाशित हुई हैं। इनके दो कविता संग्रह – ‘हिन्दी का नमक’ (2016), ‘दुनिया का अंतिम घोषणापत्र’ (2022) प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने जम्मू-कश्मीर की प्रतिनिधि कविता पर एक किताब, ‘मुझे आई डी कार्ड दिलाओ’ (2018) का संपादन भी किया है। इसके अलावा इनकी चुनिन्दा कविताओं का एक चयन भी शाया है।

इन दिनों ‘पहली बार’ पत्रिका के लिए ‘परांस’ शीर्षक से एक मासिक स्तम्भ लिख रहे हैं, जिसमें जम्मू-कश्मीर की कविताई को संपादित व रेखांकित कर रहे हैं। इनकी कविताई को प्रतिष्ठित ‘अनुनाद सम्मान’(2016) और ‘पाखी: शब्द साधक सम्मान’ (2019) से सम्मानित किया गया है। इनकी कविताओं के अनुवाद उड़िया, बंगला, मराठी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में हुए हैं। इसके अलावा इन्होंने डोगरी की दर्जनों कविताओं का हिन्दी अनुवाद किया है, जो विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ है।

कमलजीत चौधरी समकालीन हिंदी कविता के एक सजग और संवेदनशील स्वर हैं। उनका काव्य संसार सामाजिक, राजनीतिक और पारिस्थितिक विषयों से गहराई से जुड़ा है। वे विशेष रूप से वंचितों, स्त्रियों, बेरोज़गार युवाओं,  किसानों की पीड़ा और प्रकृति के प्रति अपने लगाव को अपनी कविताओं में स्वर देते हैं।

पर्यावरण-विमर्श साहित्य में एक सशक्त प्रवृत्ति बन चुकी है। यह केवल पर्यावरणीय संकट की पहचान ही नहीं करता, बल्कि समाधान के रूप में वैकल्पिक जीवन दृष्टि भी प्रस्तावित करता है। कमलजीत चौधरी की कविताओं में यह विमर्श स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

कमल जीत की ‘अश्वमेधी घोड़ा’ कविता एक तीव्र पर्यावरणीय चेतना को अभिव्यक्त करती है। कवि ने जल, जंगल और ज़मीन के साथ मनुष्य के शोषणकारी संबंध को उजागर किया है और बताया है कि मनुष्य की अंधाधुंध भौतिक इच्छाएँ प्रकृति को विनाश की ओर धकेल रही हैं। मनुष्य ने पेड़ की मौलिक देन- शुद्ध वायु को नज़रअंदाज़ कर दिया है। वह वृक्षों को केवल लकड़ी के रूप में देखता है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है।  कविता रेत खनन और नदियों के दोहन की ओर भी संकेत करती है। नदियाँ जो जीवन का स्रोत हैं, उन्हें मनुष्य रेत खनन के कारण नष्ट कर रहा है। नदी का पानी जीवन देता है, किंतु मनुष्य अपनी स्वार्थवृत्ति से उसकी मूल देन को नष्ट कर रहा है। इसका दुष्परिणाम जलसंकट और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में सामने आता है। धरती का उद्देश्य मानव को अन्न और जीवन प्रदान करना है, परंतु आज मनुष्य खनिज पदार्थों, बहुमूल्य पत्थरों और संसाधनों के लिए धरती का अंधाधुंध दोहन कर रहा है। यह शोषण खेती योग्य भूमि को बंजर बनाता है और अन्न संकट को जन्म देता है। कवि स्पष्ट करता है कि आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में जीव-जंतु, जलचर और वन्य जीवन बर्बाद हो रहा है। उनके प्राकृतिक आश्रय-स्थल – घोंसले, सीपियाँ, बाम्बी उजाड़ दिए गए हैं। यह न केवल जैव विविधता को नष्ट कर रहा है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को खतरे में डाल रहा है।  कमल जीत स्पष्ट करते हैं कि मानव ने विकास के नाम पर जल, जंगल और ज़मीन से युद्ध छेड़ दिया है। यह युद्ध मानवता के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रहा है क्योंकि यह उसी आधार को नष्ट कर रहा है, जिस पर जीवन टिका है।

