अनुनाद

कदेसन की बेटी / कल्‍पना जसराेटिया

courtesy : Pablo Picasso

“तेरी शरण मेरे सतगुरु मेरे पूरे,

 मन निर्मल होये संता दूरे कर कृपा ” 

 

सुबह सवेरे ही घर के बाहर की तरफ़ बैठक के साथ बने दारजी के कमरे से आध्यात्मिक प्रवचन, गीता पाठ या फिर गुरवाणी की आवाज़ से पूरे घर को पता चलता जाता कि सवेरा हो गया है। बीजी उठ नहा धो, जाप करते-करते, सारे घर में घूमते और सब को लाड़ से, हिरख से उठाते थे, वहीं दारजी की भारी रौबदार आवाज़ सुन कर तो घर की एक तरफ हवेली में बंधे गाय बछड़े तक भी उठ कर सावधान हो जाते थे।  

 

आज ठण्ड अपने लाव-लश्कर के साथ जैसे दूर पहाड़ों से गुज्जर बकरवालों के साथ-साथ चल, मैदानी इलाक़ों में अगले दो-तीन महीनों के लिए डेरा डालने की तैयारी करके आई हो। धान के पूले अभी कुछ खेतों में ही पड़े थे, कुछ दिनों में कनक की बिजाई शुरू हो जानी थी। ठंडी सवेर में अभी दारजी पूजा पाठ कर धूप में कुर्सी-मेज़ लगा नाश्ता करने ही लगे थे कि उनके खेतों में बने डेरे पर रहता बद्री, पसीने से लथपथ, चेहरे पर हवाइयां उडी हुईं, कांपती टांगों पर गिरता पड़ता, हांफता हुआ उनके पास आ ज़मीन पर थप से बैठ गया था। दार जी हाथ की बुरकी वापिस थाली में रख,उठ खड़े हुये थे। उन्होंने बीजी को आवाज़ दे पानी का गिलास लाने को बोल, उसकी बगलों में हाथ डाल उसे पास पड़ी फट्टी पर बैठा दिया,

 “की होया बद्री पुत्त, होंसला कर, शेरा दस्स ताँ सी की होया ? सब खैर अए? ” 

उनकी ठहरी थमी आवाज़ सुन बद्री को जैसे होश आ गया, पर डर अभी भी कम नहीं हुआ था,बद्री डर के मारे स्याह फिर गया था। बीजी ने आगे हो कर पानी का गिलास उसके हाथ में दिया तो वो, गटगट एक सांस में पी बुदबुदा कर बोला,

                 “वो वस्सन सिंग खेतों में मरा पड़ा है। हम जंगल पानी के लिए गये तो वो… वो… वहां उल्टा पड़ा था।”

 उसने हाथ से बाहर की तरफ़ इशारा किया, उसका मरियल हाथ अभी भी हल्का-हल्का कांप रहा था। एक पल से लिए दारजी के सुर्ख़ चेहरे पर हैरानी और परेशानी का भाव लहरा गया पर,जल्द उस पर काबू पा वो उठ खड़े हुए और अपनी पगड़ी को सिर पर जमा, चमड़े की रकाबी पहन तेज़ क़दमों से बाहर को चल पड़े थे। बद्री भागता हुआ दारजी के पीछे-पीछे खेतों की तरफ चल पड़ा था।

सूरज थोड़ा और ऊपर आ गया था, आसमान पर रोशनी फैली हुई थी पर धूप कुछ मरियल सी थी। बीजी की बूढ़ी हड्डियों में मानों ठण्ड जम गयी थी, वो आंखें बंद कर हाथ जोड़ वाहेगुरु…वाहेगुरु बुदबुदाने लगीं,

“सब खैर करीं रब्बा ..सब नूं राज़ी रखीं मालका।”

 

