अनुनाद

हम कभी इतने रिक्त नहीं होते कि उनकी आवाज़ सुन सकें/ दीप्ति कुशवाह की कविताएं

दीप्ति कुशवाह की ये कविताएं, शोर से बहुत दूर पाठक को अपने भीतर के एकांत में ले जाती हैं। निरन्‍तर बाहर की उलझनों से क्‍लांत पाठक, कुछ क्षण के लिए, इन कविताओं से गुज़रते हुए, अपने अनघट के अनुनाद को महसूस कर सकता है। अनुनाद पर दीप्ति… की कविताओं का यह प्रथम प्रकाशन है, उनका यहां स्‍वागत है।

 

courtesy : google

 

अनघट का अनुनाद  

 

 1.

 

कोई क्षण
हमारे सबसे क़रीब आता है

जैसे कोई बात
जो अंततः कह दी गई हो

हम समझते हैं

अब यह ठहरेगा
लेकिन वही क्षण
हमसे सबसे पहले विदा लेता है

समय को ठहराव से घुटन होती है

ठहरना

प्रश्न की देह में उत्तर का
छिप कर मर जाना है

 

इसलिए समय
हर उत्तर को
थोड़ा असमाप्त रखता है
थोड़ा असुना।

***

 

2. 

 

कभी-कभी हम मान लेते हैं
कि एक न एक दिन तो भूल ही जाएँगे

जैसे कोई धुन

अटकी रहती है कंठ में

जु़बान तक नहीं आती 

 

लेकिन विस्मृति एक बहाना है
याद रखने का

हर बार वह लौटती है
सामने से गुजरती रेल में

खिड़की से झाँकते चेहरे में 
कभी एक गंध में

जो लौटकर आती है
बिना किसी मौसम के।

***

 

3. 

 

एक दिन लौट कर देखा
और वहाँ कुछ भी नहीं था
न कोई पदचिन्ह
न वह क्षीण उष्णता
जो किसी उपस्थिति की परछाई थी

 

जिसे छाया समझते रहे
वह शायद कोई संकेत था
या वह तुम थे
जिससे तुम ही विसर्जित हो गए थे

 

कुछ बिछड़नें
देह से नहीं होतीं
वे उन संवेगों से होती हैं
जो हमारे भीतर घटे बिना
हमारे हिस्से हो जाते हैं।

***

 

4. 

 

प्रतीक्षाएँ
पुरानी चिट्ठियों जैसी होती हैं
पढ़ी नहीं जातीं
पर उनकी धूल झाड़ी जाती है

 

कार्यक्रम में रखी कुर्सियाँ
बैठने के लिए खड़ी रहती हैं

समापन तक

 

कुछ प्रतीक्षाएँ
अपने अंत के लिए नहीं
बल्कि खु़द को जीते रहने के लिए होती हैं।

***

 

5. 

 

कई नाम
बीज भी नहीं बन पाते
किसी नमी में धँसे रह जाते हैं

न अँकुराते
न मुरझाते
बस एक अज्ञात साँस की तरह
मिट्टी में चुप रहते हैं

 

जीवन भी कई
इसलिए छूट जाते हैं
क्योंकि हमने
उन्हें अपने भीतर ठौर नहीं दी

 

वे लौटकर नहीं आते
हम कभी इतने रिक्त नहीं होते
कि उनकी आवाज़ सुन सकें।

***

 

6. 

 

शब्दों से परे होती हैं

वे ध्वनियाँ

जो बस एक स्पंदन की तरह
हम तक आती हैं

जैसे कोई माँ अपने भीतर
बच्चे की पहली थपकी सुनती है
बिना भाषा के

 

हम जीवन में कई बार सुन नहीं पाते
वह जो सबसे पास से
हमसे कहा गया था

 

कुछ अनुभव बिना हलचल किए
हम में से गुजर जाते हैं

और एक दिन
मन के इतिहास में गूँजने लगते हैं।

***

 

7. 

 

लौटना हमेशा पूरा नहीं होता
कुछ लौटते हैं
पर वे, वे नहीं होते
जिन्हें हमने विदा किया था

 

हर वापसी 

एक पुनर्रचना है
जैसे पुराने कुर्ते में
किसी और का शरीर    

 

कभी-कभी लौटने पर
हमारा अपना ही घर
अनजाना सा लगता है

दीवारें अब दूसरी भाषा में

साँस ले रही होती हैं

जिसे हमारी बदली समझ नहीं जानती।  

***

 

8. 

 

कोई क्षण
बस होने ही वाला होता है
पर नेपथ्य बदल जाता है

 

हम नहीं जानते
वह क्षण आया भी था
या उसे

हमारी चाह ने रचा था

 

कुछ आकांक्षाएँ स्पर्श नहीं बनतीं
फिर भी देह उन्हें
बीते हुए स्पर्श की तरह
याद रखती है
बिना छुए।

***

 

9.

 

कभी-कभी हम विदा लेते हैं
उन जगहों से
जहाँ हमारी छाया भी नहीं पड़ी होती  

 

अधूरे रह जाते हैं संवाद

सपने में बुदबुदाए शब्दों की तरह

जो जाग आते ही मिट जाते हैं

लेकिन अघटित को छोड़ना भी   

भी एक बिछोह होता है 

 

देह वहाँ नहीं गई

पर मन कई बार लौट चुका होता है।

***

 

10.

 

ऐसा भी होता है कि बातें
कहे जाने से डरती हैं
जैसे कोई नींद
अपने स्वप्न से बिछड़ने के डर से
ख़ुद को अधूरी रखती है

 

वे हमारे भीतर

बोले बिना पलती हैं

चुप्पी में उग आई वनलता
आवाज़ से सूख जाती है

 

ये बातें एक गूँगे वाद्य की तरह
बजती रहती हैं

हम उन्हें तभी सुनते हैं
जब कोई हमें
बिलकुल नहीं सुन रहा होता।

***

 

दीप्ति कुशवाह। विभिन्न विधाओं में पाँच पुस्तकें। लोककला के क्षेत्र में संस्कृति मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप। 2024 तक दैनिक भास्कर (नागपुर) अंतर्गत कार्य। वर्तमान निवास-पुणे। संपर्क: deepti.dbimpressions@gmail.com

 

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