अनुनाद

देहरी/ कल्पना जसरोटिया

     कल्पना जसरोटिया की कहानी देहरी आज के समय में भी गॉंवों में खेती-मज़दूरी से बसर करने वालों की ख़स्‍ता-हालत, शोषण और अंधविश्‍वासों की तरफ़ इशारा करती है। जीवन रहते आदमी भले ही मुफ़लिसी में रहा हो, मरने के बाद उसकी सद्गति के लिए, उसकी पत्‍नी द्वारा मुआवज़े के लिए मुक़द्दमा लड़ने में अपना खेत रेहन पर रख देना, शत्रुओं से पैसे उधार लेना, मृतक की याद में बचे हुए खेत में देहरी बना देना, बेटे की संतान होने के लिए झाड़ फूंक कराना, अपने बेटे-बहू की ब-जाए अन्‍य की बात मानना और इन सबके चलते उसके बेटे-बहू का गाँव छोड़ शहर में मज़दूरी करने के लिए मजबूर हो जाना, कहानी का मूल विषय है। अनुनाद पर कल्‍पना … की कहानी का यह प्रथम प्रकाशन है, उनका यहॉं स्‍वागत है –

                                               –      अनुनाद

    

 

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गणेश पसीने से तरबतर मक्की के सूखे टांडे के पूले सर पर उठाये खेतों की तरफ़ से आया था और अपने कच्चे घर के बेह्ड़े (आँगन) से निकल, एक तरफ़ बने गोड (जानवरों का बाड़ा) जिसके सामने एक टीन को दो लकड़ी के थम्मों पर खड़ा कर बरांडा जैसा बनाया था, उस तरफ़ चला गया। उसने अपने सिर से पूले उतार, बरांडे की पिछली दीवार के साथ खड़े कर दिए थे। वहीं पास ही खूंटे से बंधी गाय और बछड़ा उसे देख रंभाने लगे थे। उसने बछड़े के सिर पर प्यार से हाथ फेर, अपने सिर पर बंधे परने को उतार उससे चेहरे पर आये पसीने को साफ़ किया। वह गोड के साथ बनी रसोई के दरवाज़े पर खड़ा हो गया।  वो अंदर अँधेरे में उषा की आहट लेने की कोशिश में था मगर ऊपर छत पर बनी बैठक से दो-तीन मर्दाना आवाजें और अपनी माँ, जिसे वो चाची कह बुलाता था, की मिली-झुली आवाज़ों से चौंक पड़ा था। हाथ में पकड़ा परना बाहर बिछी खट्ट (चारपाई) पर फैंक, उसने बैठक की खुली खिड़की के एकदम नीचे खड़े हो, कान ऊपर चल रही बातचीत पर धर लिए थे ।

                 “चाची, तू फ़िक्र न कर, हम भी तेरे बेटे की तरह ही हैं। जियां (जैसे) गणेशु, वैसे अस्स (हम)। बेफ़िक्र रह, ये बता काम कब शुरू करना है ?” भारी सी आवाज़ गणेश समझ गया, महिंदर पाईये (भाई) की थी ।

“कम्म, हम ऐसी त…त तसल्ली का काम करागे(करवाएंगे) ..दद ..दस ग्रां (गांव) ढूँढने पर भी ऐसा दे…दे ..देवस्थान नहीं मिलेगा। इसे दे..दे.. देखने यात्रु दू ..दू ..दूर दूर से आएंगे। च..च ..चाची, तू हां कर इक बारी  फ ..फ फिर दि ..दि ..दिखियां।”

         पंजाबू की आवाज़ की लटकन सुन गणेश को पहचानने में मुश्किल नहीं हुई थी। वह खड़े-खड़े एक ठंडे से पसीने में नहा गया, उसे लगा जैसे किसी ने उसकी टांगों से जान ही सोख ली हो। सामने से उसकी पत्नी उषा पानी की बाल्टी भर कर आ रही थी, उसने गोड के बाहर बंधी गाय और नवजात बछड़े के आगे पानी रखा और उसके पास ही आ खड़ी हो गयी थी।

“बोल तू ठीक रहा है महिंदर बच्चुया, तेरे चाचे की हत्या तो घर-बार पर लगी है पर गणेश से तो पूछना पड़ेगा, पैसों का मामला है, घर सलाह सूतर करना पड़ता है।”

“चाची, जी सदके करो सलाह मशवरे, करने भी चाहिए मगर घर की मोतवार (सरपरस्त) तो तुम ही हो, गणेशु तुम्हारे कहने से बाहर तो नहीं जा सकता। बैंक में सैन (हस्ताक्षर) तो तुम्हारे ही होने हैं, चाची।”

गुस्से के मारे गणेश से रहा नहीं गया और वो खट्ट से परना उठा, सिर पर बांधता हुआ बैठक को जाती सीढ़ियों की तरफ़ लपका। कुछ गरमा-गर्मी के अंदेशे से उषा थर्रा उठी और उसने गणेश की बांह पकड़ ली।

“क्या करने जा रहे हो जी, घर आये हुए लोगों से ऊँच-नीच ना कर बैठना, बोलने दो उनको जो बोलते हैं, आपने जी चाची को अंदर बिठा समझा लेना। ऐसे घर की बात बाहर उड़े, अच्छा नहीं लगता।”

“तू, हट पीछे उषा, मरे मांस पर गिद्द की तरह बैठने वाले लोग मुझसे अपने घर में बर्दाश्त नहीं होते, छोड़ मेरी बांह, उनका यहाँ आ कर चाची को उकसाने का क्या मतलब है ? अभी मैं जिंदा हूँ, बापू की तरह मर नहीं गया।”

गणेश उषा का हाथ छुड़वाते हुए ज़ोर से बोला। ऊपर बैठक में एकदम सन्नाटा छा गया। कुछ देर बाद, बैठक का पिछली ओर खेतों की तरफ़ खुलता दरवाज़ा फटाक से खुला और महिंदर और पंजाबू लोई की बुक्कल मारे अंदर से निकल थोड़ी दूर जाकर, गणेश के लहलहाते खेत की मेंढ़ पर पांवो के बल बैठ बीड़ी के कश लगाने लगे।

         “पंजाबू, अगर गणेश के बब्ब (पिता), दर्शन चाचे ने ये खेत हमसे वापिस ना लिए होते तो मैं भी सोलह कनाल का मालिक होता। अए ते शुक्र करो, बिजली के टावर का मुआवज़ा मिला और दुकान खोल ली, नहीं तो मैंने भी गणेश की तरह मजदूरी ही करनी थी।”

“पा ..पा . पाईया ..तुमने भी तो सांझे खेतर में लगे टावर के मिले मुआवजे की पूरी रकम अपने ख ..ख ..खीसे (जेब ) में ही डाल ली .आ ..आ ..आधे तो गणेश का भी बनता था।”

“बकवास बंद कर ओ ..ए ..ये ज़मीन और दादा हमारे पास थे तब तो, मुआवज़ा भी तो हमारे नाम ही होना था। दर्शन चाचा कर लेता केस, ले लेता आधी रकम, किसने रोका था ? वो मर-मुक्क गया, अब कौन देता मोएओं(मृतकों) के हिस्से ?”

