अनुनाद

निशाना लगाउण दी सही जगह नहीं है मनुक्खी देह/ स्‍वामी अंतर नीरव की कविताएं

 

 

बीहड़, अघोर और प्यारे कवि स्वामी अंतर नीरव की नेटिविटी तो क्राॅस फायरिंग के लिए बदनाम इलाक़े पुंछ सेक्टर की है, पर अब वो जम्मू की किसी निहालपुर नामक जगह पर रहता है, यह भी एक ऐसी जगह हैं, जहां अमेज़न जैसी सर्वव्यापी शै से भी कुछ पाना-भेजना मुश्किल है। 

 
अब ऊपर लिखी इन चंद बातों को लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ स्वामी की कविता से जोड़ लीजिए। बहुत सादा कवि, जो इक उम्र तलक दोतरफ़ा गोलियों का शिकार रहा है। ऐसा साधारण जन, जिसके एक ओर बंदूक लिए मारने को आतंकी खड़े हों और दूसरी ओर बचाने को बंदूक लिए फ़ौज़ी – गो इधर तस्वीर कुछ बदली है, पर अतीत, बल्कि निकटतम अतीत यही रहा है। स्वामी के जीवन और कविता की बड़ी मुश्किलों में सबसे बड़ी मुश्किल यह बंदूक है। वह ऐसा साधारण जन और कवि है, जो फ़सलें उगाता है, उसे उर्वर खेतियों के लिए औज़ार चाहिए, हथियार नहीं। उसके क़दमों के नीचे कीचड़ हो, तो पानी से हो, ख़ून से नहीं। देश के शांत इलाक़ों से एक बार इस तारीख़ी मंज़र पर निगाह डालिए, तो स्वामी भी समझ आएगा और उसकी कविता भी। 
 
सारंगी में किसी जिबह की हुई बकरी का रोना सुन पाएंगे आप? उस झील को महसूस कर पाएंगे, जो ललद्यद जैसी विकल हृदया माँओं के दूध से भरी है? और उस डमरू की आवाज़, जो ख़ुद शिव की चमड़ी से मढ़ा है, जिसके लिए उस बीहड़ देवता ने किसी प्राणी की जान नहीं ली हैं, ख़ुद को खंरोचा है? 
 
स्वामी तहज़ीब किंवा संस्कृति का रहवासी है- धर्म, मज़हब या पंथ का नहीं। उसमें अपने मनुष्यवत भटकाव हैं और निरन्तर संघर्ष में रहने का दुर्धर्ष सौंदर्य भी। कविता में उसके क़दम ज़रूरत और हालात के मुताबिक आगे बढ़ते हैं। वो न दांएं है, न बांएं। कविता में स्वामी होना एक इंसान का अपनी धरती, अपनी गंध, अपने पानी, अपने पहाड़, अपने बाग़ान, अपनी खेतियों और ऐसी ही कई दूसरी अहम चीज़ों के बीच होना है, जिन्हें आलोचना की हिंसा अहमियत देना कब का छोड़ चुकी है और ख़ुद भटक कर कहां पहुंची है, उसे ख़ुद नहीं पता। 
 
यहां अनुनाद पर स्वामी की यह पहली मौजूदगी है, सो भी इस शर्मिन्दगी के साथ कि उसे बहुत पहले से यहां मौजूद होना चाहिए था। 
 
पढ़िए इस सादगी को, जो दरअसल मनुष्य की उस बीहड़ता और अघोर का सार है, जिसे सार्त्र के शब्दों में Essence of the Human कहा जा सकता है। 
                                          –  शिरीष 
                                                                                                                                                                               
 

जड़्हां वाला बाबा (जड़ों वाला बाबा)

 

