अनुनाद

अपने बच्चों में ख़ुदा की सूरत देखती माँओं को क्या ज़वाब दोगे तुम/कुँवर रवीन्‍द्र सिंह की कविताएं

कुँवर रवीन्‍द्र सिंह की कविताएं पहाड़ की सड़कों की तरह मोड़दार हैं। वैश्विक दृश्‍यों में चलती हुई, अचानक से संवेदनाओं में लौटती  इन कविताओं का रसाभाव पाठक इनसे गुजरते हुए ही ले सकता हैै। अनुनाद पर रवीन्‍द्र की कविताओं का यह प्रथम प्रकाशन है, उनका यहॉं स्‍वागत है। 

                                                                                                                                                                                                                                      -अनुनाद  

courtesy : google

नामे २०२५

 

ये साल भी

ख़त्म हो रहा है

उम्मीद से इतर

यह बताते हुए

महज बीत नहीं रहा है

कैलेण्डर के तीन सौ पैंसठ दिनों का कालखंड 

बीतते साल 

रोज घटी है 

एक बटे तीन सौ पैंसठ करुणा 

एक बटे तीन सौ पैंसठ 

हम हुए हैं अभ्यस्त 

हिंसा और चुप्पी के

हर बीतते दिन।

समय की जेब से चुक रहे ये महज़ तीन सौ पैंसठ दिन नहीं हैं 

ये कहानिया हैं 

तीन सौ पैंसठ से 

अनगिनत गुना ज्यादा 

हत्थे चढ़ जाने की 

किसी प्रवासी मजदूर के

उस भीड़ के 

जिसका नफरत की कालिख में पुता चेहरा 

अब दिखने लगा है 

थोडा ज्यादा साफ़ 

झूठे स्वाभिमान की ग्रंथि ने 

अनगिनत बार साबित किया है 

बाप भाई और परिवार के प्यार को 

ओछा और छोटा 

क़त्ल करके 

अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वाली अपनी नस्लों का 

इसी बीतते साल ने बोया है बीज 

एक अनदेखे पर रोज सच साबित होते खौफ़ का 

न जाने कब 

सस्ती साबित हो जाये आदमी की जान की कीमत 

मवेशियों की पहचान से भी 

सिर्फ दिमाग़ी याददाश्त ही कमजोर न हुई है 

दूसरों का दर्द महसूसने वाली 

कोशिकाएं भी घटी हैं ज़ेहन में 

इस बीतते साल में 

कमजोर के हक और हुकूक के लिए 

आवाज़ उठाने का दंभ भरने वाली वाणी 

भर्राने लगी है 

ख़ुद का जायज़ हक मंगाते हुए 

और एक कमाल इस बीतते साल ने दिखाया है 

इस साल भी 

बाहर नहीं निकल पाएं हैं 

बहुत सारे मूर्धन्य लेखक

सर्वहारा का गीत गुनगुनाने का दावा करने वाले 

अपनी कविता से सर्वहारा का सब छल लेने वाले 

स्वनामधन्य कवि 

स्वजनित प्रेमलोक से 

उस प्रेमलोक से 

जो उनकी कविताओं और कहानियों जितना ही झूठा और भद्दा है 

हाशिये के लोगों के लिए काम करते क़ानून को 

देखना हाशिये पर जाते हुए 

दुःखद कम 

डरावना ज्यादा है 

पर इस सच का एक स्याह चेहरा यह भी है 

बड़ी से बड़ी त्रासदियाँ 

अब नहीं कर पाती हैं हमें विचलित 

त्रासदियों के संताप कम नहीं हुए हैं 

शायद अब हम ही उतने मनुष्य नहीं बचे हैं

समझ के गणित से परे हो गएँ हैं 

दुःख 

कितना भी जोड़ो 

भरती ही नहीं है 

साझा सुखों की गुल्लक 

दुनियावी चीजें जोड़ते जोड़ते 

भीतर के घटे का हिसाब 

लगाए न लग रहा है 

और लग भी पाया तो 

घटा हुआ ही बढ़ा निकलेगा 

जुड़े हुए से 

कविता अधूरी रहे या पूरी हो जाए 

साल का देय 

स्मृति की पीठ पर 

देनदारी का एक ऐसा नासूर बनकर उभरेगा 

जो आने वाले 

न जाने कितने सालों तक 

चुकाए न चुकेगा

हमारे चुकने के बहुत बाद तक भी ।।

***

 

courtesy : google

बच्चे और युद्ध

 