अश्वमेध यज्ञ प्राचीन काल में सत्ता विस्तार का प्रतीक था। कवि ने इसे आधुनिक युग में प्राकृतिक संसाधनों के दमन और दोहन से जोड़ा है। कवि प्रकृति और मानव संबंधों की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जल, जंगल और ज़मीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की आधारशिला हैं। इनके विनाश से मानव सभ्यता का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। कवि की चेतावनी है कि यदि मानव अपनी स्वार्थवृत्ति और विकास की अंधी दौड़ से पीछे नहीं हटा तो उसका तथाकथित अश्वमेधी घोड़ा स्वयं ही जीवनहीन हो जाएगा। कवि का मानना है कि प्रकृति से युद्ध नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का मार्ग ही मानवता को बचा सकता है-

 

“तुम्हें पेड़ से हवा नहीं

लकड़ी चाहिए

नदी से पानी नहीं

रेत चाहिए

धरती से अन्न नहीं

महँगा पत्थर चाहिए

पक्षी, मछली और साँप को भूनकर

घोंसले, सीपी और बाम्बी पर

तुम अत्याधुनिक घर बना रहे हो

पेड़ नदी और पत्थर से

तुमने युद्ध छेड़ दिया है

पाताल धरती और अम्बर से

तुम्हारा यह अश्वमेधी घोड़ा पानी कहाँ पियेगा? [1]

 

जल, जंगल और ज़मीन का भारतीय समाज में गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है। कमल जीत इन प्रतीकों के माध्यम से सांस्कृतिक और जैविक संकट को सामने लाते हैं। इनकी कविताएँ जल संकट के बहुआयामी पहलुओं को उजागर करती हैं। वे नदी को न केवल जीवनदायिनी मानते हैं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और संघर्ष का वाहक भी मानते हैं।

‘बिना दरवाज़े वाले घर से चाँद’ कविता प्रकृति और मानव के सामंजस्यपूर्ण संबंध को उजागर करती है। इसमें पर्यावरणीय चेतना की गहरी अनुभूति है। नदियों को जीवन का स्रोत मानते हुए कवि इस बात का संकेत करता हैं कि नदियाँ केवल भौतिक जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि लोगों की सांसों में, गीतों में और संस्कृति में जीवित रहती हैं। नदियों के साथ यह आत्मीय रिश्ता बताता है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई दूरी नहीं है। जल प्राप्ति केवल यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रक्रिया है। यह बताता है कि जहाँ प्रकृति के साथ आत्मीय जुड़ाव होता है, वहाँ उसका दोहन नहीं बल्कि सम्मान होता है। गीत गाना – श्रद्धा, आभार और सह-अस्तित्व का प्रतीक है। कवि स्पष्ट करते हैं कि जब मानव और प्रकृति का संबंध सामंजस्यपूर्ण होता है, तब जलस्रोत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। यह प्राकृतिक संतुलन का परिणाम है। प्रकृति से जुड़ाव और सम्मान की भावना जल-संपदा को सुरक्षित रखती है। आधुनिक समय में जहाँ नदियाँ प्रदूषित और सूखती जा रही हैं, वहाँ यह कविता स्मरण दिलाती है कि यदि हम नदियों को केवल संसाधन मानेंगे तो वे समाप्त हो जाएँगी। यदि हम उन्हें गीतों, संस्कृति और जीवन का अंग बनाएँगे, तो वे सदैव हमें लबालब जीवनदायी जल देती रहेंगी। कवि ने स्पष्ट किया है कि प्रकृति विशेषतः जल और नदियाँ केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग है। कवि की पर्यावरणीय चेतना यह सिखाती है कि मनुष्य को प्रकृति के साथ श्रद्धा, संवेदनशीलता और सामंजस्य के साथ जीवन-यापन करना चाहिए –

 

वहाँ नदियाँ

कंठ में खेलती हैं

पानी की ज़रूरत पड़ने पर

लोग गीत गाते हैं

घड़े लबालब भर जाते हैं” [2]

 

