
वीरेन डंगवाल को याद करना एक शीतोष्ण ऋतु को याद करना है। न बहुत गर्म, न बहुत ठंडी—एक ऐसी ऋतु जिसमें धूप में बैठने का मन करता है और हवा में थोड़ी देर और ठहर जाने का। नहीं जानता, उनके बारे में क्या और कैसे कहूँ। उनके बारे में लिखने बैठता हूँ तो एक अवसाद, एक सूनापन-सा मन पर छा जाता है। स्मृति में वे जितनी सहजता और आत्मीयता से उपस्थित होते हैं, मृत्यु की वास्तविकता उतनी ही असहज लगती है।
28 सितंबर का वह दिन आज भी किसी गोल-गोल घूमते वायु-चक्रवात की तरह याद आता है, जब सुना था—वीरेन नहीं रहे।
यह स्वीकार करना मेरे लिए आसान नहीं था। अभी दो-तीन सितंबर को ही तो पत्रकार मित्र कुमार मुकुल को मैं उनके घर ले गया था। अपने जीवन के अंतिम दौर में वीरेन मेरे पड़ोसी थे। वे गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स सोसाइटी के एल टावर के 802 नंबर फ्लैट में रहते थे और मैं पी टावर के 1703 में। चार-छह दिनों में उनसे मिलना हो जाता था। उनके घर साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार और पुराने मित्र आते रहते थे। उनके पास जाना किसी कवि से मिलने जाना भर नहीं था; वह जैसे एक जीवंत साहित्यिक चौपाल में प्रवेश करना था।
अब वही पड़ोस सूना-सूना है।
उनके यहाँ बैठने पर कभी मनोहर नायक मिल जाते, कभी मंगलेश डबराल, कभी अशोक भौमिक, कभी शेखर जोशी। मनोहर नायक से मेरी मुलाकात लगभग बत्तीस वर्ष पहले इलाहाबाद में हुई थी, जब मैंने वहाँ नौकरी ज्वाइन की थी। वे अमृत प्रभात में काम करते थे। अशोक भौमिक से भी वहीं, लगभग उतने ही अंतराल के बाद फिर भेंट हुई। सुप्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी से भी वीरेन के घर मुलाक़ात हुई, यद्यपि उनसे एक वर्ष पहले उनके बेटे संजय के यहाँ मिल चुका था। इन सभी से मेरा परिचय इलाहाबाद के दिनों का था। और संयोग देखिए कि वीरेन से भी मेरी पहली मुलाक़ात इलाहाबाद में ही हुई थी।
अक्टूबर या नवंबर, 1983।
जगह अब मुझे याद नहीं थी। स्मृति ने उस स्थान को बहुत पहले अपने किसी अँधेरे कोने में रख दिया था। वीरेन ने ही बाद में याद दिलाया कि वह दरभंगा कॉलोनी का सी. वाई. चिंतामणि मार्ग था, जहाँ वे अपनी ससुराल से आ रहे थे। मेरे साथ सुधी आलोचक सत्यप्रकाश मिश्र भी थे। इलाहाबाद कॉफी हाउस में उसके बाद एकाध मुलाक़ातें हुईं। लेकिन पहली ही मुलाक़ात में ऐसा लगा था, जैसे हम दशकों से एक-दूसरे को जानते हों।
वीरेन का निश्छल स्नेह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में था। वे किसी से औपचारिक ढंग से नहीं मिलते थे। उनके भीतर संबंधों के लिए कोई प्रोटोकॉल नहीं था। वे सामने वाले को तुरंत अपने घेरे में ले लेते थे। शायद इसीलिए वे इतने लोगों के मित्र थे और इतने लोगों के ‘अपने’ थे।
वे सचमुच मित्रों के मित्र थे।