बीड़ी को पांव के नीचे मसलते हुए महिंदर साथ बैठे पंजाबू की पीठ पर धौल जमाते हुए उठ खड़ा हुआ। दोनों अपने अपने रास्ते खिसक गए, मगर जो चिंगारी वो गणेश के घर में लगा गये थे, वो महीनों सुलगती रही ।

बेह्ड़े में खट्ट पर बैठे गणेश की आँखों में पुरानी बातें शहर में देखी, फिल्म की रील की तरह चलने लगी। गणेश और महिंदर के बापू दर्शन और रफलू सगे भाई थे। गणेश का दादा और ताया रफलू गांव में रह खेत और जानवरों की देखभाल करते थे। दर्शन खेतों में काम खत्म कर गांव से बाहर मजदूरी करता था। वो कुछ साल कश्मीर में सेबों के बागों में काम करके आया था और सेबों की ग्राफ्टिंग, प्युंद आदि लगाना सीख आया था। कश्मीर में एक–एक पेड़ से निकले सेबों से हज़ारों की कमाई होती देख उसकी आँखों में भी कुछ सपने पलने लगे थे। उनका गांव जम्मू के पहाड़ी इलाके में था और उसकी आबोहवा कश्मीर से मिलती-जुलती थी। गणेश के बापू को अपने हिस्से की ज़मीन पर सेबों का छोटा सा बाग़ लगाने का शौक़ चढ़ आया था। दादे के जिंदा रहने तक सारी ज़मीन का हिसाब-किताब रफलू के ही पास था। दादे के मरने के बाद दर्शन ने अपने हिस्से की ज़मीन की बात रफलू से की, “दर्शन, अभी चिखा (चिता) की आग तो ठंडी होने दे, मैं या तू ज़मीन कन्ने (साथ) लई जानी है, जैसे बापू होर ले कर गए हैं। बरसों तक बड़े कर्म-काण्ड करने पड़ते हैं, मुझे ही निभाने पड़ेंगे। तुम्हारी तरह रोज़ के रोज़ मजूरी के पैसे नहीं, मेरी जेब में आ जाते। बापूजी का हर महीने मासक देना पड़ेगा, तुम्हारा हिस्सा भी तो लगेगा, अब तुम हर महीने आ कर अपना हिस्सा देने से रहे।”

         दर्शन चुपचाप फिर शहर लौट गया मजदूरी करने के लिए, उसने सोचा था कि जब तक शरीर में दमख़म है, मजदूरी के साथ-साथ सेब और अखरोट खेत के अपने हिस्से में लगा दूंगा, बेटे के बड़े होने के साथ पेड़ भी बड़े होकर फल देने लगेंगे, बुढ़ापे में आमदन का ज़रिया हो जाएगा और उसके बेटे को  उसकी तरह दरबदर हो मेहनत मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी।

  गणेश दस–बारह साल का था, जब ताये रफलू को रिश्तेदारों के दवाब में दर्शन को उसके हिस्से की ज़मीन सौंपनी पड़ी, मगर चोर चोरी से जाये, हेराफेरी से न जाये वाली बात उस पर पूरी तरह से ठीक बैठती थी। ज़मीन के बंटवारे में उसने छोटे भाई दर्शन को तालाब के ऊपर की तीसरे हिस्से की ज़मीन दी, उसके एक ही खेत को तालाब का पानी पहुँचता था, बाकी ख़ुद के बड़े होने, उसकी मजदूरी की नगद कमाई और उसकी शादी और बापू के मरने के खर्चे के बहाने नीचे और आस पास वाले खेत अपने पास रख लिए थे।

         ज़मीन मिलते ही दर्शन, गणेश को साथ ले खेतों की मिट्टी की टेस्टिंग करवाने शहर जाता था।  मिट्टी के मुताबिक सेब की सबसे अच्छी वैरायटी के पौधे खरीदे और बड़े चाव से गणेश के हाथों लगवाये थे। गणेश को कुछ समझ तो नहीं थी, मगर इतना ज़रूर लगता था कि बापू बहुत खुश है और उसे भी अपनी ख़ुशी में शामिल करना चाह रहा था। वो गणेश की चाची को भी साथ चलाने को कहता मगर वो हर बार घर के कामकाज का बहाना बना, जाने से कतराती थी। उसे अड़ोस-पड़ोस के घरों की खैर-खबर लेने से फुर्सत मिले, तो वो भी जाती। दर्शन ने खू़ब मेहनत करके एक बड़े खेत में सेब के पेड़ लगाये, पेड़ों को बच्चों की तरह पालता, जानवरों से बचाने के लिए आस–पास बाड़ लगाई और पानी, खाद देने लगा रहता था। स्कूल से लौट गणेश को भी उसकी देखभाल में लगाए रखता था। मजदूरी कर कमाए पैसे और थोड़ी सी जमा-पूंजी कितने दिन चलती ? चाची सुबह–शाम ताने मारने लगी थी, “जब देखो मोये सेबों के साथ लगे रहते हो, जब फल देंगे तब देंगे, इधर शाम की पका लूँ तो सुबह का पता नहीं चूल्हे कुछ चढ़ेगा या नहीं। सबको अब इन निखिद्द सेबों के पत्ते खा पेट भरना पड़ेगा ।”