संताली वेले

लीक टप्प आइआ जोध सिंघ

उमर भर युद्ध तों डरदा रिहा

कपड़े दा वापार करदा रिहा

नीर टब्बर पालदा

लुकड़ी सुकड़ी जोड़दा

हड्ड बालदा, जोध सिंघ

हुण खिचवें साहां दा सवार

किरत भोएं तों इंनकार

जाणा चाहुंदा

लकीरों पार

अखे इह भोएं

उसदी नहीं

इह देस उसदा नहीं

इत्थों दे पाणीआं विच

उसदे बीते सपने दी

किसे आपणे दी

राख़ मिली होई नहीं है

बॉर्डर दा की बहाना है

नीत सुच्ची है

घर जाणा है

पोतरा आखदा

होली भाखदा

बाबा सारे ही बेघरे हां

बेजड़्हे हां

जे तूं इत्थे दे पाणीआं विच

मिल जावेंगा

जड़्ह लावेंगा

तेरी मरज़ी, आखदा बाबा

होली जेही हिलिआ

जड़्ह लमिआरदा

ओपरे देस

नवीं मिट्टी, नवें

पाणी विच जा रलिआ

 

शब्दार्थ और भाव :

लीक टप्प आइआ : लकीर (बॉर्डर) पार करके आया।

लुकड़ी सुकड़ी : थोड़ा-बहुत जो भी मिल सका (संसाधन)।

हड्ड बालदा : हड्डियाँ जलाना (अर्थात कड़ी मेहनत करना)।

किरत भोएं : कर्म की भूमि।

बेजड़्हे : जिनकी जड़ें न हों।

लमिआरदा : फैलाते हुए (जड़ें फैलाते हुए)।

ओपरे देस : पराए देश में।

***

 

बंद नक्क खुल्हण ते

 

बंद नक्क खुल्हण ते

खुल्ह गया हां मैं वी

किसे खुशबो वाली ताकी वांग

डिग्गे पत्तयां दी बुसक

सुंघ सकदा

सुंघ सकदा हां

निंबुआं चों लंघदी आउंदी हवा नूं

मुहल्ले विच रिझ रही बासमती नूं

सेंट दी खाली शीशी नूं

मिट्टी ते डिग्गदी बारिश नूं

गिल्ले कुत्ते नूं

अग्ग विच डुल्ल्हे घेअ नूं

खुल्ल्हे नक्क नाल, ऐं

सीने अंदर भर लैंदा

चितव सकदा

प्रेमिका दी बगल विच कस्तूरी

सुंघदी वी चक्खदी वी खुशबोई

हुणे हुणे, मैं

कुट्टे गरम मसाले विचों

पहली वार सुंघे हन

सुंढ, मोटी लाची, दालचीनी, मगां

धनिया, ज़ीरा, सौंफ, जवैण

जावित्री, जैफल

सभ वखरे वखरे

बंद नक्क खुल्हण ते

बंदा पहिलां जेहा नहीं रहिंदा

बंद नक्क खुल्हण ते

कुछ वी पहिलां जेहा नहीं रहिंदा।

***

 

मेरे इलाके दे लोक

 

मेरे इलाके दे लोक

मंदर नहीं जांदे

गुरद्वारे नहीं जांदे

रब्ब उत्थे भरोसा रखदे

भुख रख के खांदे

कदी बीमार नहीं हुंदे

डाक्टर कोल नहीं जांदे

असपताल नहीं जांदे

दवाई लैण नहीं जांदे

मरण वेले, मर जांदे

तोप दा मुकाबला

तलवार नाल करदे

तलवार दा सोटी नाल

सोटी वाले दा निहत्थे

निहत्थे बंदे दा मुकाबला

चुप्प नाल करदे हन

चुप्प अग्गे

हमेशा हारदे रहे हन

मेरे इलाके दे लोक

***

 

शांति संदेश

 

राजधानी विच रहिंदा बच्चा

पेंसिल दी नोक नाल

गोली दी नोक बनाउण विच मगन है

उसने ‘शांती संदेश’ मुकाबले विच

हिस्सा लैणा है

अवल आउणा है

बॉर्डर लागे

भेड़ां नाल गए नूर दे

मत्थे विच आ वजी सी

पारों चली गोली

उस दिन आखिरी रोज़ा सी

मक्की छिलदे पिउ नूं

चाह देण गई सी कुड़ी

कहंदे क्रास-फायरिंग विच मरी है

इत्थों दा बच्चा

कोरी ही छड्ड आया है

शांती संदेश मुकाबले वाली शीट

***

 

ओहनूं दस्सो (उसे बताओ)

 