मैंने उन्हें पारंपरिक अर्थों में कभी ‘कवि’ की तरह नहीं देखा। वे अपनी कविताओं की चर्चा बहुत कम करते थे। अपने लिखे हुए को लेकर किसी तरह की आत्ममुग्धता उनमें नहीं थी। उनकी मित्रता उनकी कविता पर भारी पड़ती थी। शायद इसलिए कि वे कवि होने से पहले एक बड़े मनुष्य थे। और यह भी उनकी कविता की ही एक ख़ूबी थी कि कविता ने उन्हें मनुष्य से बड़ा बनने नहीं दिया था।
उनके तीन प्रमुख कविता-संग्रह—इसी दुनिया में, दुश्चक्र में स्रष्टा और स्याही ताल—हिंदी कविता में उनके विशिष्ट स्थान के प्रमाण हैं। इनके अतिरिक्त उनकी अनेक कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी रहीं। उन्होंने विश्व कविता के अनेक महत्वपूर्ण कवियों—पाब्लो नेरूदा, बर्तोल्त ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाज़िम हिकमत—का अपनी विशिष्ट शैली में अनुवाद किया। उनकी अपनी कविताओं के अनुवाद भी बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और उड़िया जैसी भाषाओं में हुए।
लेकिन वीरेन को केवल उनके संग्रहों और अनुवादों से समझना संभव नहीं है। उनकी असली सृजनात्मकता उनके जीवन और कविता के बीच के उस सहज आवागमन में थी, जहाँ दोनों एक-दूसरे को प्रकाशित करते थे।
उनकी कविता किसी अलग, सुरक्षित और पवित्र काव्य-लोक में नहीं रहती। वह इसी दुनिया में रहती है। शायद इसीलिए उनके पहले संग्रह का नाम ‘इसी दुनिया में’ इतना सार्थक है। उनकी कविता में समोसा भी है, पपीता भी, मकड़ी भी, गाय भी, हाथी भी, सड़क भी, बादल भी और आदमी भी। वे उन चीज़ों को कविता के योग्य बनाते हैं, जिन्हें कविता का पारंपरिक संस्कार अक्सर मामूली समझकर छोड़ देता है।
यही उनकी कविता की लोकतांत्रिकता है।
वीरेन के यहाँ कोई वस्तु केवल इसलिए कविता में महत्वपूर्ण नहीं होती कि वह पहले से ‘काव्यात्मक’ मानी जाती रही है। वे साधारण में असाधारण खोजते हैं। उनकी कविता किसी बड़ी घोषणा से अधिक किसी छोटे दृश्य पर भरोसा करती है। एक मामूली वस्तु अचानक सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेती है। रोजमर्रा की भाषा में कही गई बात अचानक राजनीति, इतिहास या मनुष्य की नियति तक पहुँच जाती है।
उनका हास्य भी इसी सृजनात्मकता का हिस्सा है। वे व्यवस्था पर क्रोध करते हैं, लेकिन हमेशा मुट्ठी तानकर नहीं। कई बार मुस्कराते हुए। कई बार खिलंदड़ेपन के साथ। कई बार ऐसी बात कहकर कि पाठक पहले हँसे और थोड़ी देर बाद उस हँसी के भीतर छिपी विडंबना से असहज हो जाए।
यह आसान काम नहीं है।
राजनीतिक कविता प्रायः नारे में बदल जाने का ख़तरा उठाती है। वीरेन की कविता इस ख़तरे से इसलिए बचती है कि उसमें विचार जीवन से होकर आता है। वे विचार को कविता पर आरोपित नहीं करते; जीवन की छोटी-छोटी चीज़ों में उसे खोज लेते हैं। उनकी जनपक्षधरता भी इसी कारण घोषणात्मक नहीं है। वे जनता का प्रतिनिधित्व करने का दावा नहीं करते, बल्कि सामान्य मनुष्य की दुनिया में रहते हैं।
