अनुनाद

घाटी की छोटी-छोटी जलधाराओं ने हमेशा ही रखना चाहा उसके रहवास को जीवित/ हिमांशु विश्‍वकर्मा की कविताएं

 

     हिमांशु की कविताएं अपने आस-पास बिखरे लोक की भावनाओं को उसी के डिक्‍शन में अभिव्‍यक्‍त करती हैं, जहां कहीं ये कविताएं उस डिक्‍शन से बाहर जाने लगती हैं और दिशा बदलती सी प्रतीत होती हैं, कवि तुरंत उसी डिक्‍शन में लौट आता है। लोकल नेरेशन के जरिए ये एक आख्‍यान रचती हैं। विशेष रूप से पहाड़ की लड़कियों के दु:ख इन कविताओं में मुखर होते हैं, जो स्‍त्री विमर्श के दावों को उधेड़ कर रख देती हैं और समाज का वास्‍तविक रूप सामने लाती हैं। यहां उनकी नौ कविताएं प्रस्‍तुत हैं – 

अनुना

 

 

अलगाव के बाद 

 

उसने हेगल को कभी

नहीं पढ़ा

ना ही वह कभी समझ पाया कि

उसकी मानसिक स्थिति

उसके विचार

उसकी प्रतिक्रियाओं पर

पिछली कई सभ्यताओं में

पहले ही लिखा जा चुका है

बार..बार

बार…बार

 

वह जीवन को हर बार

समझना चाहता है

हर उकाल[1] से पहले

क्वेराल[2] के पेड़ के नीचे बैठकर

एक गहरी साँस में

लोटा भर

पानी-पीना चाहता है

जब वह

हाथ में किलमोड़[3] की लाठी लिए

उलार[4] में होता है

वह तेज नहीं भागता

वह धीमी चाल में

भरी बीड़ी के कस

मारता है 

 

उसे नहीं पता

वह शंकर के अद्वैत से भी प्रभावित है

और माधव से द्वैत से भी

वह धर्म और अधर्म को भी नहीं मानता

वह सिर्फ़ देखता है जीवन

वह मृत्यु को देखता है

वह जब जन्म को देखता तो

उसके हिय[5] में सेमल सा सुर्ख फूल

खिलता है 

 

वह ख़ुद को दुनियाँ का सबसे बेहतरीन प्रेमी मानता है 

वह फूलों और भँवरों के गीतों को बड़े ध्यान से सुनता हुआ साथ गुनगुनाता है 

उसे याद है उसने प्रेम में कोई भी

वादे नहीं निभाये ,

बस कई कसमें खाई हैं

उसे लगता है

उसने अभी बहुत कम प्रेम किया है,

उसने अभी तक

नहीं देखा है

किसी पहाड़ पर

निर्वेद बैठकर

विषाद में नमकीन समुद्र को

 

उसने अभी तक नहीं जाना है

जीवन का सार्थक सत्य

वह उसी खोज में है

जिसे सदियों से ढो रहा है

बिक्रम अपनी चिपचिपी पीठ पर…

वह भी अपनी पीठ

को सामने से देखना चाहता है

उसे भी लगता है

उसकी पीठ पर बैठा है

संसार रूपी बेताल

वह उसे अपने सामने

किसी सुट्टे की टपरी

बिठाना चाहता है

यशपाल के पात्रों

की तरह वह उसे

अलविदा कहने से पहले

जी भरकर

चाय पिलाना चाहता है।

  

[1] चढ़ाई

[2] कचनार

[3] जंगली काँटेदार लकड़ी

[4] ढलान

[5] हृदय 

***

 बैड कोलेस्ट्रॉल

 

बचपन में मैं 

अपने झुंड के साथ 

घर के पास की नदी में 

नहाने जाया करता 

कभी कभार कोशिश होती कि 

कुछ मछलियाँ भी पकड़ लें 

हम झुंड में घेराव करते 

ठीक लोक नृत्य की भाँति 

एक चाल में 

थिरकते हुए 

कपड़े-चिथड़े का 

जाल सा बुनते 

पर हमारे अकुशल हाथ 

कभी उनको 

छू भी नहीं पाते 

 