ओहनूं दस्सो

बंदूक दी अक्ख

धरती नूं नहीं देख सकदी

न्हेरा वरताउंदी

रौशनी हन बंब

निशाना लगाउण दी

सही जगह नहीं है

मनुक्खी देह

***

 

लल्ल-दिद (लल्लेश्वरी/लल्लद्यद पर आधारित)

 

(१)

उस कमली ने

डल नूं पी लिया है

वेहंदियां वेहंदियां

आपणे दुद्ध नाल, मुड़

खाली झील नूं

भर दित्ता है।

 

(२)

ओहने

रुक्खां तों सेब लाहे हन

आपणे दुद्ध नाल धोते हन, मुड़

रुक्खां ‘ते लाए हन।

 

(३)

उस

नीला फुल्ल छाती नाल लाया

दुद्ध चुंघाया

कुंग बनाया।

 

(४)

ओहदीआं छातीआं

छलक पईआं हन

नौ-शीन मुबारक

 

(लल्ल: लल्लेश्वरी / डल: झील / कुंग: केसर / नौ-शीन: पहली बर्फबारी)

***

 

जल उसतत (जल स्तुति)

 

रे जोगी

जल की गणी ना जाई

रे जोगी

जल की लखी ना जाई

रे जोगी

जल की कत्थी ना जाई

जल के छीजते तन मन छीजे

जल में सत्त समाई, रे जोगी

जल से धरती उभरे

जल में बूडे जाई, रे जोगी

त्तत शब्द आ जल में लगिया

अक्खर जग्गिया

नाद का वासा जल के भीतर

जल ने कार वजाई, रे जोगी

पीहू पीहू करता बादल सुमिरै

सावण में सखी साजन सुमिरै

बाबीहा कौण देस का वासी

कैंह जा प्रीत लगाई, रे जोगी

जल अगनि का दादा दोहता

जल अगनि का भाई, रे जोगी

जल की कही ना जाई।

***

 

लिखो

 

लिखो

पता है

लिखण नाल कुछ नहीं होणा

फिर वी लिखो

लिखो

असह्मती दे गीत

आपणे ही पर कुतर रहीआं नज़मां

भविष्य दे अफ़साने

इक्को रंगे

फुल्ल दे भार नाल

मर जाणा है असीं पर

शब्दां साह लैंदे रहिणा है

लिखो

कि दीवारां दे कन्न बोले ने

इह कदी चीखां नहीं सुणदीआं

रेत नूं तर नहीं कर सकदे अत्थ्रू

कि अदल बस लोकाचार है

कि दीवान-ए-ख़ास ही

दीवान-ए-आम है

लिखो

कि चुप्प बोलिआं नूं नहीं

कन्नां वालिआं नूं सुणदी है

रात दा अर्थ कदी दिन नहीं रिहा

रात दा अर्थ कदी दिन नहीं रहिणा

आपणी मिट्टी चों

ख़ुशबू औणी हट्ट गई है

दरज करो

कि सड़क ‘ते तुरदी

बघिआड़ां दी भीड़ विच

हर शख़्स लेला है

लिखो

कि पहिला लिखिआ

पूर रिहा नवीआं कबरां

कि राजा ग़लत सी

ग़लत है, ग़लत रवेगा

लिखो

कि शब्द मन्नुख दी पछाण है

शब्द दा होणा मनुष्य दा होणा

शब्द दी होणी मनुष्य दी होणी

बस लिखो

***

 

साज़

 

(१)

हिरणे दी चम्म लाह के बंदे

हिंडा-घेड़ा साज़ बनाया

हिंडा घेड़ा

धीमे सुर विच नीवें सुर विच

ठक्क ठक्क करदा

हिरणे दा दिल हरदा

आपणी देह चों

उठदे सुर ने जगदी लै ने

उस नूं ज्यां भरमाया

फाही पाया।

 

(२)

तानपुरे ते ऊंठ दी हड्‌डी

आंदरां कड्‌ढी कोही, बकरी

सारंगी विच रोई।

 

(३)

लकड़ी अते आपणे चम्म दा

डमरू घड़या मढ़या

डम-डम करया

तांडू हढ़या शिव ने।

 

