अनुनाद

और इसी भीड़ में सबसे बड़ा अकाल मनुष्य का है/ शैलेन्‍द्र चौहान की कविताएं

शैलेन्‍द्र चौहान की कविताएं वैश्विक स्‍तर पर व्‍याप्‍त विषमताओं से व्‍याकुल कवि मन को दर्शाती हैं। चारों ओर फैले कुहासे में सूरज की किरण की तरह एक उजली आश निरंतर कविताओं में प्रकट होती है।

                                                                                                                                                                                                                                                    -अनुनाद

ख़ामोशी एक अपराध है

ग़ज़ा

अब कोई जगह नहीं

एक लंबा कराहता हुआ वाक्य है

जिसे हर सुबह

ख़ून से दोहराया जाता है

यहाँ आसमान नीला नहीं भयावह है

ड्रोन की आँख है

धरती अब

माँ नहीं

मलबे की गोद है

 

बच्चे

खिलौनों से नहीं

मौत के ज़ख़ीरे से खेलते हैं

उनकी हँसी में

बारूद की गंध है

 

दुनिया के लिए यह

बस एक नियमित समाचार है

जिसमें झाँककर

लोग चाय पीते हैं

और कहते हैं—

“स्थिति जटिल है”

शांति –

एक अविश्वसनीय शब्द है

जो मिसाइलों के साथ

लिपटकर कर आता है

तमगों की लालसा से युक्त

 

ग़ज़ा

आज एक प्रश्न है

जो हर जीवित ज़मीर से पूछता है—

क्या तुम्हारी ख़ामोशी

भी हत्याओं का स्वीकार नहीं?

गो किसी वक्त तुम भी हो सकते हो

विध्वंस का लक्ष्य

 

याद रखो—

विध्वंस

हमेशा दूसरों के हिस्से में नहीं आता

***   

जयपुर का एकांत

भीड़ में छिपा हुआ विकल मौन है

हवामहल की जालियों के पीछे

साँस लेती हैं सदियाँ

जंतर-मंतर पर चमकती है कपोत की बीट

 

प्रतीकात्मक गुलाबी दीवारें

दिखती हैं सामंती वैभव के अवशेष

शाम होते-होते

छतों पर उतर आती है

नीमकस ठंडी चुप्पी

 

गलियों में घूमता है

गड्ड-मड्ड इतिहास

किसी लोकगीत की तरह

जो सुन रहे हैं गद्दी पर बैठे जौहरी

 

यहाँ हर मोड़ पर

अतीत किसी बूढ़े पहरेदार-सा

टकटकी लगाए खड़ा है

जिसकी आँखों में

सामंती युग की सिहरन

और जनमन की अनकही थाती

एक साथ ठहरी हुई है

 

बाज़ारों में

चमकते हैं रंगीन कपड़े

उनके नीचे

सिलवटों में दबा है

कई पीढ़ियों का कौशल

और अनदेखी मेहनत की गंध

 

हाथीपोल, त्रिपोलिया,

चौकड़ी की तंग साँसों में

शहर खु़द को

दोहराता है बार-बार

जैसे स्मृति

भूलने से इनकार कर रही हो

 

वर्तमान की अनगिनत चुनौतियों में

जयपुर का एकांत

अकेलेपन का नहीं,

स्मृति का दुर्धर्ष है

जो हर आगंतुक के भीतर

अपने नाखून गड़ा देता है

 

यहाँ समय रुकता नहीं,

घूमता है घूमर-सा

घेरदार, भारी,

बार-बार उसी बिंदु पर लौटता हुआ

जहाँ प्रश्न

उत्तर से पहले पैदा होते हैं

 

मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ

पत्थरों से बात करते हुए

अपने भीतर के

शोर को सुनते हुए

या इस शहर की चुप्पी में

अपना कोई

भूला हुआ हिस्सा

खोजते हुए?