“गणेश की माँ, शुभ-शुभ बोला कर, देखना जब सेब लगेंगे तो रोज़ सेब खा-खा कर तेरी खाखान (गाल) भी स्याऊ (सेब) जैसी हो जानी हैं। बस कुछ सालों की बात है।”

“हूं ..सेब खाने ..अज्जे दी रोटी का ठिकाना करो कोई, लून-वसार (नमक–हल्दी) का भी बांदा (कमी) होने वाला है चूल्हे-चौंके में।”

दर्शन बगीचे के फेर में गांव में ही मजदूरी करता था, मगर जब पास में ही हाईवे पर टनल और सड़क का काम शुरू हुआ, काम जोखिम का था मगर मजदूरी थोड़ी अधिक थी, ये सोच वो सड़क के काम में ठेकेदार के साथ काम करने लग गया था। मजदूरी करते दसेक दिन ही हुए थे कि एक दिन सड़क बनाते समय वो पहाड़ से लुढ़क आये पत्थरों की चपेट में आ गया और हमेशा के लिए मौत के मुंह में चला गया था। ठेकेदार ने उसकी लाश घर तक पहुँचाने और अंतिम संस्कार में मदद कर अपना पल्ला झाड़ लिया, कहने लगा काम करते महीना भर भी नहीं हुआ, इसलिए मुआवज़ा नहीं बनता ।

         बापू के सारे सपने जैसे बापू के साथ ही चल बसे। सेबों के पौधे सही रखरखाव के बिना सूख गये थे, कुछ जानवर चर गये थे। गणेश कभी-कभी खेत में जा उन्हें पानी देता मगर न उसे समझ थी न जानकारी, एक ही साल में बापू की सालों की मेहनत चौपट हो गयी, उधर घर के बाहर ना निकलने वाली चाची मुआवज़े के लिए दर-दर भटक रही थी। ठेकेदार, पुलिस और कम्पनी के आला अफसरों के दरवाज़े की चौखट पर माथा टेकते–टेकते उसके माथे से उम्मीद की रेखा घिस जानी चाहिए थी मगर उसकी जिद्द की रेखा और गहरी होती जा रही थी ।   

                 जुझारू चाची ने अपने सोने का एकलौता ब्लाकडू बेच कर एक वकील की फ़ीस भर केस कोर्ट में दाखिल करवा दिया था। पहले-पहल तो गणेश भी कोर्ट में चाची के साथ जाता रहा था मगर फिर स्कूल और घर के काम काज में घिरा वो, जाने से कतराने लगा था। उसे हर बार कोर्ट से आ ऐसे लगता जैसे वो एक बार फिर बापू की चिता को आग देकर खाली और लुटापिटा घर लौटा रहा हो, उसने घर के हालात से समझौता कर लिया था। थोड़ी सी ज़मीन थी, उसी पर घर का दारोमदार था, मगर चाची को पता नहीं क्या जनून सवार था, वो लगातार कोर्ट कचहरी के चक्कर काटती जा रही थी । वकील को देने के पैसे भी पता नहीं कहाँ से लाती थी ? गणेश ने कभी पूछा नहीं और चाची ने कभी बताया नहीं ।

जिन सेबों की खेती ने गणेश को मजदूरी की चक्की से पिसने से बचाना था, जब वो ही नहीं बचे तो गणेश उस जान निचोड़ने वाली मजदूरी से फिर कैसे बचता। स्कूल के बाद, दो तीन साल शहर में मजदूरी करके जो थोड़े पैसे जमा किए, उसी पैसों से चाची ने गांववालों को धाम खिला और दस-पंद्रह लोगों की बरात भेज, उषा से उसकी शादी रचा दी। माँ और बीवी की जंजीर ने उसे फिर कभी शहर जाने नहीं दिया था।  अब गणेश गांव में रह कर ही खेतीबाड़ी का काम देखता और कभी मनरेगा तो कभी राज मिस्त्री के साथ काम पर लग जाता था। अपने बापू का देखा सपना उसे याद था, वो हर साल थोड़ेथोड़े पैसे बचा कर एक-दो सेबों के पेड़ खेतों के मेढ़ों के साथ साथ लगा देता था ।

उधर चाची बहू को घर–डंगरों का काम सौंप, ख़ुद दुआले (पुजारियों) के चक्कर लगाने लगी थी। कोर्ट-कचहरी के मामले और वकीलों की मांगों के आगे शायद उसकी जेब जवाब देने लगी थी, मगर हिम्मत और आस नहीं। हर बार तारीख पर जाती और हर बार कुछ और मायूस हो कर लौटती मगर अगली तारीख पर फिर उठ खड़ी होती थी। गणेश ने कई बार दबे स्वर में माँ को इस झूठी आस की छड़ी को तोड़ने के कहा था।

         “चाची, तुम किन चक्करों में पड़ी हो? गरीबों की कहां कोई सुनवाई है? थक नहीं गयी इतने सालों से वकीलों, अदालतों के चक्कर लगा-लगा कर ..छोड़ो इसे अब इस उम्र में घर बैठ, अपनी बहु से सेवा करवाओ ।”

गणेश ने पास बैठी चूल्हे पर मक्की की रोटी थापती उषा की तरफ नज़र भर कर देखते हुए कहा ।

“बच्चुया, तेरे बापू की मौत अभी भूली नहीं हूँ, जब भूल जाउंगी, थक जाउंगी, हार जाउंगी, तब जाना छोड़ दूँगी। तुमसे तो नहीं मांग रही न? तुम संभालो घरबार, मुझे अपना काम करने दो।” हाथ में पकड़े हुक्के की टोपी की राख को चूल्हे में डाल, उसमें फिर से ताज़ा सुर्ख कोयलों को डालती हुई चाची भी गरम कोयलों सी लाल हो उठी थी ।

         गणेश ने उसके बाद फिर कभी चाची के साथ ये बात नहीं छेड़ी। उषा थोड़ी पढ़ी-लिखी लड़की थी और उसकी अजीब सी जिद को देख चुप रहती थी।

