अनुनाद

भटकने से एक दिन मिल ही जाता है इस जनम के गूढ़ सवालों का जवाब/ योगेन्‍द्र पांडेय की कविताएं

 

courtesy : google

योगेन्‍द्र पांडेय की कविताएं प्रकृति, प्रेम, सौन्‍दर्य, आशा-निराशा, जीवन दर्शन के बीच विचरती रहती हैं। समकालीन कविता संसार में ये कविताएं कहीं-कहीं छायावाद और गीतिकाव्‍य के समय की भी याद कराती हैं। योगेन्‍द्र की कविताओं का अनुनाद पर पहला प्रकाशन है, उनका यहां स्‍वागत है ।               

                                                                                                                                                                                                                                                   

भटकना भी ज़रूरी है…

कभी-कभी भटकना चाहिए,

बिना किसी मंज़िल की फ़िक्र किए,

किसी अप्रत्याशित सफ़र में या फिर

लोकल रेल के डिब्बे में

अकेले-अकेले

ख़ुद की तलाश में।

 

इस भागती हुई दुनिया की भीड़ में,

हज़ारों चेहरों को पढ़ने के लिए,

दुःख-सुख की युगल-संगति से रूबरू होने के लिए,

भटकना चाहिए हफ़्ते में एक दिन या फिर

महीने में ही एक दिन —

छुट्टी के दिन।

 

एक कवि भटकता है कविता की तलाश में,

एक लेखक भटकता है

नए उपन्यास के

नायक की तलाश में।

 

भटकने से कभी-कभी मिल जाता है

मुश्किल दिनों के किसी सवाल का जवाब।

 

खिले हुए फूल पर भटकता है भौंरा,

शहद के वास्ते मधुमक्खियाँ,

बादल भटकते हैं बरसने के वास्ते।

 

भटकने से एक दिन मिल ही जाता है 

इस जनम के गूढ़ सवालों का जवाब।।

***

अँधेरा…

सिर्फ उजाले में ही सुंदरता नहीं है, बल्कि

अँधेरा भी होता है खू़बसूरत—

खू़बसूरत-सी रात, जिसमें

झलकता है गूढ़, गहन, गंभीर रहस्य।

 

रात के सन्नाटे में

खनक उठता है एक शांत संगीत,

जैसे वीणा की झंकार-सा

झींगुरों का स्वर।

 

अँधेरा वाकई खू़बसूरत है—

सितारों की झिलमिल-सी लड़ियाँ,

चहुँ ओर पसरी हुई

निस्सीम ख़ामोशी।

 

यह अँधेरा डूबता है मुझमें, या

मैं ही डूब रहा हूँ

इस सघन अँधेरे में,

सन्नाटे के रेले में।

***

चिड़िया होना ज़रूरी है…

चिड़िया का चहचहाना,

अपनी भाषा में गीत गाना—

कुछ तो कह जाती है ये,

जो नहीं समझ पाता आदमी।

 

ज़िंदगी को आसान बनाता है

चिड़िया का गीत,

प्रेम का संगीत;

ज़िंदगी को करीब से छूने के लिए और

प्रेम की भाषा सीखने के लिए

चिड़िया होना ज़रूरी है।।

***

मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ…

मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ 

पवित्र प्रेम के उन बंधनों से

कि जिसमें बँधकर हम हो गए 

दो देह एक आत्मा।

 

मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ 

उन सभी स्वप्नों से

जो कभी देखा करते थे 

एक दूजे की आँखों में झाँककर

कि ज़िंदगी को गुज़ार देंगे 

एक साथ सुख-दुःख निभाते हुए। 

 

मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ

उन सभी मिलन की यादों से

कि फिर कभी ना याद आऊँगा मैं

ना तुम होना कमज़ोर

ना आँसू आएं तुम्हारी आँखों में

कभी मेरे बारे में सोचकर।

 

मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ

अंतरात्मा के उन सभी बंधनों से

जो शायद किसी जनम से बँध गए हैं तुमसे

कि तुमको मुक्त करते हुए

ख़ुद कितना बँधता जा रहा हूँ

तुमसे, तुम्हारी यादों से

तुम्हारी अंतरात्मा से।।

***

ज़िंदगी एक कविता सी लगी…

काफी देर से विचारों का एक ऊहापोह 

मचलता रहा मन में

एक एक शब्द के संघर्षण से बन सकी

जीवन की कविता की एक पंक्ति

देर रात तक खोए-खोए

ख़ुद की तलाश में

भटकते हुए। 

 

न जाने कितना दुख उमड़ आता है

दुख बन जाता है महाकाव्य

करुणा उमड़ती है और

शांत हो उठता है हृदय

जीवन के हर एक पल में गूंजता है

विरह का गीत।

 

उम्र भर चलती रही एक 

अथक यात्रा

कभी गिरते रहे तो कभी संभलते रहे

ज़िंदगी के दुख-सुख को

रचते रहे कविता में

गाते रहे, गुनगुनाते रहे

मंचों से सुनाते रहे 

जीवनगाथा।

 

ज़िंदगी एक कविता-सी लगी

जब सुलझने लगी बेचैन साँसों की जटिलता

प्रेम में डूबा हुआ कवि रचता रहा प्रेमग्रंथ

आख़िरी साँस की डोर टूटने तक।।

***

इंतज़ार…

कभी-कभी एक-एक पल हो जाता है

एक विस्तृत युग के समान

मौसम बदलता है

गिरते हैं सूखे हुए पत्ते और

उग आता है नया-नया पत्ता

पेड़ों पर

कि जैसे मौसम को इंतज़ार था 

बसंत आने का। 

 

सब कुछ बदलने के बाद भी

नहीं बदलता है मेरे भीतर

तुम्हारा वह वजू़द

कि जिसे मैंने गढ़ा है

युगों-युगों के इंतज़ार से।।

***

नदी…

नदी की गोद में जन्मी हज़ारों सभ्यताएँ

नदी के प्रवाह में हज़ारों वर्षों तक

सफ़र करती हुई विकसित हुईं

दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताएँ।

 

सभ्यताओं के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए 

ज़रूरी है, नदियों का 

निरंतर प्रवाह 

नदियों के बहाव में घुला होता है 

शाश्वत जीवन का इतिहास। 

 

नदी के तट पर बैठकर मन में 

आ ही जाता है एक चिरंतन ठहराव

जबकि नदी की लहर में 

प्रवाहित होता रहता है 

एक सुंदर सभ्यता का गूढ़ रहस्य। 

 

नदी के पवित्र जल में होती है 

न जाने कितने लोगों की आस्था

इसके गर्भ में पनपता है 

मछलियों का सुखद संसार। 

 

मानव सभ्यता को 

निरंतर ज़िंदा रखने के लिए

नदियों को रखना होगा जीवित 

जीवित रखना होगा 

उन परंपराओं को भी 

जिन्हें हमारे पुरखे आदिकाल से 

निभाते रहे हैं

नदियों के सतत निरंतर 

संरक्षण के लिए ।।

***

सफलता का सुन्दर संसार…

महानता के शिखर पर 

अपनी पताका लहराने के लिए 

जरूरी है,

कड़ी मेहनत की ज़मीन पर उगना।

 

क्योंकि,

खेत के रस को

पूरा-पूरा चूसने के बाद ही उतरती है

गन्ने में मिठास।

 

संघर्षों की भट्ठी में तपा आदमी

गढ़ता है

सफलता का एक

सुंदर संसार।।

***

हे मेरी तुम…

तुम्हें देख कर एक उम्मीद सी उठती है 

ज़िंदा रहने के हज़ारों बहाने मिल जाते हैं 

तुम मेरे लिए हो जाती हो 

किसी देवी की तरह। 

 

मैं पूजता हूँ तुम्हें 

रचता हूँ तुम्हारे लिए गीत 

तुम हो जैसे फूल खिल रहे हैं 

तुम हो जैसे नदियाँ बह रही हैं 

तुम हो जैसे भोर होते हुए 

चहचहाती हुई गौरैया।

 

मैं तुम्हें याद करता हूँ 

हर क्षण, हर सांस में 

तुम समर्पण हो मेरी 

तुम तपस्या हो मेरी 

तुम्हारे बिना बिल्कुल 

अधूरा सा हूँ मैं

हे मेरी तुम।।

***

छाँह…

मैं किससे मांगू अपने हिस्से की छाँह?