***

भीड़

भीड़ ही भीड़—

सड़कों पर, बाज़ार में

मॉल में, हवाई अड्डों पर

अस्पतालों में

विचाराधीन कैदियों की जेलों में

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में

परीक्षा केंद्रों

और प्रतिद्वंद्विता की अँधी दौड़ में

 

भीड़ है

रोज़गार के दफ़्तरों में

फॉर्म भरने की कतारों में

इंटरव्यू के बाहर

धड़कते दिलों के साथ

 

भीड़ है

ट्रेन की जनरल बोगी में,

आरक्षण की खिड़की पर—

चोर, गिरहकट, ठग, अपराधी

घुलमिल जाते हैं भीड़ में

वारदातें होती हैं

पुलिस बेख़बर रहती है

 

भीड़ उत्सव में भी है

और शोक में भी,

भिखारियों की भीड़ है

शिकारियों की भी

बाग़ों के चारों ओर

और सेल्फ़ी के फ़्रेम में भी

 

भीड़ बोलती है

नारों में, अफ़वाहों में

टीवी डिबेट के शोर में—

जब सच बोलना मुश्किल होता है

तो वह

ख़ामोश हो जाती है

 

भीड़ बढ़ती जाती है

प्रतिस्पर्धा तेज़ होती जाती है

आदमी

सिर्फ़ एक संख्या बनकर

रह जाता है

 

हर जगह

बेतहाशा भीड़ है—

और इसी भीड़ में

सबसे बड़ा अकाल

मनुष्य का है

***

बेचैन बहुत हूँ

हर कदम पर छल, धोखा, ठगी, विश्वासघात

जैसे ज़मीन

पैरों के नीचे

बेआवाज़ खिसक जाती है

 

चलते रहने की आदत है

इसलिए गिरने से ज़्यादा

संभलने का अभिनय करते हैं

भीतर हर बार कुछ टूटता है

बिना शोर किए

 

आँखें सच ढूँढ़ती हैं

चेहरों पर मुखौटे हैं

इतनी सहजता से मुस्कराते हैं

कि संदेह भी

रुककर

अपनी आँखें मूँद ले

 

यह समय अजीब है

यहाँ ईमानदारी

एक दंडनीय अपराध-सी लगती है

और भरोसा

सबसे बड़ा जोखिम

 

सच बोलना

साहस नहीं

अविवेक कहा जाता है;

चुप रहना

सुरक्षित नीति

 

बाज़ार ने रिश्तों को

मोलभाव की भाषा सिखा दी है,

शब्द अब वादे नहीं

केवल सुविधाजनक बहाने हैं

 

फिर भी

मन के किसी कोने में

एक ज़िद्दी उम्मीद

साँस लेती है

कि सब कुछ इतना भी ग़लत नहीं हो सकता

इस घनघोर अँधेरे में

कहीं कोई

बिना हिसाब

बिना स्वार्थ

सच के साथ

जरूर होगा

 

यह समय अब भी

पूरी तरह

अंधेरे में डूबा नहीं है

मन

बार-बार ठगा जाकर भी

सच के पक्ष में

खड़ा रहना

चाहता है

हालांकि बेचैन बहुत है

***

कविता न लिख पाने का दुख

शब्द आज भी

दरवाज़े पर खड़े हैं

पर भीतर आने से हिचकते हुए

जैसे कोई पुराना मित्र

अचानक अजनबी हो गया हो

 

मन के भीतर

कागज की अननुभूत चुप्पी

किसी मौन समंदर की तरह फैलती जाती है

जिसमें न तारे हैं,

न दिशा

कैसा बेढब है

यह समय !

 

कई दिनों से

एक पंक्ति को खोजता हूँ

मानो खोए बच्चे का नाम

जो जीभ की नोक पर आता भी है

और पल भर में

धुंध की तरह उड़ भी जाता है

 

मैं जानता हूँ

कविता लिखी नहीं जाती

घटती है मन में

अपने ही भीतर का मौसम

किसी जमी हुई झील-सा है

जहाँ न लहरें उठती हैं

न जल में आकाश की चमक झलकती है

 

कवि होना

बहुत कठिन लगता है

जब कविता

पास होकर भी

नहीं होती पास

 