         एक दिन महिंदर, एक कटन्ना(तंग पायजामा), मटमैली सफ़ेद कमीज़ के ऊपर वास्केट और सिर पर साफा लपेटे एक अधेड़ आदमी, जिसे वो दोआला बोल रहा था, को शाम ढले चाची के पास ले आया। वो व्यक्ति सुर्ख मिची-मिची आँखें, मोटा नाक और कान के ऊपर निकले लंबे बालों से जंगली भालू सा लग रहा था। चाची उन दोनों को देख कर उछलती हुई, सीढियां चढ़, बैठक का दरवाज़ा खोल, उन्हें अंदर लिवा लाई। उसने अंदर दीवार के साथ खड़ी खट्ट सीधी कर पास टीन की पेटी पर रखे संदूक पर गोल करके रखी खिंद (कपड़े की तलाई) और चारखाना कम्बल उसपर डालकर उन्हें बिठा दिया था।  ख़ुद वो रसोई में काढ्नी में रखी चाट्टी से दूध के गिलास में ऊपर तक मलाई की मोटी परत सजा कर उनके लिए ले आई थी। चूल्हे के आगे साग काटती उषा को कौतुहल हुआ मगर वो चुपचाप साग काटती रही। आज गणेश नयी गाय देखने अपने ससुराल के पास वाले गांव में गया था, उसे कल लौटना था ।

                 उषा साग को चूल्हे पर चढ़ा, मक्की का आटा लकड़ी की पात्र में डाल गीला करने ही लगी थी कि रसोई के बाहर से ही हल्की खांसी करता महिंदर अंदर आ गया। उसने कपड़े के बने दो भारी थैले नीचे ज़मीन पर रखे और बगल में दबाये काले मुर्गे को बाहर लेकर चला गया। गोड के बाहर पड़े टोकरु के नीचे मुर्गे को दबा कर टोकरु के ऊपर, पास ही पड़े भारी पत्थर को रख, वो फिर रसोई में लौट आया था। उषा को थोड़ी और लकड़ियाँ लाने को बोल वो, ख़ुद गुड़ पानी में घोल मोटे-मोटे रुट पकाने लग गया। रसोई की कच्ची दीवार पर लकड़ी की फट्टे पर सजे बर्तनों में से पीतल की थाली ले, उसमें सेंती (पीली) सरसों, हल्दी, रंगीन रोली, गुग्गल धूप, पीले फूल, माचिस, आटे का दीया और मीठे तेल की शीशी सजा कर बैठक में ले गया ।

                 उषा इन कर्मकांडों से भयभीत, सब काम छोड़ रसोई के एक कोने में बिन्ने पर बैठी कांप रही थी। महिंदर के बाहर निकलते ही वो साग की कुन्नी चूल्हे से उतार, चुन्नी को चेहरे पर डाल, नीची नज़र से आसपास होती हरकतों को दम साधे देखने लगी। थोड़ी देर बाद सिर्फ़ पीली धोती पहने और ऊपर से नंगे बदन दोआला रसोई के अंदर आया, उसके एक हाथ में वो पीतल की थाली और दूसरे हाथ में काले मुर्गे की गर्दन का ऊपर का हिस्सा था। मुर्गे की गर्दन से खून टपक रहा था और उषा को सिर पर डाली चुन्नी के अंदर से मुर्गे की आँख की पुतली हिलती हुई नज़र आ रही थी। एक वहशत और करुणा का मिला-जुला संवेग उसके कलेजे को अंदर से जैसे धौंकनी की तरह कभी सिकोड़ने और कभी फुलाने लगा, पसीने से तरबतर वो उबकाई से बचने के लिए बाहर भागी और अपने कमरे में बिस्तर पर औंधी लेट गयी ।

         कुछ देर बाद उसके कमरे के बाहर हलचल हुई और चाची और दोआला उसके कमरे में आ गये।  दोआले  के हाथ में पकड़ी लोहे की बड़ी सी कड़छी में अंगारों पर कुछ पत्ते जल रहे थे और धुएं की स्लेटी हिलोर सारे कमरे में भर रही थी। उषा सहम कर उठ कर खड़ी हो गयी, उसे तेज़ खांसी का दौरा पड़ा।  दोआले की आँखें लाल थीं और उसने आगे बढ़ कर उषा का हाथ पकड़ा और उसकी आँखों में झांकता हुआ, उसकी कलाई दबाई, कलाई पर जोर पड़ने से उषा नीचे बैठ गयी ।   

“ये बहू है मेरी, तीन साल हो गये कोई जागत, नयाना (बच्चा) नहीं आया गोदा, आप देखें महाराज, इसको कोई भभूत या हाथ होला करें।”

“इसे भी हत्या लगी है, किसी ने योगन पीछे लगाई है, माँ कालका और कालीवीर ने चाहा तो सब ठीक होगा, माता जी। मुझे आवाज़ पड़ी है इस लड़की के लिए, कारी (अनुष्ठान) करनी पड़ेगी।”

“महाराज, आप ही है जो कुछ कर सकते हैं, जागत गणेश तो कुछ समझता नहीं, आप महिंदर को कारी का सारा सामान समझा देना, बस अब आप पर ही सारी आस-उम्मीद है।” चाची दोआले के पांव पर झुकती हुई बोली थी।  

         चाची ने डर से पीली पड़ी उषा को भी माथा टेकने के लिए इशारा किया, उषा ने हाथ में दुपट्टा पकड़ दोआले के पांव छुए और पीठ घुमा, दीवार की तरफ़ मुंह करके खड़ी हो गयी थी। दोआला खडाऊं खड़काता बाहर खड़े महिंदर को ले ऊपर बैठक में चला गया था। उषा डर के मारे रात को रसोई में भी नहीं गयी और कुण्डी चढ़ा कर अपने कमरे में दुबकी पड़ी रही। वापिस आने पर गणेश को उसने बीती रात का कुछ नहीं बताया।