उनकी कविता में मनुष्य पीड़ित है, लेकिन केवल पीड़ित नहीं है। वह हँसता है, प्रेम करता है, काम करता है, भूख सहता है, सपने देखता है, हारता है और फिर किसी छोटे-से कारण से जीने की इच्छा वापस पा लेता है। वीरेन के यहाँ जीवन की यही जिजीविषा सबसे बड़ी ताक़त है।
उनकी कविता ‘कवि’ मुझे बार-बार उनकी ओर लौटा देती है—
“मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का उष्म ताप
मैं हूँ वसन्त में सुखद अकेलापन…”
और अंत में—
“मगर फिर भी मैं जाता रहूँगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।”
यही वीरेन थे।
ग्रीष्म की तेजस्विता, शरद का उष्म ताप और वसंत का अकेलापन—तीनों को एक साथ अपने भीतर रखे हुए। और भाषा को रस्से की तरह थामे हुए साथियों के रास्ते पर चलते हुए।
मैं उनकी तरह मृदु और सर्वप्रिय कभी नहीं हो सका। लेकिन सही बने रहने की कोशिश मैंने अवश्य की। और मेरा यही अवगुण वीरेन को बेहद आत्मीय लगता था।
हमारी मित्रता केवल साहित्यिक कार्यक्रमों, कविताओं और पत्रिकाओं की मित्रता नहीं थी। उसमें जीवन की वास्तविक कठिनाइयाँ भी शामिल थीं।
1984-85 के आसपास मेरे जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जिससे मैं बुरी तरह संत्रस्त हुआ। मेरे पैतृक गाँव के प्रधान के बेटे ने मेरे ख़िलाफ़ पुलिस में एक आपराधिक मामला दर्ज करा दिया था। मैनपुरी जिले का पुलिस अधीक्षक उन दिनों पहाड़ का रहने वाला व्यक्ति था और स्वयं को साहित्यकार भी समझता था। अव्यावहारिक होने के कारण मैंने उसकी साहित्यिक आकांक्षाओं को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया था। शायद वह इससे आहत था। उसे मुझसे अपनी प्रशंसा की अपेक्षा थी, जो पूरी नहीं हुई।
जब उस मामले के सिलसिले में उससे मिलने गया तो उसने व्यंग्य किया—“बहुत बड़े साहित्यकार बने फिरते हो, अब मेरे पास क्यों आए हो?”
मुझे तब समझ में आया कि साहित्य का झूठा अहंकार जब सत्ता से मिल जाता है, तो उसका चेहरा कितना वीभत्स हो सकता है।
वह जानता था कि मामला झूठा है, फिर भी मेरे विरुद्ध खड़ा था। बाद में पता चला कि गाँव का वह लड़का नियमित रूप से उसके घर घी और अनाज पहुँचाता था। वह पुलिस का दलाल था। मैंने शिकायत की, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला।
तभी मुझे पता चला कि वह पुलिस अधीक्षक वीरेन के साले का परिचित है और वीरेन से भी उसके संबंध हैं। मैं बरेली पहुँचा। मन में यह आशा थी कि वीरेन शायद कुछ कर सकें।
उन्होंने पूरे स्नेह से मेरी बात सुनी।
“वो आदमी तो बहुत नालायक है, इसलिए मैं उसे ज़्यादा घास नहीं डालता। अलबत्ता उसके साले से यह सब कहूँगा।”
उन्होंने अपने बड़े भाई, जो मध्यप्रदेश में बड़े सरकारी अधिकारी थे, से मदद लेने की बात पर भी बहुत स्पष्टता से कहा कि मैं स्वयं उनसे मिलूँ तो शायद वे कुछ कर सकें, लेकिन वे किसी अधिकारी से बात करेंगे तो वह अधिकारी आगे अपने लाभ के लिए उनके गले पड़ सकता है।