(४)

साहां दे घुट्ट भरदे ही वंझ

वंझली वंझली हुंदा।

 

(५)

तूम्बकनाड़ी दे विच मेरे पुरखे वजदे

तूम्बकनाड़ी दे संग मेरे पुरखे गाउंदे

तूम्बकनाड़ी दे संग मेरे पुरखे नच्चदे

मेरी रूह दी

साडी रूह दी

सब्भ दी रूह दी आड़ी

तूम्बकनाड़ी।

 

शब्दार्थ :

हिंडा-घेड़ा : लकड़ी, मिट्टी और हिरण की खाल से बना साज़, जिसकी आवाज़ से मोहित होकर हिरण जाल में फँस जाता है।

ज्यां : ऐसा।

कोही :  वध की हुई।

वंझ : बाँस।

तूम्बकनाड़ी : चमड़े से मढ़ा हुआ मिट्टी का एक सुराही जैसा साज़ (कश्मीर का प्रसिद्ध लोक वाद्य)।

आड़ी : सखी/मित्र।

***

 

हुण तूं बोल

 

हुण तूं बोल

हट्टी उत्ते

टप्परी छत्त के, रहिंदा

धोभी जोड़ा

लड़दा रहिंदा

बंदा आखे

शर्म नहीं है इहनूं

धो सलवारां रस्सी पाईआं

डिग्दा मैला पाणी

हेठों लंघदे गाहकां उत्ते

अजेही औरत दा की करीए

फक्कड़ गफ्फ़ड़ तौली जांदा

बोली जांदा

आख़र हफ़दा

कोठे खड़ तक्कदी वल तक्कदा, कहंदा

हुण तूं बोल

घरदी नूं

जिवें चा है चढ़िआ, आखे

खसमां खाणा

सड़िआ मरिआ

आलस भरिआ

रस्सी वी किते होर नांह लावे

कौड़ीआं तत्तीआं कहंदा रहिंदा

दस्सो वे मैं किधर जावां

इहदी मां नूं खावां …?

आख़र ओह वी

हफ़दी कहंदी

हुण तूं बोल

मुड़ आई बंदे दी वारी

भावें करले लक्ख तिआरी

आख़र गल्ल

उत्थे ही मुक्कणी

हुण तूं बोल

चक्करां चक्करां खेड है चलदी

हुण तूं बोल

हुण तूं बोल

आख़र, बंदा

चुप्प कर जांदा

बंदी आंहदी

चाह धरी ए

उत्ते आजा।

***

 

अमलतास अते कुड़ी (अमलतास और लड़की)

 

(१)

की लोचदी होणी

की सोचदी होणी

अमलतास हेठ खड़ी कुड़ी

 

(२)

वद्ध पीले लग्गदे पए हन अमलतास

की ओह किसे नूं

आख़री वार मिलण आई ए

जां

इह पहली मिलणी है

जिसदा चा अमलतास नूं चढ़िआ है

जां

हर मिलणी ते

इंज ही गूढ़ा हो जांदा है अमलतास

 

(३)

ओहदी कलावे जिही तक्कणी

कोई सुपना चक्ख के आई लग्गदी

ओहदे मूंह ते धुप्प खिड़ी है

कौण आइआ होणा

कुड़ी दे सुफ़ने विच

 

(४)

कुड़ी खड़ी ए

ओहनूं

अमलतास हेठ

खड़्हना चंगा लग्गदा है, जिवें

किसे बुद्ध नूं चंगा लग्गदा

बुद्ध बिरख हेठ बैठणा

कुड़ी नूं

निरवाण नहीं चाहीदा

फुल्ल वर्ही जांदे ने

इक्को जिहे होए पए हन

धरत अते अमलतास

तिक्खड़ी धुप्पे

चुप्प खड़े हन

कुड़ी अते अमलतास

असीस वरतदी पई ए

 

(५)

कुड़ी

अजे वी खड़ी ए

जे कह सकदा हुंदा, तां

कह दिंदा अमलतास, आख़र

हद्द हुंदी ए, झल्लीए

थक्क गई होणी

हुण तूं जाह

 

(६)

