
नेत्रसिंह रावत की इस पुस्तक से पहला परिचय 1992 में हुआ, यानी इसके प्रकाशन के लगभग दस वर्ष बाद और मेरी ख़ुद की उम्र तब 18 थी। जिन्होंने परिचय कराया उनकी उम्र 81 और नाम नागार्जुन। रामनगर प्रवास के दौरान उनके झोले में यह पुस्तक थी और कभी-कभी मैग्नीफाइंग ग्लास के सहारे वे इसे पढ़ते थे, तो मैंने पढ़कर सुनाने का प्रस्ताव रखा, जो उनसे अधिक मेरे लिए हितकारी साबित हुआ। पंकज बिष्ट की भूमिका के दो पन्ने के बाद बोले, “इसे छोड़कर मूल पर आओ और आराम से ठहर-ठहर कर सुनाओ।” तो ये सत्तर पृष्ठ क़रीब सात दिन चले। बीच में कुमाउनी के शब्द थे, जिनमें से कुछ से मैं परिचित था, कुछ से नहीं, सो बाबा को बताने के लिए पहले ही मकान मालकिन आंटी जी से उनके अर्थ पूछ लेता। यह पुस्तक मेरे साथ चली और अंतस् में कहीं घर कर गई। यह मुझे बार-बार तब मेरे छूटे हुए गाँव नौगाँवखाल तक ले गई।
मैं गाँव में पला-बढ़ा, बिगड़ा-सँवरा किशोर था और आगे जीवन अपने विकट और क्रूर रूप में खड़ा था। नेटिविटी का सवाल सबसे अधिक तंग करता था। मेरा परिवार सतपुड़ा की तलहटी से माइग्रेट होकर शिवालिक पर आया था और मेरी आँखें शिवालिक पर खुलीं, मेरी साँसें बाँज और चीड़ की हवाओं से सधीं। मेरा शरीर गाय चराते, दाय रिंगाते, पहाड़ी बटियों पर आते-जाते, सीढ़ीदार खेतों में खेलते-खाते विकसित हुआ। पत्थर और पानी शिवालिक पर भी दो बड़ी चीज़ें थीं। नौलों का पानी, गधेरों का पानी पहले गाड़ में मिलता और वहाँ से नयार कहाई गई नदी में मिलता। बारिशों से पहले रास्तों की मरम्मत के लिए मज़बूत पत्थरों की ज़रूरत होती, जिन्हें हम कंधों पर ढोकर लाते और बटियों के भिड़ों (Retaining Wall) में लगाते थे। यही मेरी कुल नेटिविटी थी, जिसे लेकर मैं रामनगर नाम के उस क़स्बे में था, जहाँ पत्थरों पर बहती कोसी नदी थी और साथ में हिन्दी का हठी बूढ़ा कवि, जिसकी बिहार में कोई दूसरी ही कोसी थी। इन दो कोसियों को लेकर हम कभी आपस में भिड़ भी जाते।
आज भी यही मेरी नेटिविटी है और इस उम्र तक आते-आते मुझे इलहाम हुआ कि जिसे सब प्रकृति भर कहते और सराहते हैं, वह दरअसल एक समूची भू-सांस्कृतिक संरचना (Geo-cultural Structure) है, जिससे मनुष्य की पूरी विकास-यात्रा जुड़ी है। मुझे नौगाँवखाल में ताऊ जी के वैदिक-यज्ञ याद आते, जहाँ वृक्ष, अग्नि, वायु, जल, वनस्पति, औषधि, सोम, पर्वत, नदी से लेकर सूरज-चाँद, नक्षत्र, अंतरिक्ष तक सब देवता हैं। यही वह सांस्कृतिक परिदृश्य था, जिसे अब मैं भू-सांस्कृतिक जान रहा था। दुनिया भर की प्राचीनतम सभ्यताएँ भी नदी-घाटी सभ्यताएँ हैं, आर्यों के आरम्भिक समूह पशुचारक अन्वेषी समूह हैं। भारत में उत्तर के हिमाल से मैदान को उतरतीं गंगा-जमुना के उर्वर कछार, उनके डेल्टा, उनके किनारे विकसित हुई संस्कृतियाँ। पंचनदों का पंजाब और उससे निकटस्थ जुड़ा कश्मीर। सिंधु और उसकी घाटियाँ। दक्षिण की कृष्णा, कावेरी, गोदावरी। पूर्व की ब्रह्मपुत्र। मध्य की नर्मदा, सोन, चम्बल। सघन