उस पेड़ से जिसे मैंने कभी 

पानी दिया ही नहीं या

उस मकान से 

जिसमें मैंने एक ईंट तक 

नहीं जोड़ा।

 

मैं कहाँ मांगू अपने हिस्से की छाँह?

उस पिता से जिसके कभी पाँव 

दबाया नहीं या 

उस माँ से जिसके लिए 

कभी दवा की एक 

पुड़िया भी नहीं लाया।

 

ना मैंने कभी भाईयों को बांहो में भरा 

ना दोस्तों के दुःख सुख में शामिल हुआ 

ना गांव वालों के साथ खड़ा रहा 

फिर…

कहाँ मांगू अपने हिस्से की छाँह?

***

तुम्हारे आने की प्रतीक्षा…

तुम आना अबकी सावन की तरह 

रिमझिम रिमझिम फुहार लिए 

काले काले मेघ की तरह 

तुम्हारे घने कुंतल।

 

तुम मुस्कुराना तो 

बिजुरी सी चमक उठेगी मेरे हृदय में 

तुम गुनगुनाना तो 

एक चिड़िया चहक उठेगी उपवन में।

 

तुम्हारे आने की आहट से 

सजग हो जाते हैं बकरियों के कान 

रम्भाने लगती है

द्वार पर खूंटे में बँधी गाय।

 

तुम्हारा आना कितना सुखद होता है!

तुम्हारे आने से खिलतीं हैं कलियाँ 

तुम्हारे आने से लहकती हैं तितलियाँ 

तुम्हारे आने से महक़ उठता है घर आँगन

तुम्हारे आने से मेरे जीवन को

मिलती है एक नई दिशा।

 

तुम ऐसे जो चली आती हो तो न जाने कितने बंद द्वार खुल जाते हैं भाग्य के 

कि तुम्हारे एक चले आने की प्रतीक्षा 

हमेशा से रहती है मुझे।।

***

तुम्हारे क़रीब होकर…

तुम्हारे क़रीब होकर मैं सोचता हूँ 

तुम्हें देखूँ या प्यार करूं 

तुम अक्सर भूल जाती हो माथे पर बिंदी लगाना 

और मैं पूरा करता हूँ इस रिक्तता को।

 

तुम्हारे लिए मैं लाता हूँ गुलाब के फूल 

तुम्हारे काले घने केश बिना गुलाब के 

नहीं लगते हैं पूर्ण 

मैं खोस देता हूँ गुलाब 

तुम्हारे बालों में।

 

बिना पायल के नहीं सजता 

तुम्हारे क़दमों का संगीत 

मैं बांध देता हूँ तुम्हारे पाँव में 

पायल की छम छम।

 

तुम्हारे क़रीब होकर

मैंने चीज़ों को सहेजना सीख लिया है 

तुमसे सीखा है 

जीवन का संतुलन।

 

तुम्हें देखने और प्यार करने के लिए 

मुझे नहीं चाहिए किसी की इजाज़त

तुम्हारे क़रीब होकर 

मैंने जान लिया है 

जीवन का शाश्वत सत्य।।

***

तुम्हारे माथे की बिंदी…

हाँ…

ये तुम्हारे माथे की बिंदी 

कि जैसे कोई चमकता सितारा हो 

अँधेरे काले आकाश में

दीप्तिमान।

 

न जाने कितनी उपमाएँ मैं ढूंढता हूँ 

तुम्हारे धनुषाकार भौहों के बीच 

चमकती इस छोटी सी बिंदी के लिए 

कि जैसे ये बिंदी नहीं 

तुम्हारी सम्पूर्ण पहचान हो।

 

मैं तुम्हें कहता हूँ-

वो छोटी बिंदी वाली लड़की, 

थोड़ी चंचल थोड़ी गंभीर!