कुड़ी

होले पोले कदमीं

पिछांह हट्टण लग्ग पई ए, जिवें

सीस निवाउण मग्रों, असीं

पिछांह हट्टदे हां

बिना इष्ट वल पिट्ठ कीतिआं

(७)

झड़दी रुत्ते

इक्कली है कुड़ी

इक्कला है अमलतास।

 

तिक्खड़ी धुप्पे : तेज दोपहर की धूप में।

***

 

र्हूरी (क्षमा/प्रायश्चित)

 

टिक्की खा के

मरिआ चूहा, खा गई

मेरी माशो बिल्ली

मरणों पहिलां

डाहढी तड़फी चीकी हारी

जिंवें आखे, बंदिआ

लै हुण तेरी वारी

माशो सच्च कहंदी सी, हुण

मैं किधर जावां

कित्थों माशो लब्भ लिआवां

थाळी धरिआ रुड़िआ टुक्कड़

चूहिआं वाली टिक्की जापे

किसरां खावां आपे

मैं कफ़ारा करसां

चूहा सिमरिआ, माशो धिआई

अज़ गुज़ाई

तक्की लवो

रब्ब दिओ बंदिओ

जो होणा सी होइआ

मोइआ

रोइआ

जो वी होइआ

पहिले मैं कफ़ारा कीता, फिर

मैं कीती र्हूरी

केसीं न्हाता

जां चिड़िआं नूं दाणा पाइआ

सूरज चढ़िआ।

 

कठिन शब्दों के अर्थ :

 र्हूरी : स्वयं को माफ करना या शुद्धि करना

माशो बिल्ली : घने बालों वाली फारसी बिल्ली (Persian Cat)।

टिक्की : चूहे मारने वाली ज़हरीली दवा।

कफ़ारा : प्रायश्चित (Atonement)।

रुड़िआ टुक्कड़ : वह रोटी जो आँच पर ज्यादा सिकने के कारण भूरी/लाल हो गई हो।

केसीं न्हाता : सिर धोकर स्नान करना (शुद्धि का प्रतीक)।

अमलतास : पीले फूलों वाला एक पेड़ (Laburnum)।

***

 

काफ़ला

 

बरफ़ों सिम्मदे सीर नूं

हत्थ लाउणा चाहुंदे सन बच्चे

काफ़ला रुकिया नहीं सी

आउंदा बद्दल देख पहाड़ी उत्ते

डर गिआ सी काफ़ला

बच्चे नहीं सन डरे

बद्द्ल लंघ जाण ते

काफ़ले नूं शहर विच,

लग्गी अग्ग, निकलदा धूंआ दिसिआ सी

बच्चे नहीं सी डरे

जत्थेदार किहा :

नब्बे अड़े, पंदरां झड़े

पिच्छे रह गईआं नौ कालसिरीआं

बच्चे तां वी नहीं सन डरे

खावणे तांईं,

राह विच काफ़ले ने जद भेड़ भुन्नी, तां

देख के डर गए सी

चुप्प कर गए सी बच्चे।

 

शब्दार्थ :

सीर : नदी में मिलने वाली छोटी जलधारा।

अड़े : टिके रहे या शहीद हुए।

झड़े : मारे गए।

कालसिरीआं : जवान औरतें (शाब्दिक अर्थ: काले सिर वाली)।

***

 

आम बंदा

 

आम बंदा

ओह कोई

शरीफ़ आदमी नहीं है

बिन पीते वी

बालकोनी तों लटक सकदा

जहाज़ नूं गाल़ कड्ड

कुत्ते दे पैरीं हत्थ ला सकदा

मंगते नूं

जेब विचले, सारे पैसे दे सकदा

घरदी नाल लड़दा

निआणिआं तों खुशी खुशी कुट्ट खा लैंदा

बी नूं निहारदा

फल़ दी उडीक विच

पुश्तां गुज़ार दिंदा

उंज पैरों नंगा, पर

अपणीआं जेबां विच

अम्बारां असीस रखदा

माख्यों वाली मक्खी नूं

कीड़ा नहीं, मनुक्ख वांग

रैहणी-बैहणी वाली दस्सदा

इनकलाब आखण लग्गे

अपणे टब्बर दा धिआन नहीं धरदा

इह कोई

आम आदमी नहीं है

इसे ने धरती मोड्हिआं ते चुक्की है

इही एटलस है।

 