उन्होंने अपनी असमर्थता इतनी सहजता और साफ़-गोई से व्यक्त की कि मुझे निराशा तो हुई, लेकिन बुरा कतई नहीं लगा।
क्योंकि वीरेन झूठी आश्वस्ति देने वालों में नहीं थे।
वे चाहते तो कह सकते थे—“देखता हूँ, सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने जितना कर सकते थे, उतना करने की बात कही और जितना नहीं कर सकते थे, उसे भी स्पष्ट कह दिया।
बाद में मामला चला। पुलिस ने चार्जशीट दाख़िल की। लगभग डेढ़ वर्ष तक मुकदमा चलता रहा और अंततः मैं बरी हुआ। वीरेन ने कोई चमत्कार नहीं किया था, लेकिन उस कठिन समय में उनकी आत्मीयता मेरे साथ थी। और कभी-कभी मनुष्य को इससे अधिक कुछ चाहिए भी नहीं होता।
फिर जीवन अपने रास्ते चलता रहा।
1989 में मेरा तबादला मुरादाबाद हो गया। मेरा कार्यक्षेत्र मुरादाबाद से शाहजहाँपुर तक था और बरेली बीच में पड़ता था। मैं अक्सर बरेली जाता और वीरेन से मिलता। उन दिनों वे अमर उजाला का साहित्य पृष्ठ देखते थे।
“अरे बेटा, कुछ हमारे अख़बार को भी दे दिया करो।”
मैंने अपने गाँव से संबंधित कुछ संस्मरण भेजे। उन्होंने उन्हें बहुत आत्मीयता से प्रकाशित किया।
एक बार मुरादाबाद में शील जी आए। मैंने गोष्ठी आयोजित की। माहेश्वर तिवारी ने पूरा सहयोग दिया। मूलचंद गौतम, जिन्हें वीरेन मज़ाक़ में ‘मूली’ कहते थे, संभल से आए। पारसी थिएटर के जनक मास्टर फिदा हुसैन नरसी ने भी शिरकत की।
गोष्ठी अच्छी रही।
कुछ समय बाद बरेली से वीरेन का फोन आया—
“प्यारे, मूली ने बताया तुमने शील जी को बुलाकर अच्छी गोष्ठी कर डाली। मुझे ख़बर भी नहीं दी। भैया ऐसा मत किया करो। अच्छा, अब ऐसा करो कि इस गोष्ठी की अच्छी-सी रपट तुरत भेजो। अगले इतवार को छपनी है।”
मैंने रपट थोड़ी देर से भेजी। वह उस रविवार नहीं, अगले रविवार छपी—लेकिन अच्छी तरह छपी।
यही वीरेन थे। शिकायत भी करते तो स्नेह में लिपटी हुई। आदेश भी देते तो दोस्त की तरह।
बाद में मेरा कोटा और फिर जयपुर तबादला हुआ। वीरेन एक बार जयपुर आए—‘पहल सम्मान’ के अवसर पर। मैं भी कार्यालयी काम से बरेली गया तो उनसे फिर मुलाक़ात हुई। एक बार कानपुर गया तो वे वहाँ अमर उजाला के संपादक थे। मैं उन दिनों फरीदाबाद में था। फोन किया और उनके कार्यालय पहुँच गया। वे मुझे देखकर बहुत प्रसन्न हुए।
जब उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो मैंने फोन किया।
उनका उत्तर था—“बस भैया, ऐसे ही अनपेक्षित मिल गया। दो लोगों के झगड़े में मेरा फायदा हो गया।”
पुरस्कार के क्षण को भी अपने ऊपर हावी न होने देने वाला यह विनोद केवल हास्य नहीं था। यह उनके स्वभाव का एक गहरा लोकतांत्रिक गुण था। वे अपनी उपलब्धियों से बड़े नहीं होते थे।
फिर वर्षों तक भेंट नहीं हुई। मैं नागपुर चला गया। फोन पर बात होती रही। बाद में कलकत्ता में पहल सम्मान के आयोजन में मुलाकात हुई। वही पुराना लहजा—
“और बेटा, मौज़ कर रहे हो?”