                 कुछ दिनों बाद उषा बाहर बेह्ड़े में प्लास्टिक के तिरपाल पर सूखने रखी मक्की को हिला रही थी। दो ढेर थे, एक सूखने डाले दो-तीन दिन हो गये थे, एक अभी सुबह ही वो और गणेश बोरियों में डाल कर खेतों से लाए थे। गणेश अभी भी खेतों में टांडे इकट्ठे करके कुन्नु (घास का कुप्प) बनाने की तैयारी कर रहा था। अगली सुबह कुन्नु बनाने और मक्की के दाने निकालने में मदद करने के लिए मोड़े (मोहल्ले) के कुछ लड़के आने थे। उषा को खेतों से घर भेजते समय गणेश कहा कि कल कमेर (इकट्ठे का साँझा काम) पर आने वाले लड़कों के लिए कड़ाह (हलवा) बनाने के लिए शाम को सूजी लेने पास की दुकान पर जाएगा, इसलिए थोड़ी देर से आयेगा। चाची सुबह से शहर कचहरी गई हुई थी, अभी तक लौटी नहीं थी। घर में अकेली उषा छल्लियाँ हाथ से आगे पीछे करती हुई सोचों में गुम है, चाची को बच्चे की चाह है, सास तो सास ही होती है, ये तो गणेश अच्छा है, कभी कुछ नहीं कहा। चाची की कारियों और टोटकों के कुछ होगा ? इन छल्लियाँ की तरह कहीं मेरी कोख तो नहीं सूख रही। चाची कहीं गणेश का दूसरा विवाह तो नहीं करने की सोचने लगेगी? मेरी बचपन की सहेली सुनीता को भी उसकी सास ने दो साल बाद मायके भेज दिया था। नहीं ..नहीं ..मैं भी पता नहीं क्या सोचती रहती हूँ।

                 तभी कहीं दूर से ढोल बजने की आवाज़ उसके कानों तक पहुंची। आहिस्ता–आहिस्ता ढोल-बाजे की आवाज़ पास आने लगी, उसे खटका सा हुआ, जब ढोल की आवाज़ घर के पिछवाड़े में से आने लगी तो वो जल्दी से बैठक की बाहरी दीवार की ओट से बाहर रास्ते की तरफ़ देखने लगी, जहाँ से आवाज़ लगातार आ रही थी ।

         उसने देखा उसकी सास के गले में हार डला हुआ था और उसका झुर्रियां से भरा चेहरा ख़ुशी से चमक रहा था, ढोल पर महिंदर पंजाबू, रोमेलू और मोड़े के कुछ और लड़के नाच रहे थे। भीड़ के पीछे पेड़ के नीचे गणेश भी खड़ा था, उसके माथे पर बल पड़े हुए थे, उषा से नज़र मिलते ही वो भीड़ से किनारा करते हुए बैठक के पास आ गया। हाथ में पकड़े कपड़े के थैले से सूजी की पुड़िया उषा को थमाते हुए बोला,

         “उषा, चाची मुकद्दमा जीत गयी है। मुझे भी अभी-अभी पता चला है। महिंदर पाई ने बताया कि वो कम्पनी सारे पैसे दे देगी।”

“सच्ची, ये तो बड़ी खरी गल्ल सनोची (सुनी), मातारानी ने चाची की मेहनत और हिम्मत का फल दिया। शुक्र हे भगवान, तेरा मता मता शुक्र।”

 उषा के हाथ ख़ुद–ब–ख़ुद जुड़ गये। वो आगे हो कर चाची के पांव छूने झुकी तो ख़ुशी से कुप्पा हुई चाची ने उसे गले लगा लिया, दोनों की आँखों में आंसू थे। चाची ने थैले से निकाल, लिफाफे में डाली जलेबियाँ सबको बांटी।

         “नहीं चाची, आज तो जलेबी से मत टरका। आज तो कौड़ा कुट्ट (शराब) बनता है। ये खुशियों वाला दिन रोज़ रोज़ थोड़ी आना। ना चाची आज नहीं हम खाते सखनियाँ जलेबियाँ।” महिंदर ने मूछों को ताव देते हुए कहा ।

  “चाची, वीर ठीक बोल रहा है ..दद दद देनी पड़ेगी बधाई आज तो ..ह्ह्ह हम नहीं खाली जाने वाले। दददद दे चाची बधाई ..त..त मेरी होए कड़माई।” पंजाबू अपने राग अलापने लगा था ।

 “तेरा मुंह लीकिया पंजाबू, तुझे अपने विआह की पड़ी रहती है। ले महिंदर पुतर, मेरे पास कौन से खज़ाने पड़े हैं।”

चाची ने सौ के दो करारे नोट अपनी कमीज़ के नीचे से निकल कर महिंदर को दिए ।

         ख़ुशी की रुनझुन सी घर में पसर गयी थी, उषा का घूँघट के नीचे से चेहरे पर मुस्कान का पसारा था, चाची कभी रसोई, कभी बैठक और कभी गोड अंदर बाहर पगलाई सी आ जा रही थी। खामोश था तो सिर्फ गणेश, वो माथा सिकोड़, कुछ सोच में पड़ा हुआ था। चाची तो नहीं मगर उषा देख रही थी, मगर उसने उसे अभी छेड़ना मुनासिब नहीं समझा। रात का खाना खाने के बाद चाची हुक्का ले चूल्हे के पास बैठी थी, रोज़ की तरह शाम को बैठक में जाकर सो नहीं गयी थी। उषा बर्तन समेटने में लगी थी और गणेश गुड़ की ढेली हाथ पर रख थोड़ा–थोड़ा मुंह में डाल रहा था।

         “चाची, पैसे तो जब मिलेंगे तब मिलेंगे, ये बता वकील की फीस कितनी तारनी है? उसे भी तो देना है, वकील तो मुफ्त में अपने सगे बाप का केस नहीं लड़ता। कितने बोले हैं उसने ?”

“गणेश, तू क्यों फ़िक्र करता है? उसके बनते–सरते पैसे में साथ-साथ देती रही हूँ, किसी का एक धेला नहीं रखना मुझे।”

चाची बची हुई जलेबियाँ, जो उषा कटोरे में डाल उसके सामने रख गयी थी, को चबाती हुई बोली।

“तेरे पास कहाँ से पैसे आये वकील की फीस देने के लिए? गहना–गट्टा तो पहले ही कहाँ था हमारे पास?”