प्रतीक्षा है

कोई अनछुआ-अनचीन्हा मर्म

क्षणिक चिंगारी,

टूटन

तोड़ सके सारी जड़ता

इस माहौल की

***

कविता न लिख पाने का दुख –2

शब्द

अब भी देहरी पर खड़े हैं

पर उनकी परछाइयाँ

मोबाइल स्क्रीन की नीली चमक में

बार-बार कट जाती हैं,

मानो कोई पुराना मित्र

अपने नोटिफ़िकेशन-शोर में

हमारा नाम भूल गया हो

 

मन के भीतर

काग़ज़ की वह आदिम, सफ़ेद ख़ाली जगह

अब किसी एल्गोरिथ्म की तरह

निर्वैयक्तिक होती जाती है

एक ऐसा मौन

जो समुद्र नहीं,

एक विशाल सर्वर-रूम है

जहाँ तारे नहीं,

सिर्फ़ झपकती हुई डेटा-लाइनें हैं

 

कई दिनों से

एक पंक्ति को खोजता हूँ

जैसे खो गए बच्चे का नाम नहीं

बल्कि

पासवर्ड भूल गया कोई उपयोगकर्ता

जो उंगलियों की नोक पर आते ही

धुंध नहीं,

कुकीज़ क्लियर करने पर

उड़ जाता है

 

मैं जानता हूँ

कविता लिखी नहीं जाती;

वह घटती है।

लेकिन भीतर का मौसम

अब किसी जमी हुई झील नहीं,

एक फ्रीज़ हुई स्क्रीन है

जहाँ न कर्सर चलता है

न विचारों के आयकन चमकते हैं

 

कवि होना

कितना विचित्र लगता है

इस समय में

जब हर तरफ़ भाषा है

लेकिन कविता

पास होकर भी

पास नहीं होती;

जैसे भीड़ में खड़ा

कोई अकेला सिग्नल

बार-बार नो-नेटवर्क का आभॎस दे

 

प्रतीक्षा है—

कि कोई अनचीन्हा मर्म,

क्षणिक चिंगारी,

टूटन—

इस मानसिक जड़ता की

फ्रोज़न फ़ाइल

अनलॉक कर सके

***

कविता न लिख पाने का दुख –3

कविता का न लिख पाना

महज सृजन-अवरोध नहीं

भीतर से उठती एक अमिट टीस है

जो किसी रेगिस्तानी नदी की रेत सी

आँखों में बसी थी

जो कविता बनकर

बह निकली थी

 

वह रेत

अकेलेपन की परतों में जमकर

एक कठोर तलहटी में बदली

वहाँ भाव नहीं

आवाज़ें गूँजती हैं

किसी लौटी हुई प्रतिध्वनि की तरह

 

विसंगतियों के बीच

खो जाता है मनुष्य

संवाद टूटते हैं

रह जाते हैं रिश्ते औपचारिक स्पर्श भर

 

कवि का अकेलापन

निजी दुख से अधिक

एक सामुदायिक निस्पंदता का वहन करता है

शहर के भीड़भरे चौक में

बेचैनी बन उभरता है

वहाँ किसी गरीब की टूटी चप्पल में

नजर आती है सभ्यता की दरार

किसी स्त्री के मौन में

आँखों का पूरा इतिहास छलकता है

 

सिर्फ़ देखना नहीं

देखे हुए को महसूस कर

जीवन का ताप शब्दों में ढालना

जहाँ विसंगतियाँ इतनी हों

कि संवेदना सुन्न पड़ जाये

 

कविता न लिख पाने का दुख

एक गहराती घनी संवेदना है

कविता अपनी ही परछाई के बोझ से

दबी जा रही

मनुष्य का मन

अपने ही अंतर में झांकने से डरता है

कवि का मन

सबका भार लेकर चलता है,

अपना मार्ग भटक जाता है

 

दुख,

कविता की संभावना है

अकेलापन,

अपनी अंतिम सीमा लांघता है

सामाजिक संरचना

बिखरी है

समाज की उभरती दरारें

हृदय के भीतर दिखने लगी हैं

 

तब

किसी अनदेखी राह से

एक छोटा शब्द

उभरता है

वह

कविता का आरंभ है

***

संपर्क :

34/242, सेक्‍टर-3, प्रतापनगर, जयपुर – 302033

 

 

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