जब हम नदी में पैर 

डाले शांत बैठते 

तब कहीं वह 

हमको पास आकर देखती 

और चिड़ाकर भाग जाती 

 

अनगिनत डुबकियों के बाद 

ठंड से ठिठुरते हुए 

हम अपनी गीली छाती को लिए 

नदी के सबसे विशाल पत्थर के 

आलिंगन से तपाते, 

 

तब वाकई नदी 

बड़ी होती थी।

उसका प्रवाह 

उसका पर्यावास 

उसका रूप 

उसमें प्रवेश करना 

जीवन का सबसे 

सौहार्द होता।

 

मैंने देखा कि 

घाटी की छोटी-छोटी जलधाराओं ने हमेशा ही रखना चाहा 

उसके रहवास को जीवित

नदी ने मेरी घाटी को भी 

जीवंत बनाया 

उसमें बसने दिया 

हर जाति को 

 

हर चौमास में वह 

अपने रौद्र रूप में होती 

वह खिरोल देती 

अपने रास्ते का हर पत्थर 

हर पेड़ 

हर पौंध 

और जब जन्म लेती है पुनः 

अपने होने की ललकार के साथ 

चीखती 

तोड़ती हुई रूढ़ किनारों को 

वह अपनी जगह को 

घोसलें की तरह संवारती 

 

उसको शांत करने तब 

शरद आता, 

स्वच्छ कल-कल करती 

बहती

एक लय और नाद में 

अपने यात्राओं के गीत 

को गाती हुई,

रातों को लोरियों सुनाती। 

अपनी थाती से सींचती 

घाटी का हर खेत,

 

तभी गाँव के बंजारे 

बेरोजगार,

उसकी देह में 

महीनों

मलते बीचिंग

मारते नदी की हर 

जाति के जीव को

 

ठेकदार तो केवल 

ठूसता कारतूस,

फोड़ता हर नया पत्थर 

नदी की छाती खरोड़ता हुआ 

करता 

इतना सपाट,

इतना चिकना और छिछला 

कि वह अपना मूल खो जाती।

 

हमारी सभ्यता में 

बेहतरी का यह रूप 

अक्सर छोटी धाराओं से लेकर 

हर बड़ी नदियों को रिवाइव 

करने की बात हम 

करते आए हैं 

पर क्या हम कभी 

रोक पाये ख़ुद को 

अपने घर के पास की नदी 

को अनदेखा करने से 

 

हमने तो बस 

उसके देह में भरना चाहा 

सभ्यताओं की उन्नति का 

बैड कोलेस्ट्रॉल।

 ***

 

कम उम्र की लड़कियां

 

उन्हें डर था कि

वह भी एक दिन निकल जाएगी

अपने प्रेम के फूलों को

धार[6] के

जंगली फूलों के बीच

बोने के लिए

 

उसके किशोर

सपनों की उड़ान

उनके यक़ीन पर

भारी पड़ने लगी थी

और

किसी भोर

उसका प्रेम में मदमस्त होकर

हर-हठ को तोड़ने लगा था,

यौवन की इस अवस्था में होना

उनको गुनाह लग रहा था

 

क्योंकि उनके समक्ष

वह नहीं चुन सकी किसी संपन्न,

प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को

या फिर

अपनी ही जाति

के पुरुष को

 

जबकि आज भी सभ्यताओं से

टूटती आयी हैं

सभ्य परिवार की नाड़िया

हमउम्र के चुनाव से

 

ना  माँ,

ना ही पिता

नहीं वहन कर सकते सामाजिक मर्यादाओं का भार,

उन्होंने भी सुना है….