कवि ने प्रकृति पर मानव के एकाधिकार की प्रवृत्ति को उजागर किया है। मनुष्य प्रकृति का भरपूर उपयोग करता है। वह नदी से अपने जीवन, व्यापार और सुख-सुविधा का साधन लेता रहा और नदी का उदार स्वभाव उसे सबकुछ देता रहा। यह स्वाभाविक सह-अस्तित्व का रूप है। किंतु जब मानव का स्वार्थ पूरा हो जाता है, तो वह प्रकृति को बाधित, अवरुद्ध और नष्ट करने लगता है। यह  संसाधनों पर नियंत्रण और दूसरों को वंचित करने की मानसिकता को दर्शाता है। सत्ता और पूंजीवादी ताक़तें प्राकृतिक संसाधनों पर कृत्रिम संकट पैदा करती हैं और फिर उसे अपने हित में इस्तेमाल करती हैं।  कवि यह चेतावनी देता है कि प्रकृति पर एकाधिकार की चेष्टा अंततः मानवता के लिए विनाशकारी है-

 

“मेरे पास एक नदी थी

जिसमें तुम रातभर

नाव खेते रहे जी भर

जब सुबह होने को थी

तुमने नाव में पत्थर भर दिए

अब तुम नदी गहरी है” कहते हो

दूसरों को डराते हो।” [3]

 

वनों की कटाई केवल प्राकृतिक क्षति नहीं है, अपितु यह आदिवासी जीवन, पशु-पक्षियों और जलवायु संतुलन पर सीधा हमला है। आदिवासियों का अस्तित्व जंगल से जुड़ा है। कवि उस सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति का प्रतिकार करते हैं, जहाँ विकास के नाम पर आदिवासियों और ग्रामीणों को उनकी भूमि, जंगल और आजीविका से दूर किया जा रहा है। आदिवासियों को उनके प्राकृतिक आवास, जंगल से बेदख़ल किया जा रहा है। जंगल उनकी पहचान, संस्कृति और जीवन का आधार है। जंगल छोड़ना उनके लिए केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन-शैली, संस्कृति और इतिहास से अलगाव है। सत्ता और विकास की नीतियाँ मूलनिवासियों और ग्रामीणों को जड़ से उखाड़ रही हैं। यह केवल भौगोलिक विस्थापन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक विस्थापन भी है। आदिवासी और ग्रामीण अपनी ज़मीन-जंगल खोकर मजदूर बन जाते हैं, उनकी स्वायत्तता छिन जाती है।

कमल जीत की कविताओं में विस्थापन के ख़‍िलाफ़ एक सशक्त प्रतिरोध है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि विकास किसके लिए हो रहा है और उसकी क़ीमत कौन चुका रहा है। कवि उन स्वरों का प्रतिनिधित्व करता है, जो हाशिए पर हैं और जिन्हें बार-बार उजाड़ा जा रहा है। इस आलोक में कमल जीत की कविताएँ आदिवासी पीड़ा, संघर्ष और विस्थापन को मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं-

 

आदिवासियों से कह रहे हैं

जंगल छोड़ दो

गाँव से कह रहे हैं

गँवई छोड़ दो “ [4]

 

तथाकथित विकास, बड़े- बड़े उद्योगों, खनन, और शहरों के विस्तारीकरण के नाम पर ज़मींन का अँधा-धुंध दोहन किया जा रहा है। इन परिस्तिथियों के कारण उत्पन्न विस्थापन की समस्या को कमलजीत एक त्रासदी के रूप में चित्रित करते हैं। ‘आते हुए लोग’ कविता के माध्यम से कवि ने पर्यावरणीय संकट की भयावह तस्वीर उकेरने का सफल प्रयास किया है-

 

वे पक्षियों से कह रहे हैं

बाग छोड़ दो……

……………

आदिवासियों से कह रहे हैं

जंगल छोड़ दो” [5]

 