फिर बड़ौदा, बारां होते हुए मैं जम्मू पहुँचा। संपर्क कुछ कम हुआ, लेकिन एक-दूसरे के समाचार मिलते रहे। जम्मू से दिल्ली आया और नोएडा में रहने लगा तो पता चला कि वीरेन अपने बड़े बेटे के पास तिमारपुर में रहते हैं।
एक दिन फोन पर बोले—
“अरे यार, कुछ दिन यहाँ रह लेता हूँ, फिर बरेली लौट जाता हूँ। आओ कभी मिलो।”
तभी पता चला कि उन्हें मुँह का कैंसर है और दिल्ली में इलाज चल रहा है।
मैंने उनकी बीमारी को लेकर चिंता जताई तो उनका वही बिंदास स्वर था—
“हाँ बेटे, इलाज हो रहा है। जो भी होगा, इतनी क्या चिंता करनी उसकी।”
उनकी यह सहजता भीतर तक हिला देती थी।
उन दिनों मुझे उनकी कविता ‘रुग्ण पिताजी’ याद आती थी—
“पिता डरें मत, डरें नहीं, वरना मैं भी डर जाऊँगा
तीन दवाइयाँ, दो इंजेक्शन अभी मुझे लाने हैं।”
कविता में बीमारी से जूझते शरीर के सामने खड़ा मनुष्य है, लेकिन उससे बड़ा है संबंध। भय है, पर भय के आगे आत्मसमर्पण नहीं। मृत्यु की छाया है, लेकिन जीवन के छोटे काम अभी बाक़ी हैं।
शायद वीरेन स्वयं भी अपनी अंतिम बीमारी में ऐसे ही थे।
कुछ समय बाद मैं इंदिरापुरम आ गया। एक दिन वाचस्पति जी ने बताया कि वीरेन डंगवाल आपके पड़ोस में ही रह रहे हैं। मुझे आश्चर्य हुआ—इतने पास और मुझे पता ही नहीं।
मैं और मेरी पत्नी उनसे मिलने गए।
वह अपने स्वभाव के अनुसार पूरे प्रेम और उत्साह से मिले। लेकिन शरीर अब बहुत कमजोर हो चुका था। कीमोथेरेपी चल रही थी। शरीर में जैसे कुछ बचा नहीं था। मेरे सामने वही वीरेन थे और फिर भी जैसे वे वीरेन नहीं थे, जिन्हें मैं बरेली में देखा करता था। पुराने रूप और नए शरीर के बीच कोई सामंजस्य नहीं बैठ रहा था।
लेकिन यह वास्तविकता थी।
और वास्तविकता को स्वीकार करना था।
शरीर कमजोर था, मन नहीं।
वे अब भी आत्मविश्वास से भरे थे। गजब की जीवट थी उनमें।
“जब भी फुरसत हो आ जाया करो।”
मैं दो-चार दिन बाद चला जाता। रीता भाभी पूरे स्नेह से स्वागत करतीं।
फिर मेरी सेवानिवृत्ति का समय आया। मेरी पत्नी जयपुर चली गई थी। वीरेन को पता चला तो वे परेशान हो गए।
“खाना कहाँ खाते हो? नाश्ता क्या बनाते हो? ऐसा करो यहीं आ जाया करो। शर्माओ मत यार, यह भी अपना ही घर है।”
मैं उन्हें समझाता कि मुझे खाने की कोई दिक्कत नहीं है। सुबह कॉर्नफ्लेक्स या ओट्स खा लेता हूँ, दोपहर ऑफिस में खाना खा लेता हूँ और शाम को सलाद या फल।
वे मानने वाले कहाँ थे।
छुट्टी वाले दिन दोपहर होने से पहले फोन—
“आज यहीं खाना खाओगे।”
घर पहुँचने से पहले फिर फोन।
और शाम को तो जैसे उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य था।
मैंने शाम के खाने का समझौता कर लिया था। शाम होते ही फोन। फिर एक घंटे बाद दूसरा फोन। और आठ-साढ़े आठ बजे अंतिम फोन—
“अब कहाँ हो?”