“वो तेरे ताये और महिंदर ने बड़े मदद की है। अभी तक उन्हीं से ले-ले कर काम चला रही थी। पहले तो इतने साल ऐसे ही देते रहे, बिना लिखत-पढ़त के मगर पिछले साल महिंदर ने कागज़ों पर अंगूठा लगवाया था। उनके खेत से लगता अपना खेत रहन रखा है। पैसे कौन से रुखा (पेड़ पर) लगदे, कि मान्नु त्रोड़ी लै ? शुक्र करो केस हमारे हक में हो गया, ये तो सत है मेरी सुक्खन का, कुलदेवी का आशीर्वाद है।”

 ये सुन गणेश के गले में जैसे गुड़ नहीं ज़हर आ गया हो। उसका रंग फक्क पड़ गया था, गुड़ को उधर ही फैंक, वो तेज़ी से बाहर चला गया था। चाची अपनी रौ में जलेबियाँ खाती रही और भजन गुनगुनाती हुई बैठक की तरफ सोने चली गयी। गणेश और चाची की उस दिन से बोलचाल बंद थी।

         आज, उसी महिंदर और उसके शराबी दोस्तों को जब उसने अपने घर की बैठक में बैठ चाची से बातें करते सुना तो उसे सने कपड़े आग मच गयी। उषा के समझाने और रोकने पर वो रुक तो गया मगर अपने हाथ से अपनी ज़मीन अपने शरीकों के हाथ जाने पर गुस्से और क्षोभ का ज्वालामुखी उसके अंदर से उबाले खा रहा था। अगली सुबह उसने देखा था कि महिंदर एक मजदूर को फीता पकड़ा, अपने खेत के साथ लगते गणेश के खेत की पैमाइश कर रहा था। घायल सांप सा फुंकारता गणेश पीठ घुमा, चारा काटता रहा ।

         “सस्सू अपनी को समझा ले उषा, ये महिंदर और उसके चेले-चांटे आगे से हमारे घर दिखने नहीं चाहिए। डेढ़ किल्ला अपने हिस्से का था, उसमें से भी दस मरले सूदखोर ताये ने हड़प ली है। अब इनकी नज़र मुआवज़े वाले पैसे पर है।”

 “जी, मुझे ख़ुद अंदर से डर लग रहा है। पहले भी चाची आपके पीछे से दोआले को घर लेकर आई थी, कोई कर्म काण्ड करवाया था। चाची को लगता है कि दोआले की कारी से केस हमारे हक में हुआ है, वो तो हमारे घर में बच्चे के लिए भी कोई उपाय करने को कह रही थी। हद ही हो गयी जादू-टोने की।”

“महिंदर को तो मैं देख लूँगा, उसे क्या लगता है, मुझे उसकी चालाकी समझ नहीं आती? रेहन पड़ा खेत कहीं मुआवज़े की रकम से छुड़वा ना ले इसलिए अब देहरी पर ख़र्चा करवा रहा है। चाची को समझ क्यों नहीं आती ? अब जब घर में ही शरीकेबाज़ी चल रही हो तो बाहर वालों का क्या दोष ?

कुछ दिन तक घर में तनातनी चलती रही, गणेश गुस्से में घूमता रहा और चाची मुआवज़े के पैसे के लिए कभी कोर्ट, कभी वकील और कभी बैंक के चक्कर लगाती रही। कभी महिंदर को ले गांव के सरपंच और कभी अपने मोड़े के पंच के घर जा रही थी। गांव वालों ने देखा कि महिंदर की मोटरसाइकिल के पीछे बैठ चाची शहर आ जा रही थी ।

                 गणेश एक खेत में पहाड़ी आलू लगा रहा था और एक में राजमा लगाने की सोच रहा था। चारे के लिए मुश्किल होने वाली थी। वो सोच रहा था कि आलू बेच कर जो दो पैसे हाथ में आयेंगे, वो बैठक और रसोई की बाहरी दीवारें पक्की ईंटों की चुनवा देगा, पलस्तर बाद में देखेंगे। सोचों में गुम उसका ध्यान महिंदर की आवाज़ से टूटा, उसने देखा महिंदर और एक और बंदा उसके घर के पिछले रास्ते से पेड़ों के पीछे से बातें करते जा रहे थे। उसके कान खड़े हो गये मगर चाची को साथ न देख वो सुर्खरू हो गया, “हे भोले शंकर! सब खैर करियां,” हाथ जोड़ वो फिर गर्दन नीची कर छोटे छोटे आलू ज़मीन में दबाने लगा रहा ।

         मगर उसके पीछे से दोआले का घर पर आना-जाना फिर शुरू हो गया। इस बार उसके बापू जोकि अपगति मरा था, उसकी आत्मा की शांति के लिए देहरी के लिए एक जगह की तलाश थी। एक दिन ठंडा वार देख चाची मोड़े के बड़े-बूढ़ों को बुला लाई थी। महिंदर अपने बापू रफलू के साथ आगे-आगे चला हुआ था। बैठक में धूप-बत्ती कर दोआले ने जोर से चीख मारी और लकड़ी के पटरे के सामने से लाल रंग से टीका लगी छड़ी उठाई और छड़ी को हिलाता हुआ, बैठक के दरवाजे़ से बाहर आ गया।  सारे मर्द फूल और चावल बरसाते हुए, उसके पीछे-पीछे चल पड़े थे। चाची, एक टोकरी में लाल सुनहरी गोटे लगी चुन्नी में देहरी का पत्थर लपेट, थाली  में गरमा-गर्म कड़ाह और बेह्ड़े से चुने गेंदे के फूल एक बड़ी परात में डाल पीछे-पीछे चली जा रही थी।

         गणेश अपने बचे हुये खेत में लगे आलू की गुड़ाई कर रहा था। वो कागज़ पर अंगूठा लगवा लेने के बाद वाली घटना से उखड़ा हुआ था, सूदखोर ताये और महिंदर से अधिक उसे अपनी माँ पर गुस्सा था। सुबह वो घर पर लोगों का आवागमन देख पहले ही घर से खेत के लिए निकल गया था। उस टोले को आते देख वो बोंगड़ी एक तरफ़ कर कमर पर हाथ रख उसे देखने लगा था। गणेश को अपनी तरफ़ देखता देख महिंदर और जोर–शोर से गढ़वे से गंगा जल दोआले के हाथ में हिलती छड़ी के आगे-आगे छिड़कने लगा था। सब गणेश के खेत के बीचों-बीच निकल खेत के तालाब वाले कोने में जमा हो गये थे। दोआले ने जोर से ललकार मार, छड़ी ज़मीन में गाड़ दी। रफलू ने झट से पीछे-पीछे चलती गणेश की माँ से परात ली और दोआले को पकड़ा दी। दोआले ने गंगाजल छिड़का, देहरी का पत्थर उठा कर छड़ी के पास टिका दिया और उसे लाल चुन्नी से लपेट दिया। फिर देहरी पर लाल टीका लगा, फूल चढ़ाये और माथा टेकने का इशारा किया। सब लोगों ने पैसे, फूल चढ़ा, माथा टेका और प्रसाद का कड़ाह मुंह में ठूंसने लगे थे।