जंगल, समृद्ध खेतियाँ, मेहनतकश लोग—सब जैसे एक विराट संरचना का अंश नज़र आते। राजे-रजवाड़े तो इस महान-आख्यान की अन्तर्कथाएँ भर थे। बड़े से बड़े साम्राज्य इसी मूलभूत संरचना पर टिके थे। फिर अपनी उम्रों में मैंने विकास की कथाएँ देखीं और देखा भू-सांस्कृतिक संरचनाओं का उस चीज़ में बदल जाना, जिसे पिछले कुछ वर्षों में मैं भू-राजनीतिक संरचना (Geo-political Structure) कहने लगा हूँ—प्रकृति की यह यात्रा अब दु:खद विघटन और विखंडन तक पहुँची। अब हम प्रकृति अथवा किसी भू-सांस्कृतिक संरचना के नहीं, चाहते न चाहते एक पतनशील भू-राजनीतिक संरचना के भीतर रहते हैं।
मिलम हिमनद, जो नेत्रसिंह रावत की यात्रा का गंतव्य था, अब उसके बहुत क़रीब तक सड़क पहुँचने के समाचार हैं। जोहार घाटी की प्राचीन संस्कृति, जो एक समय तक तिब्बत अथवा हूणदेश से व्यापार का केंद्र थी, अब शराबखोर, स्त्री-लोलुप पर्यटकों के निहारने की जगह बनती जाएगी, बल्कि बनती जा रही है। पत्थर और पानी में दो कैमरों के प्रतिबंधित भार से यात्रा अधूरी रह जाने के अफ़सोस से भरे कथाकार और इस पुस्तक के प्रस्तावना-लेखक पंकज बिष्ट के लिए उस इलाक़े में जा पहुँचे फोर बाई फोर व्हील ड्राइव वाहन और बड़े-बड़े कैमरे अब एक ख़बर हो सकते हैं।
केवल हमारा हिमाल नहीं, समूची पृथ्वी ही अब एक जियो-पॉलिटिकल स्ट्रक्चर है, टूटना-बिखरना जिसकी नियति प्रतीत होती है, पर अब प्रकृति को मैं ऐसे ही देख और लिख पाता हूँ। दुनिया में शक्ति-संरचना के आधार पर प्राकृतिक संसाधनों की बंदरबाँट इसका अनिवार्य तत्व है। इसका क्या बनेगा, मुझे नहीं पता। शायद प्रकृति स्वयं तय करेगी कि उसे बदल देने वाली ताक़तों के साथ उसे क्या करना है, शायद वह करने भी लगी है। पहले वह स्वयं ढहेगी और फिर ढहाएगी उस बोझ को, जो उसकी छाती पर रख दिया गया है। एक दिन शायद वह पहले की तरह निर्जन निसर्ग में बदल जाए, कौन जान सकता है। हम अपनी करनी, अपने अपराध और संसार भर में पूँजी और शक्ति की लालसा से भरी सत्ताओं के दुश्चक्र जान सकते हैं।
यह किताब आपको उस संसार में ले जाएगी, जिसे मैंने जियो-कल्चरल स्ट्रक्चर कहा और समय का एब्सर्ड देखिए कि इस छोटी-सी प्रस्तावना में मैं आपको जियो-पॉलिटिकल स्ट्रक्चर की बहस तक ले आया हूँ, जो मेरे लेखे एक ज़रूरी बहस है और इस किताब के संग-साथ की ही देन भी।
अंत में यह कहना अनिवार्य होगा कि यह पुस्तक ‘दिनमान’ नामक उस अमर पत्रिका की देन है, जिसके इतिहास और अवदान पर हिन्दी में अभी ठीक से काम होना बाक़ी है। हिन्दी पत्रकारिता का वह चित्रलिखित-सा दौर अब कल्पना सरीखा लगता है। शायद कभी सम्भावना प्रकाशन ही इस दिशा में कोई पहल करे। श्री अशोक अग्रवाल की खड़ी की हुई यह विरासत अब एक युवा सम्भावना है, जिसे अभिषेक देखते-सम्भालते हैं। अभिषेक को इस पुस्तक के पुनरुज्जीवन के लिए शुक्रिया और आगे के लिए शुभकामनाएँ।
***
‘पत्थर और पानी’ के शीघ्र प्रकाशित संस्करण की भूमिका – संभावना प्रकाशन, हापुड़ ।