कवि हमारे समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और मानवीय समस्या; विस्थापन को बहुत तीखे और मार्मिक ढंग से उजागर करते हैं। पक्षियों का बाग में होना स्वाभाविक है, वे उसके स्वाभाविक निवासी हैं। लेकिन जब ‘वे’ यानी सत्ता, पूँजीपति या तथाकथित विकास के ठेकेदार पक्षियों से कहते हैं कि बाग छोड़ दो, तो इसका अर्थ है कि प्रकृति का प्राकृतिक संतुलन तोड़ा जा रहा है। यहाँ कवि औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और विकास परियोजनाओं के कारण प्राकृतिक आवासों के विनाश की ओर संकेत  करते  हैं  और  विस्थापन  की पीड़ा को स्वर देते हैं। इस प्रकार यह कविता पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक न्याय दोनों को एक साथ स्थापित करती है और हमें यह सिखाती है कि प्रकृति और आदिवासियों के बिना और प्रवासी श्रमिकों के बिना; विकास का कोई भी मॉडल अधूरा, झूठा और अमानवीय है।

महान कृष्णभक्त कवि रसखान ने भी अपनी सभी संभावित अवस्थाओं में – मनुष्य, पशु, पत्थर  और पक्षी – गोकुल की पावन भूमि, यमुना का तट, गोवंश और कदंब वृक्ष के निकट रहने की आकांक्षा व्यक्त की है। यह आकांक्षा केवल आध्यात्मिक प्रेम का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरे लगाव का भी प्रतीक है-

 

मानुस हौं तो वही रसखान,

बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।

जो पसु हौं तो कहा बस मेरो,

चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥

पाहन हौं तो वही गिरि को,

जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धधारन।

जो खग हौं तो बसेरो करौं

मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन”[6]

 

कमल जीत चौधरी की कविताएँ केवल पीड़ा का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि प्रतिरोध की भावना भी जगाती हैं। उनकी कविताएँ बहुत तीखे और गहरे प्रतिरोध का स्वर प्रकट करती हैं। उनमें पर्यावरणीय चेतना और औपनिवेशिकता का विरोध दोनों के स्वर एक साथ दिखाई देते हैं –

 

खेत खेत, शहर शहर,

तुम्हारे बेआवाज़ जहाज़

आसमान फेंक रहे हैं, शक्कर की बोरियाँ

इस देश के जिस्म पर फैल रही है चींटियाँ

छलाँग लगाने के लिए

नदी भी नहीं बची

मिठास के व्यापारी

यह दुनिया मीठी हो सकती है

पर मेरी जीभ तुम्हारा उपनिवेश नहीं हो सकती

यह हिंदी का नामक चाटती है” [7]

 

जब औपनिवेशिक शक्तियाँ या बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी वस्तुएँ थोपती हैं, तो पूरा समाज उपभोक्ता-संस्कृति की ‘चींटियों’ से भर जाता है, जिससे पर्यावरणीय और सांस्कृतिक संतुलन बिगड़ता है। आधुनिकता और उपनिवेशी अर्थनीति ने नदियों को प्रदूषित और नष्ट कर दिया है, जिससे जीवन का सहज प्रवाह समाप्त हो रहा है। औद्योगिक विकास और उपनिवेशी अर्थनीति ने खेत, शहर और नदी तक को नष्ट कर दिया है। यह पर्यावरण चेतना का स्वर है, जो हमें प्रकृति की रक्षा के लिए चेतावनी देता है। औपनिवेशिकता विरोधी स्तर पर कवि उपनिवेशी शक्तियों की थोपी हुई उपभोग-संस्कृति और कृत्रिम मिठास को ठुकराता  है।

चौधरी की कविताएँ हमें बताती हैं कि पर्यावरण का विनाश और औपनिवेशिक उपभोग-नीति आपस में गहरे जुड़े हुए हैं। विदेशी पूँजी और सत्ता न केवल प्रकृति का शोषण करती हैं, बल्कि हमारी संस्कृति और भाषा को भी अपना उपनिवेश बनाना चाहती हैं। कवि दोनों स्तरों पर प्रतिरोध करता है और स्वदेशी अस्मिता तथा पर्यावरणीय संतुलन को बचाने की पुकार करता है।

कमल जीत अपनी कविताओं में न केवल जीव-जंतुओं और प्रकृति को बचाने की बात करते हैं, बल्कि एक सकारात्मक और आशावादी दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करते हैं।