इसलिए तो

पीढ़ियों में पहले से ही   

बेटियों का सर होता आया है कलम,

चुनवाया जाता है उनको

अभद्र गालियों और

तिरस्कार

के ईटों के बीच

देते हुए

रूढ़ रियलिटी चेक  

 

फिर

तोड़ दिये जाते हैं

उनके प्रेमियों के मुंह-पैर 

और कैद कर ली जाती हैं

उनकी आवाज़ें

मझले अंधेरे कमरे के

भाकारों[7] में

 

क़दम-क़दम पर

बिछाये जाते है कुटुक [8]

बिलखती रहती हैं बिलों में

कम उम्र की लड़कियां.

 

जबकि

भाई द्वारा गाँव भर में

शराब बेचने पर नहीं टूटती मर्यादाएँ,

नहीं कोसा जाता

उसके महान जन्म को

जब छुड़ाने के लिए

थाने पहुँच ही जाते हैं

आदरणीय पिता!

 

माँ की आँखों का तारा वह  

जिसकी चमक में

उसका चरस पीना नहीं दिखता

ना ही कोई सजा दी जाती है

इस बात पर,

तब ना ही चढ़ता है

परिवार सर पर कोई कलंक,

ना ही बात होती है

इस विषय पर फिर कभी 

 

बल्कि

कुल-पुत्र को दिया जाता है

उनका मनचाहा

उपहार, जेब खर्च और इम्पोर्टेड बाईक    

और पढ़ाई के लिए भेजा जाता है

राजधानी

 

यह शगल कुछ अगल ही है

माँ को सब पता होता है

पर जीवन भर

उसने भी सीखा है

चुप ही रहना

 

बेटी,

दूर ना हो जाए

इसलिए

दिलाये जाते हैं उसे

युनिवर्सिटी एग्जाम के लिए 

अनचाहे-अनजाने विषय

और  

पता होता है

नहीं हो पायेगी सफल यहाँ भी 

मसलन

रोटियां ना बना पाने के लिए

खाती है गालियां

 

पिता प्रेम तो करते हैं

पर उनकी बातों में आकर

नहीं भेजते पढ़ने को बाहर

पिता तब बुनते हैं तंगी का सहारा

 

ना किया जाता है

अब उसपर भरोसा   

ना ही थामा जाता है

उसका हाथ 

और

उसका भविष्य नहीं बढ़ पाता   

कभी  

मर्यादाओं से आगे

 

बैठी रहती है अब वह

जीवन के पुटों को थामकर

सोचती नहीं है

अब कुछ

भूल जाती है देखे हुए सपने 

बस जी रही है

और

पूछने पर कहती है

‘पता नहीं दा[9]’ ! 

 

[6] चोटी

[7] संदूक

[8] फंदे

[9] बड़े भईया

***

विजयोत्सव

(मित्र विपिन के गाँव मरमालसोंग में कन्ग्डाली महोत्सव का हिस्सा बनने के बाद )

 

वे ठहरते हैं

मीताओं[10], पोताओं[11] के लिए

जब भी जाना होता है

पहाड़ी के धार[12]-पार

गाज्यों[13] के लुट्टों[14] के लिये

झोले में ढूंग्चा[15]

छोटे उबले आलू

और खूब सारी बतकों[16] को

भर कर

काज[17] के लिए बढ़ते हुए कदम

अपने हिस्से के पहाड़ की समृद्धि के लिए

चमकती हुई ढाल-दाव्यों[18] रिलों [19], नगाड़ों, लोक सौर्य गीतों के साथ

पुरुष व्यंठट्लो[20]-रंगा[21]

स्त्रियाँ सर पर च्युक्ति, छंक्रोबाली

बदन पर च्यूइंगभाला[22]-ज्योज्यंग-बल्दंग-चंद्रहार पहने

अपने पुरखों की थाती को संजोये हुए

चढ़ाते हैं उनको वर्ष के अंत तक फलने वाली फसल

उनको पूजते हैं

बल, सौर्य और आदर से

भाईओं- बंधुओं को बुलाते हैं एक साथ

जात-पात-धर्म-कू कपट से

असंख्य मिलों दूर

‘रं’ समाज

हर बारह साल में फलने वाले

घातक, अक्षम्य, विषैला

वैमनस्य रखने वाले

आत्मघाती

बैरी कन्ग्डाली[23] को

उखाड़ लाते हैं

एक ऊँचे मैदान पर घसीटते हुए

काट डालते उसके हर एक तंतु को

और

मनाते हैं

अपने पूर्वजों की धरती पर

समता का

विजयोत्सव।

 