मेरे लिए बिना प्याज की सब्जी अलग बनती। रीता भाभी स्नेह से परोसतीं। बहू प्रियंका मज़ाक़ में कहतीं—“चाचा जी, पापा अब कल मुझे फोन करने को कहेंगे कि आप समय से आ जाएँ।”
बेटा प्रफुल्ल भी तीन महीने की छुट्टियों में वहाँ था। और सबसे सुखद था उनका प्रपौत्र, जिसकी मनोहारी बातें और खेल वातावरण को हल्का कर देते थे।
बीमारी के बीच भी घर में जीवन चल रहा था।
यही वीरेन की दुनिया थी—कैंसर, कीमोथेरेपी और घाव के बीच भी बच्चे की आवाज़, घर का खाना, मित्र का इंतजार और कविता।
एक दिन कीमोथेरेपी के बाद उनके गले में बने घाव से खू़न रिसने की बात उन्होंने कही। मैंने कहा—“अब जो है, उसे सहन तो करना ही है।”
उन्होंने कहा—
“हाँ, लेकिन सहन करने वाला ही यह जान सकता है। कहने से क्या होता है।”
मैं चुप हो गया।
उस दिन मुझे लगा, किसी पीड़ा पर बाहर से कोई वाक्य चिपकाना कितना आसान है और उसे जीना कितना कठिन।
मैं उनकी बीमारी पर अधिक बात नहीं करना चाहता था। उन्हें और कमजोर करना उचित नहीं लगता था। लेकिन बीमारी के बीच भी वीरेन लिख रहे थे। खू़ब लिख रहे थे। पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ छपतीं तो मुझे पत्रिका देते। छपाई की ढेरों गलतियाँ रेखांकित कर देते।
उन दिनों लिखी गई उनकी कविताएँ कुछ अलग थीं।
उनमें बीमारी का दैन्य नहीं था। मृत्यु की आहट थी, लेकिन मृत्यु के आगे झुकना नहीं था। भाषा में एक नया आविष्कार था। वस्तुओं और अनुभवों को देखने की दृष्टि और अधिक तीखी हो गई थी।
विष्णु खरे ने वीरेन की कविता के बारे में लिखा था कि उनकी दृष्टि जितनी व्यष्टि पर थी उतनी ही समष्टि पर भी। वे प्रतिबद्ध होने के साथ वाम-चिंतक और सक्रियतावादी थे। गंभीर कैंसर भी उनकी सृजनशीलता, मनोबल और जिजीविषा को तोड़ नहीं सका। दिल्ली मेट्रो पर लिखी उनकी अंतिम दौर की कविताओं में एक नई भाषा, आविष्कार शीलता और जीवन्तता दिखाई देती है।
यह टिप्पणी केवल आलोचक की प्रशंसा नहीं है। यह वीरेन के अंतिम दिनों की वास्तविक तस्वीर है।
वे मृत्यु की ओर बढ़ते हुए भी जीवन को पढ़ रहे थे।
नई पत्रिकाएँ, नई किताबें, नई कविताएँ—सब जानना चाहते थे। मेरी पुस्तकें लेकर पढ़ते और अपनी राय देते। मेरा संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव ज़मीन पर पढ़ने के बाद एक दिन बोले—
“तुम संस्मरण लिखो अपने समकालीनों पर। यह एक अच्छा काम होगा।”
एक-दो बार फिर उन्होंने यह बात दोहराई।
मैं मन ही मन सोच रहा था—क्यों न शुरुआत उन्हीं से करूँ?
शायद यह लिखना उसी अधूरे काम को पूरा करना है।
वे अब बरेली लौटने का मन बना चुके थे। बरेली वाले घर में कुछ काम प्रफुल्ल ने करा दिया था। अगस्त में ही जाना चाहते थे, लेकिन जाते-जाते 19-20 सितंबर हो गया। मैं जयपुर में था। हालचाल लेता रहता था।
चार सितंबर को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनका अभिनंदन था। तीन तारीख को ही उनसे बात हुई थी। उन्होंने कहा—
“सुविधा हो तो आना, नहीं तो क्या करोगे। अभिनंदन-वंदन भी चुतियापा है।”
मैं उस दिन नहीं गया।
अब कभी-कभी सोचता हूँ—जाना चाहिए था।
लेकिन जीवन में ‘काश’ का कोई उपचार नहीं होता।
बरेली जाने के ठीक पहले और उसके बाद उनसे बात नहीं हो सकी। फिर 28 सितंबर आया और वीरेन हमें अलविदा कह गए।
मुझे कतई भरोसा नहीं था कि इतनी जल्दी यह सब हो जाएगा।
शायद वे बरेली लौटने के लिए ही रुके हुए थे।
मृत्यु के बाद जब किसी व्यक्ति को याद करते हैं तो उसके चेहरे से अधिक उसकी आवाज़ याद आती है। वीरेन की आवाज़ आज भी सुनाई देती है—
“अरे शैलेन्द्र, कहाँ हो?”
“क्या कर रहे हो प्यारे?”
“मौज़ चल रही है?”