कवि स्पष्ट करते हैं कि पर्यावरण संरक्षण केवल वन्यजीवों या पेड़ों के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कवि एक समग्र और सामूहिक दृष्टिकोण अपनाते हैं, जहाँ आदमी, बाघ, चिड़िया, मछली, घड़ियाल आदि सबको बचाना ज़रूरी है। यहाँ आशा की झलक मिलती है कि यदि मनुष्य प्रयास करे तो प्रकृति के सभी अंग साथ रह सकते हैं। इनकी क्रोध का पेड़ कविता में सभी के लिए जगह है। यह कविता कबीर के दोहे, साईं के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोऊ से आगे की कविता है। यहाँ कवि का स्वर समतावादी और आक्रामक हो जाता है। वह केवल संरक्षण की बात नहीं करते, बल्कि सक्रिय प्रतिरोध की बात भी करते हैं। कवि मानते हैं कि पेड़ों को बचाने के लिए केवल भावुकता नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और संघर्षशील रवैया अपनाना पड़ेगा। ‘क्रोध का पेड़’ एक सशक्त प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि न्यायपूर्ण क्रोध भी एक सकारात्मक ऊर्जा बन सकता है, यदि वह विनाश के विरुद्ध और संरक्षण के पक्ष में प्रयोग हो। कवि स्पष्ट करते हैं कि यह संघर्ष किसी राष्ट्र, धर्म या वैचारिक शत्रु के ख़‍िलाफ़ नहीं है। यहाँ कवि यह बताना चाहते हैं कि पर्यावरण का सवाल मानवता का प्रश्न है, न कि राजनीति का। यह सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। यह कविता पर्यावरणीय संकट के युग में एक संघर्षशील घोषणापत्र की तरह है। इसमें एक ओर आशा, समरसता और सह-अस्तित्व की भावना है, तो दूसरी ओर संघर्ष, प्रतिरोध और क्रोध की ऊर्जा है। कवि का संदेश स्पष्ट है कि यदि हमें अपने अस्तित्व को बचाना है तो हमें केवल पेड़ों की रक्षा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाने की लड़ाई लड़नी होगी। यह कविता पर्यावरणीय आंदोलनों को एक वैचारिक शक्ति देती है और हमें बताती है कि संरक्षण केवल भावुकता से नहीं, बल्कि संगठित, साहसिक और संघर्षपूर्ण प्रयासों से संभव है-

 

“आदमी बचाना है

बाघ बचाना है

चिड़िया बचानी है बाज बचाना है

मछली बचानी है घड़ियाल बचाना है

शेर और बकरी को

एक ही घाट से पानी पि‍लाना है

किसी दुश्मन देश के लिए नहीं

किसी ग़ैर धर्म के लिए नहीं

दो कप चाय और एक

निग्घी झप्पी के लिए हमें क्रोध से,

पूरे क्रोध से, कुल्हाड़ी कंधे पर रखकर

पेड़ के लिए बचाना है

क्रोध का पेड़ ” [8]

 

कमल जीत चौधरी की ‘विश्वास’ नामक कविता पर्यावरण संरक्षण के प्रति आशा की लौ की तरह दिखती है-

 

कवि ने कहा

बची रहे घास

एक आस

घास ने कहा

बची रहे कविता

सब बचा रहेगा” [9]

 

चौधरी की यह कविता छोटी होते हुए भी अपने भीतर गहन पर्यावरणीय संदेश समेटे हुए है। इसमें कवि और घास के बीच का संवाद प्रतीकात्मक है। कवि की आकांक्षा है कि घास, यानी प्रकृति का सबसे साधारण और आधारभूत रूप, बचा रहना चाहिए। घास सिर्फ़ एक पौधा नहीं, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र- पशुओं का भोजन, मिट्टी की नमी का संरक्षण, हवा की शुद्धि और जीवन की निरंतरता का आधार है। यदि घास बची रहेगी तो जीवन का आधार भी बचा रहेगा।