[10] मझली भाई/बहनें

[11] सबसे छोटे भाई/बहनें

[12] चढ़ाई

[13] जंगली घास

[14] जंगली घास को किसी लकड़ी या पेड़ पर शंकुनुमा बनाना 

[15] पहाड़ी नमक

[16] बातें

[17] काम

[18] तलवारों

[19] पारम्परिक रूप से महिलाओं द्वारा कपड़े बुनने के लिए प्रयुक्त होने वाली एक चपटी तलवार नुमा लकड़ी

[20] सफ़ेद पगड़ी

[21] रं जनजातीय पुरुषों का वस्त्र

[22] रं जनजातीय स्त्रियों का वस्त्र

[23] रं लोक कथा : लोकमान्यता के अनुसार हर 12 साल में मुख्य रूप से चौंदास घाटी में फूलने वाले पौधें ‘कन्ग्डाली’ को रं ग्राम वासियों द्वारा सामूहिकता से नष्ट किया जाता है जिसमें दो मान्यताएं प्रचलित हैं – क) कई वर्षों पहले चौंदास के एक राजा-रानी दम्पति का एकमात्र बेटा जो किसी अज्ञात संक्रमण से बीमार पड़ गया, स्थानीय वैद्यों की कई सलाहों के बाद भी उनका पुत्र मूर्छित ही रहा, तब किसी अनजान व्यक्ति ने कन्ग्डाली पौधे के फूलों का अर्क पिलाने की सलाह दी कि वह इस उपाय से ठीक हो जायेगा, परन्तु उस अर्क को पीकर उसकी मृत्यु  हो गयी, तब उस स्त्री ने कन्ग्दाली के पौधे को श्राप दिया कि – “हर 12 साल में तेरे खिलते ही तुझे मूल सहित नष्ट करने सभी गाँव वाले आयेंगे”. ख) इस उत्सव का सम्बन्ध गोरखाओं के आक्रमण से भी है, उस समय के गोरखा आक्रान्ता इस इलाके को कब्जाने के लिए इस क्षेत्र में आये और वे आक्रान्ता कन्ग्डाली के पौधों के बीच आक्रमण कर, व्यभिचार कर और लूट-घसोट करके छिप जाया करते थे, लोक मान्यता के अनुसार एक तरह से इस कन्ग्डाली पौधें ने उन आक्रान्ताओं की मदद की. वो छुप न पायें इसलिए स्थानीय लोगों ने कन्ग्दाली को अपना शत्रु माना, खासकर महिलाओं ने उसे पूरी तरह से नष्ट किया और आगे  जब भी यह पौधा फूले, इसे मूल रूप से नष्ट करने की कसम खाई और उत्सव मनाने लगे.        

***

 बेहिफ़ाज़त तीली

 (विद्यासागर नौटियाल की कहानी माटी खायँ जानवराँ से उद्धृत पंक्तियों का काव्य रूपांतरण)

 

आपको पता है

नाजुक जगहों पर जरा ज़्यादा ही

पड़ती हैं निगाहें,

अपनी सहूलियत से ही

हर आदमी

करता आया है काम

उस मक़सद के पूरा हो जाने के बाद

बीड़ी और सिगरेट सुलगा लेने के बाद

तीली की जलती लौ को

बुझाने की जरूरत नहीं पड़ती

अपने काम को अंजाम दे चुकी

तीली

बेहिफ़ाज़त हो जाती है

और ख़ुद बुझ जाती है

 

कइयों को ऐसी बुरी

आदत भी होती है,

अपने हक़ में

आग का उपयोग कर लेने के बाद

पावों तले रौंद डालते हैं

वह उस

जलती हुई तीली को,

 

आख़‍िर

एक आग ज़िंदा चीज़ होती है,

उसकी अंतिम लौ में होती है

थकान, उम्मीद और मेहनत

 

अपना मतलब निकाल लेने के बाद

उसकी पूरी ताक़त निचोड़ लेने के बाद 

किसी शक्तिशाली,

ज़िंदा चीज़ को

यो ख़त्म कर देना

कितनी बुरी बात है?