         “लो माता जी, आज से मोहरे की स्थापना इस स्थान पर हो गयी, अपने समर्थ के हिसाब से देहरी बनवा उसकी देखभाल करो, पुण्य आत्मा आप पर परसिन्न हो, समस्त परिवार का कल्याण करेगी।”

दोआले ने चाची से दक्षिणा अपने बड़े से थैले में डालते हुये प्रवचन दिया। सब अपने-अपने घरों को लौट गये। मगर गणेश के घर का सकूं फिर कभी नहीं लौटा। उषा माँ-बेटे के बीच के इस अबोले की दीवार से बेहद परेशान थी, वो सारा दिन काम करती मगर सोचों के समंदर की थपेड़ेदार लहरें उसके कलेजे को मथती रहती थीं। परेशान तो गणेश भी था, मगर वो मन की गाँठ खोलने को तैयार नहीं था।

         उषा रसोई और बैठक के बीच की दीवार में पड़ी बड़ी सी दरार को पाटने के लिए, मिट्टी और चलैतर चीड़ के सूखे पत्ते) को मिला कर घानी (मिट्टी का घोल) बना रही थी, सवेरे से अकेले ही लगी थी। गणेश उसे अकेले काम करते देख, उसके पास आ उसे मिटटी के लोदे पकड़ाने लग गया, उसे अपने साथ काम करते देख उषा के हाथों में तेज़ी आ गई थी। उसने देखा गणेश के हाथ मिटटी में सने थे और दिमाग किसी उलझन में। आसपास कोई ना देख, उषा ने मिट्टी पकड़ाते गणेश के हाथ को पकड़ लिया। गणेश ने सिर उठा कर उसकी ओर देखा और हाथ छुड़ा, वहां से चला गया, उषा ने पास पड़ी बाल्टी में पड़े पानी से हाथ धोये और दुप्पटे से हाथ पोंछती उसके पीछे भागी।

         “जी, देखें, ऐसे मुंह चढ़ाने से क्या होगा? कोई परेशानी है तो बता क्यों नहीं देते ?”

“उषा परेशानी तो है ही, इस बार सोचा था नीचे तालाब के साथ लगते खेत में सब्ज़ी लगा लूंगा, बड़ी सड़क पर दुकानदार सब्जी और आलू के नगद पैसे देता है। कुछ नगद और कुछ इधर-उधर से उधार उठा कर बैठक और रसोई पक्की करवा लेंगे, कब तक मिट्टी लगा-लगा हलकान होती रहोगी। बरसात होते ही हर साल वही हाल हो जाता है।”

“हो जाएगा मकान भी पक्का, फ़िक्र क्यों करते हो, जी ?”

“फ़िक्र तो अब मुझे उस खेत की है, महिंदर ने उस खेत में चाची को पीछे लगा मोहरा रखवा दिया है। कल को देहरी भी उधर ही बनेगी, जिस तरफ़ से पानी का नाडू (नाली) खेत को आता था, उधर देहरी का चबूतरा बनवा रहे हैं, बाकी बचे खेत को पानी लगेगा भी तो कैसे ?”

“बात तो फ़िक्र की ही है, आप चाची से बात करो, बड़ी है हमारे घर की, माँ है। तीन तो गिनती के लोग हैं घर पर, वो भी ना मिल कर बैठें तो क्या फ़ायदा एक घर में रहने का। लोगों को तो बहाना चाहिए होता है बातें बनाने का।”

“बनाते रहें, जब लोगों के पीछे लगना है तो फिर तो ये होना ही है। अपनों से प्यारे तो चाची को दूसरे घर वाले लगते हैं, उन्हीं से करे सलाह–सूत्र, शरीक बड़े पंच बना रखे हैं चाची ने।”

“ऐसे उखड़े–उखड़े रहने से घर चौड़ हो जाएगा। आप एक बार कर लो ना साफ़-साफ़ बात।”

“चाची ने पहले कभी सलाह की है ,जो अब करेगी ? अब कुछ बोले तो सोचेगी, मेरे खीसे पैसे आ गये तो सलाहें देने लगे हैं। बंदा करे तो क्या करे?”

हाथ धो गणेश कुल्हाड़ी से लकड़ियाँ काट छोटी-छोटी बसाठियाँ (जलाने लायक लकड़ी) बनाता हुआ बोला।

न तो गणेश ने ही चाची से कोई बात पूछी, कही, ना ही चाची ने अपने पत्ते खोले। महिंदर अक्सर गणेश के घर ना होने पर चाची के पास आ बैठ जाता और दोनों देहरी के लिए प्लान बनाते, मगर उषा के आसपास होने पर बात बदल देते थे।

         कुछ दिनों में राजमिस्त्री और मजदूरों ने पक्की देहरी खड़ी कर दी। पच्चीस बाय पच्चीस फुट के चोंत्ड़े पर घढ़े पत्थरों की दीवारें और ऊपर मंदिर जैसा गुम्बद जिसके ऊपर पीतल के कलश की स्थापना की हुई थी। गेरुआ रंग की पुताई और धर्म चिन्हों से सजी देहरी, खेतों के एक तरफ बनी, सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींच रही थी। गणेश के दिल में उसे देख पिता, जिसकी याद में वो देहरी बनी थी, उनके दर्द और उनके टूटे सपनों की निशानी की हूक उठती। स्थापना की पहली रात वो और उषा भी चाची के साथ पूरी रात पूजा में बराबर बैठे और पूरे दिल से भंडारे में हाथ बंटाया। रफलू और महिंदर के सीने पर दोनों पति-पत्नी को वहां देख सांप लौट रहे थे, मगर दुनियादारी और अपने इतने सालों के मंसूबों पर इतनी जल्दी पानी ना फिर जाये, इसलिए बाप-बेटा दिखावे की चादर ओढे़ बैठे थे।

पक्की देहरी के लिए रास्ता या तो रफलू के खेतों के साथ लगते उस खेत से जाता था, जिसको गणेश की चाची ने महिंदर के पास रेहन कर दिया था या फिर गणेश के हिस्से के खेत के बीचों-बीच। स्थापना के बाद जब देहरी तक पक्के रास्ते को बनाने की बात चली तो महिंदर अड़ गया, उसने गणेश की ज़मीन, जो उसके पास थी, वहां से रास्ता देने से साफ़ मना कर दिया।

“गणेशु, ये बात कोई बनती नहीं, देहरी तेरे बाप की है, तू रास्ता दे ना दे, तेरी मर्ज़ी, तू कौन मैं खामखा? मुझे क्या चट्टी पड़ी है रास्ते देने की?”