यह ‘मौज़’ शब्द उनके पूरे जीवन-दर्शन का एक छोटा-सा शब्द था। बीमारी के बीच भी मौज़। अभाव में भी मौज़। साहित्यिक राजनीति से दूर भी मौज़। पुरस्कार मिलने पर भी मौज़। मित्र से शिकायत करते हुए भी मौज़।
लेकिन इस मौज़ के भीतर जीवन के प्रति गहरा संघर्ष था।
वीरेन को केवल विनोदप्रिय कवि समझना उनके साथ अन्याय होगा। उनकी कविता में हास्य है, लेकिन वह हँसी जीवन की कठिनाइयों को ढँकती नहीं, उन्हें अधिक तीक्ष्ण बनाती है। उनकी कविता में जनपक्षधरता है, लेकिन वह नारे में नहीं बदलती। उनकी राजनीति है, लेकिन कविता राजनीतिक भाषण नहीं बनती। उनकी भाषा सहज है, लेकिन उसकी सहजता के पीछे गहरी कलात्मक सजगता है।
वे साधारण वस्तुओं को असाधारण अर्थ देते हैं।
यही उनकी सृजनात्मकता का मूल रहस्य है।
उनके यहाँ पपीता केवल पपीता नहीं रहता, समोसा केवल समोसा नहीं रहता, मकड़ी केवल मकड़ी नहीं रहती। वे वस्तुओं की सामाजिक उपस्थिति देखते हैं। वे भाषा को ऊँचे आसन से उतारकर जीवन के बीच लाते हैं। लोक और आधुनिकता, हास्य और करुणा, राजनीति और निजी जीवन, प्रकृति और मनुष्य—इन सबके बीच वे ऐसी आवाजाही करते हैं कि कोई कृत्रिम विभाजन महसूस नहीं होता।
इसीलिए उन्हें केवल जनवादी कवि कह देना भी पर्याप्त नहीं है।
वे जनपक्षधर हैं, लेकिन मनुष्य के पक्ष में उनकी प्रतिबद्धता किसी विचारधारात्मक घोषणा से बड़ी है। वे सत्ता का विरोध करते हैं क्योंकि सत्ता मनुष्य के विरुद्ध खड़ी होती है। वे शोषण के विरुद्ध हैं क्योंकि वे मनुष्य की गरिमा को महत्व देते हैं। उनकी राजनीति अंततः मनुष्य की राजनीति है।
उनकी कविता में प्रकृति भी इसी मानवीय दृष्टि से आती है। पहाड़, बादल, नदी, पेड़, पशु-पक्षी—ये सब केवल सौंदर्य के दृश्य नहीं हैं। वे जीवन के सहचर हैं। प्रकृति उनके यहाँ किसी रोमानी पलायन का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य की दुनिया का अभिन्न हिस्सा है।
उनकी कविता का एक बड़ा गुण उसकी वस्तु-दृष्टि है। वे कविता को बड़ी घोषणाओं से मुक्त करके छोटी चीज़ों के बीच ले जाते हैं। यह छोटी चीज़ों का लोकतंत्र है। और शायद इसीलिए उनकी कविता आम आदमी के निकट पहुँचती है।
उनकी भाषा भी इसी लोकतंत्र की भाषा है।
बोलचाल के शब्द, देशज मुहावरे, ठेठ जीवन की आवाज़ें, कभी संस्कृतनिष्ठ शब्द, कभी अचानक आया कोई मज़ाक़िया वाक्य—सब मिलकर उनकी कविता की अपनी भाषा बनाते हैं। यह भाषा सजाई हुई भाषा नहीं है; यह जी हुई भाषा है।
और शायद इसलिए वीरेन की कविता पढ़ते समय कई बार लगता है कि कोई कविता पढ़ नहीं रहे, किसी आत्मीय व्यक्ति से बातचीत कर रहे हैं।
उनकी कविता ‘खु़द को ढूँढना’ अब उनके लिए पढ़ता हूँ तो उसका अर्थ बदल जाता है—
“एक शीतोष्ण हँसी में
जो आती गोया
पहाड़ों के पार से
सीधे कानों फिर इन शब्दों में
ढूँढना खु़द को
खु़द की परछाई में…”
उनकी शीतोष्ण परछाई सचमुच जब-तब दिखाई देती है।
कभी किसी पुराने फोन नंबर की तरह।
कभी किसी पत्रिका के पन्ने पर।
कभी किसी मित्र के चेहरे पर।
कभी किसी कविता की पंक्ति में।