 

 -“ईसाब टेड़ा अगड़े मैणे ! फु !”[24]

 

[24] तीली (मेहनतकस वर्ग की मेहनत की कीमत नहीं चुकाने के बाद) को बुझाते हुए – हिसाब तेरा अगले महीने, फू।

***

ज़‍िदगी से विदाई

(विद्यासागर नौटियाल की कहानी माटी खायँ जानवराँ से उद्धृत पंक्तियों का काव्य रूपांतरण)

  

सुनो !

मरना चाहते हो?

जिंदगी से विदा लेने के कई तरीके हो सकते हैं

 

पानी में कूद जाओ

पानी के हवाले हो जाओ

पानी जिलाता भी है

मार भी डालता है

 

पानी पहचानता है

आदमी नया है कि पुराना

जो तैरना जानते हैं

अगर

वह हाथ पैर नहीं भी चलायें

फिर भी वे डूबेंगे नहीं

अगर

उनका शरीर एकदम स्थिर भी हो जाएँ 

वे हिलना डुनला बंद भी कर दें

वे पानी की सतह पर लेट ही क्यों ना जाएँ

या

उकड़ू बनकर बैठ जाएँ

 

तब भी एक तैराक को

पानी कभी डुबो नहीं

सकता

पानी बहुत समझदार होता है

उसके अपने क़ायदे होते हैं

 

जो तैरना जानते हैं

वे पानी को साधे  

हुए लोग हैं

पानी पहचानता है अपने साधक को

साधक को मार देना,

पानी के क़ायदे के ख़िलाफ़ होता है

पर

जो साधक

ख़ुद ही मरने की ठान ले

उसे भला कौन बचा सकता है?

गढ़वाली कहावत है – “बगोत्या डूबी जाँदो, डलखू फरक्यै जाँदो”[25].

 

और अंत में पाओगे

ढोल की तरह फूला हुआ

एक बदन

जो पानी की सतह पर तैर रहा होगा

तब समझ जाना

पानी का साधक

अब ज़िंदा नहीं रहा।

 

[25] तैराक डूब जाता है और डाल पर चढ़ने में माहिर आदमी भी गिर जाता है

***

क्वेराल से सेमल के बीच

 

उसे लिखना नहीं आता 

ना ही वह समझ पाता है 

दुनियादारी,

लेकिन जितने भी बसंत उसने देखें हैं 

यह बसंत सबसे 

ज्यादा उदास बसंत है 

और सबसे कठिन भी 

इतना धुंधला और अशांत भी 

कि 

हर चीज की शयनता 

और अपनी कठोरता पर साफ़ नज़र पड़ती है 

 

उसे अपनी प्रेमिका की याद आती है 

उसे अपनी माँ की याद आती है 

उसे अपनी दीदी-दादी 

और दादा की याद आती है, 

वह कैसे मुँह फेर ले 

फ्योली को खिलते देखने से 

बुरूज़ और क्लयों[26] के सफेद-बैगनीं 

फूलों को मौन के साथ लहराने से 

 

क्वेराल से सेमल के बीच

बसी इस 

दुनियाँ में 

उसने क्या नहीं देखा 

बहनों का हाल भी पूछा 

भतीजों के साथ खेला भी 

समाज-राजनीति, सरकार 

पितृसत्ता, समता और अलगाव पर 

बहस करते हुए उसने 

अपने भीतर के 

दर्जनों मुखौटे वाले 

प्यारे जीव को भी खोज निकाला 

पर उसे दु:ख है कि 

प्रलोभन युक्त संवादों के बीच 

वह हमेशा ही तुम्हें विदा करने में 

असमर्थ रहा

उसने अभी-भी  

कुछ ज़्यादा नहीं जाना

सारी महाभारत के

बाद भी 

जीवन कितना सरल है ?