शब्दार्थ : 

आम बंदा : साधारण व्यक्ति।

निआणिआं : बच्चों से।

पुश्तां : पीढ़ियाँ (Generations)।

अम्बारां असीस : ढेर सारा आशीर्वाद।

माख्यों : शहद।

टब्बर : परिवार।

एटलस (Atlas): ग्रीक पौराणिक कथाओं का वह पात्र जिसने पूरी धरती को अपने कंधों पर उठा रखा है।

***

 

म्हौकी

 

सरदीआं विच्च

हवाई चप्पल पाई

कुरते पजामे वाला

नहिर दे पाणी विच्च

गुंगलूआं तों

मिट्टी, पाला उतार रिहा

उस कोल सिरफ़

हड्‌डां नूं ढक्कण जोगी जिल्द है

ओह घट बोलदै

इक्को कीमत लाउंदै

पूरा तोलदै

मेरे पिता ने वी

उहो जिहा ही तक्किऐ उसनूं

जेहो जेहा मैं

शराब ना उसदे

कम्म ते असर करदी

ना देहि ते

सभ हस्सदे

रावण तों बाद

इह दूजा बंदा, जिस

काल मंजी दे पावे नाल बद्धा

कीमीआकार जेहड़ा

फ़ुलके चों ही कड्ड लैंदा

जीऊण जोगे सारे तत्त

जिसदी हर बीमारी दा

इलाज तंबाकू

रोंदा हस्सदा वी नहीं

कुझ दस्सदा वी नहीं

सिवाए ‘गुंगलू अठन्नी किल्लो’

पुच्छण जां ख़ुद वाज मारण वेले

कहण लोकी

सबर म्हौकी

म्हौकी सबर

बरफ़ीली सवेर

इक्क ख़बर

अपणी लंका अंदर

पराली विच्च सुत्ता म्हौकी

तेल वाली चिमणी डुल्हण नाल

सड़ गिऐ

मड़ गिऐ।

 

शब्दार्थ और संदर्भ :

गुंगलू : शलजम (Turnip)।

जिल्द : त्वचा/खाल

काल मंजी दे पावे नाल बद्धा : ‘समय या मौत को वश में कर लेना’।

कीमीआकार : रसायनशास्त्री (Alchemist)

अठन्नी : पचास पैसे।

पराली : धान के सूखे अवशेष

***

 

प्यार कित्थे कित्थे (प्यार कहाँ-कहाँ)

 