यहाँ घास स्वयं बोल उठती है। उसका कथन यह है कि यदि कविता बचेगी अर्थात् संवेदना, कल्पना, मानवीय करुणा और रचनात्मक दृष्टि बची रहेगी, तो मनुष्य प्रकृति को नष्ट नहीं करेगा, क्योंकि कविता इंसान के भीतर जीवन के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता जगाती है। जब संवेदनशीलता बची रहती है, तब केवल घास ही नहीं, बल्कि जंगल, नदियाँ, पशु-पक्षी, धरती और पूरा जीवन बचा रहता है। कवि का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल वैज्ञानिक योजनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह संवेदना और संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है। घास साधारण होते हुए भी जीवन-चक्र का मूल आधार है। इसका बचना ही पर्यावरणीय संतुलन का प्रतीक है। कवि यहाँ यह संकेत दे रहा है कि तकनीकी प्रगति के बीच यदि मनुष्य की कवितामयी दृष्टि और करुणा सुरक्षित नहीं रही, तो पर्यावरण भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। यदि हम अपने भीतर की संवेदनशीलता को जीवित रखें, तो पर्यावरण संरक्षण की संभावना बहुत प्रबल है, क्योंकि तब मनुष्य स्वार्थ और लालच से ऊपर उठकर प्रकृति को साझी धरोहर मानकर उसका सम्मान करेगा।

कमल जीत की कविताएँ मात्र पर्यावरणीय संकट की बात ही नहीं करतीं, बल्कि संभावनाओं के द्वार भी खोलती हैं। जल, जंगल, ज़मीन की पुनर्स्थापना, सामुदायिक साझेदारी और लोकज्ञान को महत्व देने की बात करती है। कवि नई पीढी़ को आश्वस्त कर रहा है कि वे अपने पेड़ों पर, अपनी भूमि पर और अपनी मेहनत पर विश्वास बनाए रखें-

 

पिता!

इनको इतराने दो

उगाई हुई घास पर

यह घमंड खोखला है

घास तो

सींगों और खुरों की है

सींग और खुर हमारे हैं

घास हमारी है.…… … … … ..

पिता!

तुम अपने आम के पेड़ों पर विश्वास रखो/

जिनके हाथों में बूर है

चेहरों में नूर है

जड़ों में अपने खेत की मिट्टी है

मिट्टी!

वही जिससे तंदूर की भट्ठी है

उस मिट्टी के तुम मालिक हो

तुम गरीब नहीं अन्नदाता हो।[10]

 

कवि का विश्वास है कि मनुष्य का सौंदर्य और उसका नैतिक बल उसकी भूमि और वृक्षों से जुड़ा हुआ है। कवि मिट्टी की महत्ता को बार-बार रेखांकित करता है। कमलजीत हमें याद दिलाते हैं कि हमारी रोटी, हमारा अन्न, हमारा जीवन उसी मिट्टी से उपजता है। इस तरह कवि प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदात्री के रूप में देखता है। समाज अक्सर किसान को गरीब कहकर उसकी पहचान को दीन-हीन बना देता है, परंतु कवि किसान के महत्व और मानव सभ्यता में उसके योगदान को प्रतिपादित करते हुए कहता है कि किसान अन्नदाता और जीवनदाता है।

कमल जीत की पर्यावरण संबंधी कविताओं में आशा और विश्वास की लय है। यहाँ कोई निराशा नहीं, कोई विलाप नहीं, बल्कि प्रकृति पर भरोसा और आत्मगौरव का संदेश है। पर्यावरण संबंधी उनकी कविताएँ आश्वस्त करती हैं कि यदि हम अपनी भूमि, अपने पेड़-पौधों और अपनी मिट्टी से जुड़े रहें, तो जीवन में संकट चाहे जितने हों, पुनः उर्वरता और समृद्धि संभव है। कवि का सबसे बड़ा पर्यावरणीय सरोकार यही है कि मनुष्य को अपनी जड़ों, खेतों, मिट्टी और पेड़ों पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। यह विश्वास केवल खेती का नहीं, बल्कि पर्यावरण-संरक्षण का विश्वास है। यदि हम अपने खेत बचाएँगे, अपने पेड़ बचाएँगे, नये पेड़ लगाएँगे और मिट्टी को सुरक्षित रखेंगे, तो हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवन सुरक्षित कर पाएँगे।

इस संदर्भ में प्रख्यात कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की प्रसिद्ध कविता ‘मिट्टी की महिमा’ का यह अंश कितना सार्थक है-

 

आँधी आए तो उड़ जाए

पानी बरसे तो गल जाए

फसलें उगती, फसलें कटती

लेकिन धरती चिर उर्वर है

सौ बार बने, सौ बार मिटे

लेकिन मिट्टी अविनश्वर् है

मिट्टी गल जाती पर उसका

विश्वास अमर हो जाता है।[11]