और उसे जीना

उससे भी ज़्यादा गरल

यह आम बात है तो नहीं

 

परंतु

सावन उग आने से पहले 

उसके मन की मरुभूमि को 

अभी ग्रीष्म का ताप खाना 

बाँकी है।

 

[26] जंगली मटर

***

खिलना

 

उसका ढलना नहीं आया

मुझे कभी नज़र

क्योंकि

एक स्त्री के भीतर होती हैं

कई स्त्रियाँ

बुरूज़ के फ़ाहे सी सुर्ख़

पिंगले फ्योली सी चटकीली

भँवरों के पराग 

सुगन्ध से भरती

वह संसार में आती हैं  

लेकिन

जीवन की हर उम्र पर उसे

ढाला जाता है

एक नई 

आदर्श स्त्री में   

पर सवाल यह है कि

क्या स्त्री ही बनी है

ढलने के लिए?

 

जब भी नहीं

ढली

उकार के विपरीत

अपनी अस्मिता को

थामे अपने भीतर

खिलाया उसने

पहाड़ के सीने में

मायूस रंग के

क्वेराल के फूल।

***

 

जगह

 

तुम्हारे और मेरे बीच एक

जगह है

जहाँ पर मैं तुमसे

और तुम मुझसे

मिलने कभी नहीं आओगे

 

एक दिन इस शुष्क जगह पर

किसी ने

बोगनवेलिया की

कटिंग रोप दी,

 

बिन पानी

बिन खाद

बिन हवा

बिन घाम

खाये हुए

सावन से आने से पहले

ही उसमें अज्ञात कोपलें

काँटों के साथ

बढ़ने लगी

फिर कुछ ही

दिनों में वहीं,

 

हाँ उसी तुम्हारे और मेरे बीच उगी इस नन्हीं पौंध पर

एक सुर्ख़

निपट चटकीला फूल

उग आया।

 

मेहनतकश बेल अन्य

रंग भी फूटे

बेहद

सुरम्याली[27] टहनियों पर

तिनका जोड़-जोड़

कफ़्फ़ुवे[28] ने अपना घर भी बसा लिया

 

लेकिन अब भी वह जगह

तुम्हारे और मेरे लिए

खाली ही है

वहाँ कोई एक दूसरे से मिलने नहीं आता,

 

एक दूसरे से तो दूर

उस जगह पर कोई

ख़ुद भी मिलने

नहीं

आयेगा

 

जिस जगह पर खिले आते हैं

स्वयं ही

सबसे पसंदीदा फूल 

वह तुम्हारी

और मेरी जगह कभी नहीं हो पाएगी

वह जगह बस  

उस

निपट चटकीले फूल की

जगह है।

 

[27] सुंदर

[28] बुलबुल

***

 

परिचय :

हिमांशु विश्वकर्मा 1 मार्च 1996 , ग्राम : कुनियाँ, डीडीहाट पिथौरागढ़ : हिमांशु… की कविताएँ और कहानी समाज, व्यक्ति और प्रकृति के गहन संबंधों को आत्मीय संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती हैं। उनके लेखन में लोकजीवन, स्मृति और सांस्कृतिक चेतना का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। उनकी रचनाएँ अनुनाद, सदानीरा, गोलचक्कर, हिंदवीं आदि प्रतिष्ठित साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रथम कहानी “बावर की वनकन्या” के लिए उत्तराखंड भाषा संस्थान द्वारा ‘युवाकलमकार सम्मान २०२५’ दिया गया। हिन्दी के साथ-साथ कुमाउनी भाषा में भी सक्रिय हैं और कुमाउनी से हिन्दी और हिन्‍दी से कुमाउनी में अनुवाद कार्य करते हैं। वर्तमान में वे कुमाऊँ विश्वविद्यालय (उत्तराखण्ड) से हिन्दी साहित्य में पी-एच.डी. कर रहे हैं। उनका शोधकार्य लोकजीवन पर केंद्रित है।

                                                                                                                         ***

 

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