कबाड़ चुग्गदा मुंडा वेख

कबाड़ चुग्गदी कुड़ी दे

बुल्ल्हां चों हासा सिमदा है

अचानक सोहणा लग्गण लगदा

मुंडे नूं अपणा आप

पाए मैले कपड़े

मोढे ते रक्खी पुराणी बोरी

विच पए ज़ंग लग्गे टीन

तुट्टिआ प्लास्टिक

कच्च दीआं बोतलां

मुंडे नूं

होर सोहणी लग्गण लग पेई है

हस्सदी झक्कदी, फ़िर

गाल्हां कड्डदी

उस वल्ल तक्कदी कुड़ी

दोवें कबाड़ चुणदे

मुंडा छड्ड दिंदा

राह विच पई बोतल

कुड़ी दे चुग्गण लई

छड्ड देंदी कुड़ी वी

लोहे दा टुकड़ा मुंडे वासते

दोवां बोरीआं विच हुण

अद्धा अद्धा कबाड़ भरदा

इंज ही चलदा

इंज ही सरदा

आख़र हो ही जांदी

अद्धी जमा अद्धी पूरी इक्क बोरी

इट्टां दे भट्ठे ते

पसीने अते लाल घट्टे नाल

लिबड़ी कुड़ी

मुंडे उत्ते वर्हदी

राखवें हक्क दा

परदरशन करदी

रेहड़ी धक्कदा मुंडा

चुप्प चाप उसनूं वर्हण दिंदा

जो चाहुंदी करण दिंदा

इट्टां दे जुस्से वाली

लाल पीली कुड़ी आख़र

हस्स जांदी वस्स जांदी

कम्म वेले वी

प्यार ही सोचदी

जमांदारनी कुड़ी

उसनूं अज्ज किसे मुंडे ने नहीं

जमांदार मुंडे ने

गहु नाल वेखिआ है

मगर मगर तुरिआ

घर तक अपड़िआ

कुड़ी ने अज्ज आटे बदले

मैंहिदी खरीदी है

नेल पालिश वी

झट्टकोईआं दी कुड़ी नूं

कसाईआं दे मुंडे विच

ना लहू दिसदा ना मास

पैरां विच सिरी फ़साए

छुरी नाल

अक्खां कड्डदे दीआं अक्खां विच

झाक सकदी है ता उमर

मच्छेरे दे जाल विच

मच्छी बण फ़सणा चाहुंदी

होली उमर दी मच्छेरन

फ़िर सुट्टणा चाहुंदी

उमर भर लई उसते

अपणा जाल

मच्छी वांग तड़पदे

मच्छेरे नूं वेख

कुड़ी सकून विच है

जाल विच फस्सीआं

चिड़ीआं फ़ड़ फ़ड़

रंग रंग अवाज़ अवाज़

जोड़े बणाउंदी चिड़ीमारां दी धी

निक्के चिड़ीमार नाल

आपणे बणे जोड़े बारे

बिलकुल बेफ़िकर है

हमेशा वांग

 

शब्दार्थ :

सिमदा : रिसना या धीरे से निकलना।

गहु नाल : ध्यान से या गहराई से।

ता उमर : जीवन भर।

जुस्सा : शरीर/काया।

सरदा : गुज़ारा होना।

झट्टकोई : वह समुदाय जो झटके से मांस तैयार करता है ।

चिड़ीमार : पक्षियों को पकड़ने वाला।

***

 

रुक्ख दा गीत (वृक्ष का गीत)

 

(१)

वे रुक्खड़ा

तूं किधरों आ के

उगिया मेरे बन्ने

उपरी थावें किमें उगणा

मैनूं वी ता जाच सिखा दे

जे मेरी गल्ल मंनें

 

वे रुक्खड़ा

तेरी जड़ सियाणी

भज्जदी पाणी थाणीं

 

वे रुक्खड़ा

तेरी टाहणी चंगी

सूरज संग जो मंगी

 

जदों तुसां दे पत्तर झड़दे

उसले तुस कि करदे?

जिसले तुंदे पत्तर आउंदे

हरा गीत कोई गाउंदे?

जदों तुसाडे फुल्ल फल आउंदे

छज्जरा अग्गे अग्गे टुरदा

चा वी टुरदे जांदे

रुक्खड़िआ भाईआ वे

 

(२)

वे रुक्खड़ा

तूं रोंदा होसें

जिसले पच्छदे तैनूं

मैं नांह पच्छसां, मैं नांह टक्कसां

दस दे दुखड़ा

मेरिआ रुक्खड़ा

मैनूं

 

वे रुक्खड़ा

तूं बालण बणना

इसदा पता है तैनूं

चुल्हे जां चिख़ा विच लग्गणा

किहड़ा जच्चदा तैनूं

जां तूं बणना पलंग नवारी

जां लग्गणा किसे उच्ची अटारी

जां तूं बणना कोई बूहा

जां बक्सा गहिणिआं वाला

जां तूं बणना हल पंजली

करनी सुच्ची कार

दस वे यार

रुक्खड़े।

 

शब्दार्थ :

पच्छदे/टक्कसां : कुल्हाड़ी से काटना या घाव देना।

चिख़ा : चिता।

हल पंजली : हल और जुआ ।

***

रंग

 

रंग

पीला

सरों नाल इशक करदा

भोग करदा

सड़ के स्वाह हाणा हो जांदा

चिट्टा

बरफ़ विच सुत्ता रहिंदा

धुप्प लग्गण ते

उठ के टुर जांदा

पिच्छे पाणी बचदा

शाम दे सूरज तों

संधूरी छलक के

पोस्त दे फुल्लां ते आ डिग्गा है

इह ढलदे सूरज दा नशा है

आसमानों

दरिया विच सिमदा नीला

मेरे तक आउंदा

हरा

पत्त झड़ण तक

पत्तरां दा पिच्छा करदा

रात अजे वी काली।

 