क्या करोगे

अपने जीते हुए सब भूखंडों का

कि जब उन में उगे किसी फूल को देखकर

मुस्करा नहीं सकेंगे

बारूदों के धमाकों से डरे सहमे

तुम्हारे बच्चे

जब वो आसानी से नहीं बना पाएंगे

किसी अज़नबी हमउम्र को अपना दोस्त

मौत का अट्ठहास करती

तुम्हारी तोपों की गरज़

उनके दिलों में ताउम्र के लिए

गहरी बैठ गयी है

अपने बच्चों में ख़ुदा की सूरत देखती

माँओं को क्या ज़वाब दोगे तुम

जब वो तुमसे पूछेंगी उनकी

मुस्कानों का पता

ये जो समय से पहले

बुलाये हैं तुमने पतझड़

क्या बुला सकोगे ऐसे ही

बसंत को भी

कभी सोचा है तुमने

तुम्हारे दिए हादसों की से

दरियाओं के अँधेरे गर्त में जा छिपी

मछलियों तक रोशनी की

कौन सी आवाज़ पहुंच पाएगी

और वो एक बार फिर आएंगी

तुम्हारा निवाला बनने

ताकि भरे पेट

और अहम के साथ एक बार फिर

तुम निकल सको

किसी नयी जंग पर।

***

courtesy : google

अस्पताल में पिता

 

अस्पताल में पिता

मेरे भय की पराकाष्ठा हैं

जिनकी उपस्थिति

हमारे अभय का शिखर रही हो

जीर्णशीर्ण देह और क्लांत मुख उनका

निस्सीम कर देता है

हमारे मौन के संसार को

हार की एक ऐसी प्रतिध्वनि

जिससे कभी गुजरना नहीं चाहता मैं

अस्पताल में पिता

जीवन का अघोषित आपातकाल हैं

समय के पेट पर

उभर आये उस फोड़े जैसे हैं

जो लेने नहीं देता

पेट के बल होकर

सोने वाली दोपहर की अलसाई नींद

तकनीकी के साथ

हमेशा छत्तीस के आंकड़े में रहने वाले पिता

उत्कट व्यग्र हो उठते हैं

देखकर बड़ी सी मशीन

सीटी स्कैन की

अनायास हो जाते हैं

एकदम चुप

मैं समझ नहीं पाता

वो कर रहें हैं

कोई मंत्रोचारण

या फिर कोस रहे समय को

या फिर याद रहें हैं

उनको

उनके पिता

***

courtesy : Vineeta Yashsavi

पहाड़ों से लौटते हुए

 

दे आया हूँ

तिलांजलि

अपनी गढ़ी सब ऊँचाइयों की

समर्पित कर आया हूँ

मन के सब खोखलेछिछलेहल्के पहाड़

जो रचे थे समय ने

झूठी प्रवंचनाओ के सहारे

स्वार्थ की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़कर

आत्मश्‍लाघाओं ने किया था

जिन्हें पोषित

भीतर की विपन्नताओं ने

डाल रखा था जिन पर

भ्रमों का मकड़ीला जाल

जहाँ से देखते हुए

पाया है मैंने खुद को

बहुत ऊँचा

बहुत बड़ा

बहुत भारी

बहुत गाढ़ा और

बहुत घना

पहाड़ों से लौटते हुए

दृष्टि ने मुझे आइना दिखाया

जिसमे मैं था

बहुत बौना

बहुत छोटा

बहुत हल्का

बहुत विरल

बहुत तरल

***

 

courtesy : Bhaskar Bhauryal

मेरे समय की औरतों के नाम

 

रोज थोड़ी और निर्मम होती दुनिया में

नेकी और उम्मीद की रौशनी को ज़‍िन्‍दा रखती

मेरे समय की औरतों के नाम

तुमसे शुरू होती दुनिया में

तुमसे पहले किसी और का ज़िक्र

भला जायज़ होगा क्या

और अगर ये हुआ भी तो पूरा हो पायेगा क्या

माँ, बहन, दोस्तमहबूब जाने कितने किरदार

और सब के सब किरदारों में ये पाकीज़गी

सब के आँखों के ख्व़ाब की तामील करते हुए

खुद के ख्व़ाब देखने की हिम्मत पालती

मेरे समय की औरतों के नाम

अपनी वफ़ा दुआओं के जादू से

दुनिया को मुकम्मल खूबसूरत बनाती

अपनी ज़हीनी से तस्वीरकायनात को

रोज थोड़ा और खुशरंग करती

मेरे समय की औरतों के नाम

इंसानियत की राहमंजिल को रौशन करती

गम के हर एक सांचे में चुपचाप ढलती और मुस्कराती

पिछली रातों की थकान और भीतर के गम की गठरी बांधे

रोज़ सुबह काम पर निकलती

बिना परों के रोज़ उड़ने की जद्दोज़हद में लगी

मेरे समय की औरतों के नाम

किसी भी शायर की शायरी से बड़ी

और हर किस्सागो की कहानी से कहीं ज्यादा मुंतशिर

किस्साआदम के इब्तिदा से इस लम्हे तक

सबसे औसाफ़ किरदार

मेरे समय की औरतों के नाम

आसां नहीं होता घर की इज्ज़त और अपने ख्वाबों को

एक ही कोख़ में यूँ बखूबी पाल पाना

मगर हर बार की तरह हार कर भी जीतती

चाहने और निबाहने के अंतर को रोज़ घटाती

मेरे समय की औरतों के नाम

***  

कुँवर रवीन्द्र सिंह

सम्प्रति: सेवारत (भारत सरकार उपक्रम)

संपर्क:  kunwar2618@gmail.com

   

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