और कभी अचानक अपने ही भीतर।
वीरेन ने केवल कविताएँ नहीं लिखीं। उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में युवा पत्रकारों, लेखकों और कवियों को जनप्रतिबद्धता का संस्कार दिया। उनके लिए साहित्य केवल आत्माभिव्यक्ति नहीं था। साहित्य जीवन से जुड़ने का माध्यम था। पत्रकारिता भी उनके लिए इसी जीवन-संपर्क का हिस्सा थी। वे नए लोगों को जगह देते थे, उनकी रचनाएँ पढ़ते थे, उनसे लिखने को कहते थे, उन्हें प्रोत्साहित करते थे। यही उनकी विरासत का एक बड़ा हिस्सा है, जो किसी पुरस्कार या पुस्तक-सूची में दर्ज़ नहीं होता।
एक कवि की असली उपलब्धि शायद यही होती है कि उसके जाने के बाद भी कुछ लोग उसके कारण लिखते रहें, कुछ लोग उसके कारण मनुष्य के पक्ष में खड़े रहें और कुछ लोग अपनी भाषा को थोड़ा अधिक ईमानदार बनाने की कोशिश करें।
वीरेन ने यह किया।
और शायद यही कारण है कि उनकी मृत्यु के बाद भी वे पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हुए।
मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा, यद्यपि उन्होंने कभी मुझे सिखाने की मुद्रा नहीं अपनाई। उनके साथ रहकर, उनकी बातें सुनकर, उनके व्यवहार को देखकर, उनकी साफ़-गोई से, उनकी आत्मीयता से और बीमारी में भी उनकी जीवटता से बहुत कुछ सीखा।
उन्होंने मुझे कभी यह नहीं कहा कि मित्रता क्या होती है।
वे मित्र रहे।
कभी कोई काम न कर पाने की असमर्थता बताकर भी मित्र रहे। कभी अख़बार के लिए रपट माँगकर भी मित्र रहे। कभी पुरस्कार को मज़ाक़ में उड़ा कर भी मित्र रहे। बीमारी के बीच अपने घर बुलाकर खाना खिलाकर भी मित्र रहे। और अंत में बिना विदा कहे चले जाकर भी मित्र बने रहे।
उनकी मृत्यु के बाद पड़ोस सचमुच सूना हो गया।
एल टावर का वह फ्लैट अब किसी और के लिए केवल एक फ्लैट होगा। मेरे लिए वह वीरेन का घर रहेगा। वह दरवाज़ा, जिसके भीतर से कभी उनकी आवाज़ आती थी—“अरे प्यारे, आओ”—अब स्मृति का दरवाज़ा है।
कभी-कभी लगता है, वे कहीं गए नहीं हैं। बरेली चले गए हैं। जैसे उस दिन कहा था—“कुछ दिन यहाँ रह लेता हूँ फिर बरेली लौट जाता हूँ।”
वे लौट गए।
लेकिन लौटकर भी कहाँ गए?
उनकी कविता में।
उनके मित्रों की स्मृतियों में।
उन लोगों की भाषा में जिन्हें, उन्होंने लिखने का साहस दिया।
और उन तमाम साधारण वस्तुओं में जिन्हें उन्होंने कविता में असाधारण बना दिया।
उनकी कविता की तरह उनका जीवन भी किसी एक रंग का नहीं था। उसमें ग्रीष्म की तेजस्विता थी, शरद का छिपा हुआ ताप था, वसंत का अकेलापन था और पहाड़ों के पार से आती एक शीतोष्ण हँसी भी।
और अंततः वही—
“हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर…”
एक कवि और कर ही क्या सकता है—
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।
वीरेन चले गए हैं।
सही बने रहने की वह कोशिश अब हमारी ज़िम्मेदारी है।
और शायद यही किसी मित्र को याद करने का सबसे सच्चा तरीक़ा भी है।
***
संपर्क : 34/242, सेक्टर –3, प्रतापनगर, जयपुर – 302033
मोबाइल- 7838897877