 

तुम जब खड़ी होती हो दर्पण के सामने 

निहारती हो ख़ुद को 

लगाती हो बिंदी…

एक छोटी सी बिंदी,

बस उसी क्षण पूर्ण हो जाता है 

तुम्हारा श्रृंगार 

बस उसी क्षण पूर्ण हो जाता है 

तुम्हारे भीतर का 

स्त्रीत्व।

 

मुझे पसंद है 

तुम्हारे माथे की बिंदी 

बड़ी नहीं 

छोटी सी बिंदी 

कि जिसमें खिल उठता है 

तुम्हारा मासूम सा चेहरा।।

***

भूलना…

कितना मुश्किल होता है 

किसी को भूलना 

कि जैसे नींद खुलते ही 

फूट जाता है सपनों का 

क्षणभंगुर बुलबुला।

 

कोई एक जो छू देता है कभी कभी 

हृदय को बहुत भीतर तक 

कि जिसके छूने से 

ज़‍िन्‍दा हो उठता हूँ मैं,

मिल जाती है कोई न कोई मंज़िल

कि जिसके पीछे दौड़ते भागते हुए 

गुज़र जाती है 

सुबह से शाम।

 

ये दुनिया कभी नहीं भूल पायेगी ख़ुद अपनी ही परछायी 

नहीं भूल पायेगी रोटी की 

जियोमीटरी और 

पानी के भाफ होने तक 

याद रखा जायेगा 

प्यास का अनुपात।

 

भूलना आसान नहीं होता जब कोई 

शामिल हो जाता है 

हर एक सांस में,

भूलना आसान नहीं होता जब कोई 

शामिल हो जाता है 

हर एक दुःख सुख में।।

***

संवेदनाएँ जब मर जाएँगी…

कागज़ के फूल में

सुगंध नहीं भर सकता आदमी,

बबूल के काँटे होते ही हैं

चुभने के लिए।

मरुथल में वही ज़िंदा रह सकता है

जो अभ्यस्त है रेत के तूफ़ान से

लड़ने के लिए।

 

जब पानी के रंग में मिल जाता है लहू का रंग,

फिर उसे लाल शरबत कह के

पीने वाले मिल जाते हैं — लोग

जो नहीं समझते हैं

पानी और लहू में फ़र्क।

 

पत्थर की मूरत में चाहे लाख मन्त्र फूँक दो,

वह नहीं बहा सकती आँसू

किसी बेगुनाह के क़त्ल पर।

किसी के दुःख पर रोने के लिए

कलेजे में करुणा होनी चाहिए।

भावनाओं का अथाह सागर ही

रूप गढ़ता है

मनुष्यता का।

 

जब संवेदनाएँ मर जाएँगी,

फिर एक बार होगा

धरती पर महान विप्लव।

मिट जाएँगी सभ्यताएँ

प्रकृति के कोप से,

फिर मानवता की मृत्यु पर

कोई नहीं जताएगा दुःख।

 

संवेदनाएँ प्राण होती हैं मानवता की,

संवेदनाएँ सौंदर्य हैं

मनुष्य की अंतरात्मा का।

संवेदनाओं का मर जाना —

मानवता का मर जाना है।।

***

 

कवि परिचय:

नाम : योगेंद्र पांडेय

जन्म तिथि : 28/05/1997

जन्म स्थान : सलेमपुर, देवरिया, उत्तर प्रदेश

पिता : श्री रमेश पांडेय, माता : आशा पांडेय

शैक्षिक योग्यता : M. A (English/Hindi), B.Ed

व्यवसाय: अध्यापक

विधा : छंद, कविता, गीत, मुक्तक

सम्मान: साहित्य केतु सम्मान, प्रेमचंद श्रीवास्तव स्मृति सम्मान तथा चंद्रशेखर सम्मान

विशेष: विभिन्न राष्ट्रीय काव्य मंचों से काव्यपाठ, विभिन्न राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं (वागर्थ, आजकल, साहित्य अमृत, ककसाड़, वीणा, गर्भनाल, जनकृति, सोच विचार, पतहर, साहित्य कुंज आदि) से प्रकाशित, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर काव्यपाठ.

email: yogendrap974@gmail.com

 

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