पल्लवी की कविताएं समाज में व्याप्त विसंगतियों,पाखंड से संवेदना भरे मन में होने वाली उथल-पुथल को सामने लाती हैं। इन विसंगतियों से पार पाने के लिए कवि मन की छटपटाहट उनकी भाषा में दिखाई देती है। सत्य और यथार्थ का द्वन्द उनकी कविताओं में निरन्तर महसूस होता है। अनुनाद पर पल्लवी की कविताओं का यह प्रथम प्रकाशन है। उनका यहां स्वागत है।
-अनुनाद
असत्य जीवन

स्त्रियां नहीं कह सकीं
अपने जीवन का सत्य
वो करती रहीं प्रेम
और छिपाती रहीं
अपने अंदर की अनंत गहराइयों को,
अपने जीवन को
यथार्थ को
अपने बीते हुए कल को।
उन कलों को
जिसका निर्माण
पुरुषों ने ही किया था ।
उनको पता था कि
वो जिनसे कर रही हैं, प्रेम
या पा रही हैं
उनसे कहा गया सत्य
केवल वंचना लायेगा।
आख़िर,
किस प्रेम की तलाश में रहीं वे ?
उन्होंने अपने आस-पास
निर्मित कर लिए
असत्य के आवरण
वे असत्य ठीक वैसे ही थे
जिनसे पुष्ट हो रहा था
पुरुषों का अहंकार।
स्त्री को गहन प्रेम में भी
ध्यान रखना पड़ा
कहीं पुरुष अहंकार खंडित न हो जाए।
और पुरुष खुश रहा ये सोचकर
मेरे पास है जो स्त्री
वो,
ठीक मेरे मानदंडों की है ।
इस तरह
घुटती रही आत्मा,
तड़पती रही चेतना,
व्याकुल रहा मन,
और परेशान हृदय ।
बीमार समाज की फिटनेस
रखे ध्यान
बनाते आदर्श-दाम्पत्य ।
अंततः विदा हुआ
जर्जर जीवन
त्यागता हुआ, स्त्री होने के अभिशाप को
जलती रही लौ
गिरती रही राख
चटकती हड्डियां
जिनमें लिखा था –
मैंने असत्य को जिया है।
सत्य नहीं कह पायी
तुम्हारी दुनिया में
सत्य को स्पेस नहीं
तुम दयनीय और निरीह हो
क्योंकि तुममें नहीं है, आत्मबल
कि अपना असली चेहरा भी देख सको।
***
भिंचा हुआ जबड़ा

तुम, हो सके तो समझना
सबसे पहले उसका पक्ष
जिस पर, नैतिकता ने हमला करके
उसके अधिकार का हरण कर लिया हो।
तुम्हें ख़ून चूसने वालों के
दांतों से अधिक चुभना चाहिए
उनका भिंचा हुआ जबड़ा
जो छटपटा रहे असहाय पर
अधिक पकड़ बनाना चाहता है।
तुम जब स्त्रियोचित जीवन बताने वाले
उपदेशकों को सुन रहे हो
तब नहीं भूलना
बलात्कारियों के विचार
जो एक तरह से मॉरल-पुलिस होने का
दावा कर रहे थे।
तुम गौर करने पर
सुधारकों और आततायियों
में बहुत अंतर नहीं पाओगे
क्योंकि दोनों के पास है ;
सत्य।
सत्य जिनके पास होता है
वो धर्म से अधिक
हिंसा की औलादें हैं।
यदि तुम सच में निकले हो
जानने को कुछ ऐसा
जो तुममें थोड़ी और समझ ला दे
तो त्याग देना तुम्हारी
सड़ी हुई अंतरात्मा
क्योंकि यह भी
परम्परा से उपजी बुद्धि है।
इसीलिए तुम्हारी अंतरात्मा से
ज्यादा घातक कुछ नहीं।
***
मोबाइल – टॉवर
मेरे छत से दूर

आसमान का कोना बनाने को आतुर
दूर खड़ा मोबाइल – टॉवर
पल को सही
लेकिन गिरफ्त में ले लेता है
चमकते चांद को ।
उस पल चांद सीधा,
गोल या आधा नहीं होता ।
सच कहूं तो उसका मुंह ही नहीं होता
फिर कैसे टेढ़ा कहा जा सकता है।
मेरे चांद का मुंह बेबस है,
लाचार है
लगता है, उसकी छाती में खड़ा है
मोबाइल – टॉवर …
***
परिचय
नाम – डॉ पल्लवी
पिता का नाम – श्री जयराम
शिक्षा – एम. ए. ( हिंदी साहित्य ), पीएच.डी ( पूर्वाचल विश्वविद्यालय से )
पता – दोहरीघाट, जिला- मऊ, उत्तर प्रदेश पिन कोड – 275303
संपर्क – drpallavi.dohrighat@gmail.com
नया पथ, समकालीन जनमत और पहली बार में कविताएं प्रकाशित ।