शब्दार्थ और भाव :

सरों : सरसों।

स्वाहा हाणा : राख जैसा

चिट्टा : सफ़ेद ।

टुर जांदा : चला जाता है (बर्फ़ पिघल कर पानी बन जाती है)।

पोस्त : अफीम का पौधापत्त

झड़ण : पतझड़।

***

 

फ़ोटो

 

फ़ोटो

जा चुक्की दोस्त

ज़ियादा मत सोचीं

सच्च नहीं है

एल्बम विच लग्गी

सह्वाडी पहली खिच्चवाई फ़ोटो

असीं दोवें

इस बाग विच खड़े सी

अड़े सी, कि फुल्लां नाल ही

खिच्चवाणी है तस्वीर

इह फुल्ल नहीं हन

उक्थे, हुण बहुत वड्डे

रुक्ख हो गए हन

फ़ोटो विच दिख रहे बूटे

मिट खप्प गिआ है

पिच्छे लग्गा

लव पोईंट वाला बोर्ड

दिस रही कार

दूर, बहुत दूर

निकल गई होणी

फिक्का हुंदा हुंदा

गुलाबी हो गिआ होणा

तेरे पाइआ लाल सूट

उत्ते देख

असमान साफ़ है

तस्वीर वाले बद्दलां दा

कोई वी टुकड़ा नहीं

इक्क दो नहीं

दरिया ते बण चुक्के हन

पूरे चार पुल्ल

उस तरह दे

हड़्ह वी नहीं आउंदे

असीं हुण दरिया पैदल नहीं

गड्डीआं विच पार करदे हां

मेरे शहर विच

तेरे शहर वांग ही

फिक्के दिस्सण लग पए हन तारे

चंन वी मैला मैला ही रहिंदा

अपणा पंध मुका चुक्की होणी

तेरे उदों पाई, नवीं नकोर

अम्बरसरी जुत्ती

तेरी गुट्ट ते बद्धी घड़ी

वक्कत तों अग्गे पिच्छे

चलदी होवेगी

हुण पुरज़े नहीं बदलदे घड़ीसाज़

असीं इत्थे

घड़ीआं ही बदल लैंदे

मेरे तां

कुछ वी नहीं रहा ओहु जेहा

कहंदे, कुछ सिआणा जापदां

नवीं सवेर दी आस विच

अपणा नाड़ू वड्ड आइआं

की की छड्ड आइआं

तीजी पीड़्ही वल्ल

वद्ध रही मेरी धौली वेल

इंना कुछ ही होणै

तेरा मैहेंदी वाला बूटा वी

मैनूं किते मिलीं

सिआण लवीं

मैं वी तैनूं सिआण ही लवांगा

असीं फ़ेर चलांगे

उस लव पोईंट ते

आखरी फ़ोटो खिचवाउण

पहली करामात दोहराउण

पहली करामात दोहराउण

 

प्रमुख शब्द :

नाड़ू वड्ड आइआं : नाल काट आना

धौली वेल : सफ़ेद बेल

सह्वाडी : हमारी (डोगरी-पंजाबी मिश्रित लहजा)।

पंध : रास्ता/सफ़र।

सिआण लवीं : पहचान लेना।

***

बांएं से शिरीष मौर्य, सिन्‍हा जी और स्‍वामी अंतर नीरव

परिचय : 

जम्मू-कश्मीर के पुंछ में जन्मे और पले-बढ़े स्वामी अंतर नीरव अब जम्मू जिले के निहालपुर गांव में रहते हैं। वे पंजाबी और पोठवारी (पंजाबी की एक बोली) में लिखते हैं। उनके दो काव्य संग्रह ‘कुछ बाकी है’ (पोठवारी में, 2019) और  ‘नहीं’ (पंजाबी में, 2021) प्रकाशित हो चुके हैं । उनकी रचनाएँ पंजाबी भाषा की विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें साहिब स्मृति पुरस्कार 2024 से सम्मानित किया गया है।     

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