 

पर्यावरण का संरक्षण मात्र प्राकृतिक संसाधन बचाने का कार्य नहीं, बल्कि यह जीवन बचाने का सामूहिक दायित्व है। प्रकृति के विभिन्न अंग यथा- पानी, जंगल और ज़मीन मात्र भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि मानव संस्कृति और जीवन के प्रतीक हैं। कवि समाज से आह्वान कर रहा है कि हमें पर्यावरण को लेकर सामूहिक जागरूकता पैदा करनी होगी। कवि स्पष्ट करता है कि पर्यावरणीय संकट के इस दौर में लापरवाही या निष्क्रियता घातक होगी। कवि हमें सक्रियता और सजगता के लिए प्रेरित करते हैं कि प्रयास से समाधान मिल सकता है।

कवि पाठक को विश्वास दिलाते हैं कि संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता है। पर्यावरणीय संकट का समाधान केवल निराशा और शोक में नहीं, बल्कि सामूहिक जागरूकता, संघर्ष और सतत प्रयास में है। जल को जीवन का प्रतीक मानते हुए कमलजीत यह विश्वास दिलाते हैं कि यदि समाज जागेगा और एकजुट होकर प्रयास करेगा तो जलसंकट पर विजय पाई जा सकती है-

 

“बन्ने/पानी का गीत गाना

सामूहिक विश्वास का गीत गाना

यह जागने का समय है

कहीं सो मत जाना

बेटा, सैकड़ों सूरज फर्लान्ग कर भी

पानी तलाश लाना…

माँ!! इंतज़ार करना।[12]

 

यह कविता पर्यावरणीय चेतना का उत्सव है, जो हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है और प्रेरित करती है कि हम अपने प्रयासों से धरती को फिर से हरी-भरी बना सकते हैं।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कमलजीत चौधरी की कविताएँ जल, जंगल और ज़मीन के त्रिकोणीय संबंध को गहराई से समझने और संवेदनशील बनाने का कार्य करती हैं। उनके काव्य में प्रकृति केवल दृश्य-सुख का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार और अस्तित्व का अविभाज्य हिस्सा बनकर उपस्थित होती है। वे हमें यह स्मरण कराती हैं कि जल, जंगल और ज़मीन का संरक्षण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक न्याय से जुड़ा हुआ प्रश्न है। उनकी कविताओं का स्वर चेतावनी से भरा हुआ है और इसके साथ ही समाधान का मार्ग भी सुझाता है। उनकी कविताएँ सामूहिक संघर्ष, संवेदनशीलता और संतुलित जीवन-शैली अपनाने का आह्वान करती हैं। इस शोध पत्र के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कमलजीत चौधरी की कविताएँ पर्यावरणीय विमर्श को मानवीय सरोकारों से जोड़ती हैं। उनका काव्य आज के वैश्विक पर्यावरणीय संकट में न केवल प्रासंगिक है, बल्कि एक वैचारिक दिशा-निर्देशक के रूप में भी कार्य करता है। कमल जीत चौधरी की कविताएँ एक प्रकार का पर्यावरणीय दस्तावेज़ हैं।

 

संदर्भ सूची

  1. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 40
  2. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 4
  3. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 33
  4. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 112
  5. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 112
  6. संपादक डॉ. दशरथ ओझा – काव्य-वाटिका, राजपाल एंड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 19
  7. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 77
  8. कमल जीत चौधरी – दुनिया का अंतिम घोषणापत्र- पृष्ठ संख्या- 40
  9. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 42
  10. कमल जीत चौधरी – हिंदी का नमक, दखल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 61-62
  11. संपादक डॉ. दशरथ ओझा – काव्य-वाटिका, राजपाल एंड संंस, कश्मीरी गेट, दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 82
  12. कमल जीत चौधरी – दुनिया का अंतिम घोषणापत्र- पृष्ठ संख्या- 20

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परिचय

बलवान सिंह

सहआचार्य, 

राजकीय शिक्षा महाविद्यालय, जम्मू

फोननं. 7006319766

ईमेल: balwansingh494@gmail.com

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