“पापा, वो ज़मीन चाची ने बिना मेरी सलाह के तेरे हवाले कर दी, मेरे पास दो लिन्द्रू (छोटे खेत) ही हैं, उसमें भी अगर रास्ता निकल गया तो मेरे पल्ले क्या रह जाएगा ? कुछ तो सोचो।”

“वो तू जाने या चाची, तुम्हारे घर का मामला है। वो खेतर मैंने मुफ्त में नहीं लिया, इतने साल केस और वकीलों की फीस भरी है मैंने, कोई धरमशाला नहीं खोल रखी, ना ही रुपयों का पेड़ ही लगा है मेरे घर। जा-जा अपना रास्ता नाप।”

महिंदर कंधे पर रखे तौलिये से अपने पांव और जूते झाड़ते हुये, अपने घर के बाहर लगी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ, गणेश सिर नीचे किये उनके घर से निकल गया। चाची से बात करनी ही पड़ेगी, ये सोच वो मजदूरी के लिए निकल गया।

शाम को खाना खाने के बाद उषा और गणेश अपना-अपना दूध का गिलास पकड़, बैठक में चाची के बिस्तर के पास आ बैठे। चाची जो नींद में ऊंघ रही थी, उन दोनों को वहां देख उठ कर बैठ गयी।

“सो ते नहीं गयी चाची?”

“न कुत्थे (कहाँ), बुड्ढी आँखों में कहाँ निंदर? सब राजी है, तुस्स दोनों इधर, क्या बात है ?”

चाची कोहनियों से सिरहाने को धकेल सीधी बैठती बोली थी ।

उषा और गणेश ने आँखों ही आँखों में बातचीत शुरू करने का इशारा किया तो चाची की तेज़ नज़रों ने वो हरकत पकड़ ली, वो सध कर बैठ गयी थी ।

गणेश ने आगे हो, चाची की चारपाई की पाट पर दोनों हाथ रख कहना शुरू किया, उसने महिंदर से सुबह हुई सारी बात उसे सुनाई और अपने अंदेशे भी समझाने की कोशिश की ।

“देख ना चाची, अगर बचे हुये खेत से रास्ता भी निकला तो दो हलों की जगह भी नहीं बचती, आगे ही खाने-पीने लायक ही अनाज होता है, तालाब के पानी का रास्ता बंद हो गया, वो खेत भी बेकार हो गया। जानवरों के लिए घास खरीदना पड़ा तो बचेगा क्या?” वो मुड़ कर तस्दीक के लिए जैसे उषा का मुंह देखने लगा।

उषा भी  बोल पड़ी “चाची, ख़ुद ही सोचो, अगर वीरजी थोड़ी ज़मीन वापिस कर दें तो आधा रास्ता उनके खेत से और आधा अपने से निकल जाये तो दोनों का फ़ायदा। देहरियाँ और मंदिर तो सब के सांझे होते।”

उषा बोल तो गयी मगर चाची की सत्ता को जैसे किसी ने दिमाग़ी मार देने की कोशिश की हो।

“तेरे बब्बे (पिता) की देहरी, रास्ता भी हमें ही देना पड़ेगा, कोई शामलाट नहीं है। तुम दो टोटरु, ना कोई बाल ना कोई बच्चा। मैं अज्ज मरी कल दूसरा दिन, ज़मीन खेतर इधर ही रह जाने हैं, वैसे भी अभी केस उपरली कचहरी चला गया है, पैसा अभी मिला नहीं है। ये देहरी के लिए सारा ख़र्चा भी महिंदर और तेरा ताया ही लगा रहे हैं। अब इतनी भी बेगैरत नहीं कि रास्ता भी उनकी ज़मीन से लूँ।”

चाची ये कहकर सिर सिरहाने पर रख पासा पलट दीवार की तरफ़ मुंह करके लेट गयी। गणेश और उषा को काटो तो खून नहीं, वो दोनों उठे, दरवाज़ा बंद कर अपने कमरे में लौट आये, मगर गांव उनसे सदा के लिए छूट गया ।

उषा के हाथ से लीपी गयी दीवारें कई बरसात और गर्मियों को झेलने में नाकाम हो टूट–फूट चुकी थीं और उसको लीपने वाले हाथ, शहर में किसी मेम साहिब के घर के पोचे लगा रहे थे। गणेश बाज़ार में खड़े ट्रक से बोरी उतार कर दुकान के अंदर लगा रहा था ।

     “गग्ग गणेश पाइया, राम राम के हाल-चाल अए ?” सुन वो एकदम मुड़ा और अपने गांव के आदमी पंजाबू को दुकानदार के पास बैठा देख झट से बाहर निकल गया। दुकानदार हैरान हो जिधर गणेश गया, उधर देखने लगा,

“अजीब पागल बंदा है, मजदूरी भी नहीं लेकर गया, मुझे दिमाग से हिला हुआ लगता है।”

“ल ल ल ..ल लाला जी सारा ट ..ट टब्बर (परिवार) ही पागल है। गांव में इसकी मम्म माँ पागलों की तरह इसके बाप की दे ..दे .देहरी के आस पास घूमती रहती है। गांव वाले तो उसे …ड..ड.डायन कहते हैं।”

 

***  

परिचय :

 

कल्पना जसरोटिया

24 नवम्बर 1976 में पंजाब में पैदा हुईं, वर्तमान में जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में निवास,

जीवविज्ञान और कंप्यूटर एप्लीकेशनस में परास्नातक,

राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान में कार्यरत,

कहानियां जम्मू और कश्मीर साहित्यक एकेडेमी की पत्रिका शीराज़ाऔरनारी मन की कहानियांपुस्तक में प्रकाशित, मित्रमंडली नामक साहित्यिक ग्रुप से जुड़ लेखन आरंभ किया ।

 

     

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