दोपहर होते होते ये ख़बर पूरे गाँव में आग की तरह फ़ैल गयी। गाँव के बाहर पूर्वी दिशा से एक छोटी सी नहर गाँव की परिकर्मा करती, दक्षिण छोर को छूती हुई निकलती थी। दूसरे किनारे पार अगले गांव की हद शुरू होती थी। उसके किनारे पर कहीं-कहीं रेत के ढेर लगे होते, तो कहीं रेत के अधिक निकालने की वजह से गहरे गड्ढे, पर गड्ढे इतने गहरे नहीं थे कि कोई शख़्स गिर पड़े तो जान से हाथ धो बैठे, पर ऐसे ही एक गड्ढे में गिरकर वस्सन सिंह आज जान से हाथ धो बैठा था। जबसे सरकार ने बड़े बड़े दरियाओं से रेत निकालने पर भारी टैक्स लगा रखा था, तबसे इन छोटे छोटे सुए, चो और नहरों के किनारों की हालत किसी ग़रीब की फटी चादर सी हो गयी थी, रोज़ रोज़ नये जख़्मों जैसे गड्ढों से किनारे रिस रहे होते थे, दो गाँव की सरहदों के बीच फंसा वो किनारा किसी मातमी विधवा सा लगता था। उसी किनारे पर गांव की जुह से बाहर रहते वस्सन की लाश के पास बैठी बचनी, जिसे अभी-अभी पता चला था कि वो विधवा हो गयी है, कभी दहाड़ें मार मार रोती तो, कभी बुक्कल में सर छुपा ढुसकने लग जाती थी। ऊँची लम्बी, भारे शरीर की बचनी, जब रोती तो लगता कोई मांस का पहाड़ हिल रहा हो। उसके पास ही उसकी तेरह-चौदह साल की लड़की साबी बैठी थी जो, कभी सिर झुका घुटनों पर रख लेती तो कभी माँ की पीठ पर हाथ रख, उसे हौंसला देती, साबी की डरी हिरणी सी आंखें बहुत बेचैनी से आस-पास इकट्ठी भीड़ को छानकर, फिर नीचे झुक जाती थीं। सात साल का उसका भाई बिंदर आंखें फाड़-फाड़ इकट्ठी हुई भीड़ में सबके मुंह देख रहा था ।

 

बचनी, दुखों की मारी एक कदेसन की बेटी थी, वो कदेसन जो अपनी शराबी पति की मार और भूख से बचने के लिए दस साल की बच्ची को ले कर बिहार से रेलगाड़ी पर चढ़ मुक्तसर पहुँच गयी थी और वहां स्टेशन पर भइयों(प्रवासी मजदूरों) को लेने आये किसी उम्रदराज़ जट्ट ने उसे अपने घर बिठा लिया था। माँ-बेटी को लगा कि उनकी जून सुधर गयी पर, जिनकी किस्मत खोटी हो, उनके दरवाज़े ख़ुशी झांकती ज़रूर है, पर दहलीज लांघती नहीं, कुछ सालों बाद ही माँ को तपेदिक हो गया। माँ तो मर गयी मगर बिन माँ की बच्ची, जिसको अपने नए बाप की तरह देखती थी, वो उसकी ही बच्ची का बाप बन गया था। कब बचनी अपने माँ के हिस्से का बिस्तर का कोना अपने नाम करवा बैठी, उसे भी पता नहीं चला था। उसकी बच्ची किस्मतवाली थी, पैदा होते ही मर गयी। कुछ साल बाद वो बूढ़ा जट्ट भी अकाल चलाना कर गया। मरते मरते एक काम अच्छा कर गया कि वो मरने से पहले ही अपनी ज़मीन बचनी के नाम कर गया था ।

 

उसी गांव का वस्सन सिंह, बचनी के खेतों का मुजारा था, वही ज़मीन का काम-धंधा देखता था । उससे कुछ साल ही छोटा, घर बाहर का काम करने अक्सर आता था। उसकी बीवी की जच्चगी में सेहत बिगड़ने से मौत हो गयी थी और दुधमुंही बच्ची साबी पीछे रह गयी थी। बचनी अपनी गाय का दूध दो वक़्त वस्सन सिंह की बच्ची साबी के लिए दे देती। वस्सन सिंह भी उसका बच्ची से मोह देख उसके पास बच्ची को बाहर का काम-काज करते वक़्त बचनी के पास छोड़ जाता था। शरीकों की नज़र पहले ही कदेसन के नाम लगी ज़मीन पर थी। वस्सन सिंह के उसके घर सुबह-सवेरे आने-जाने पर उनको बहाना मिल गया, दस बातें बनाने का। अकेली जवान औरत और बिना चारदीवारी का घर किस-किस को रोकती और किस-किस के मुंह बंद करती ।

 

बचनी को उस बच्ची साबी में अपनी मरी हुई बेटी दिखती, एक दिन बचनी ने वस्सन सिंह से साबी हमेशा के लिए मांग ली और खु़द वह अपनी मर्ज़ी से गुरद्वारे जा मत्था टेक उसकी औरत बन गयी। आस पास के लोगों के ताने-मीनों से बचने के लिए वस्सन सिंह ने सारी ज़मीन बिकवा, यहाँ दारजी के गाँव में बस्ती से अलग- थलग बाहरी नहर के किनारे की ज़मीन खरीद ली। ज़मीन में पहले से दो कमरे बने हुये थे।  वही वस्सन सिंह, जिसके साथ बचनी दो-दो बच्चों की माँ बनी थी, आज लाश बन उसके सामने पड़ा था। बचनी रो-रो कर हलकान हुये जा रही थी ।

 

एक बजते-बजते पुलिस की एक खटारा सी जिप्सी में लाल फुम्मन लगी ख़ाकी पगड़ियाँ पहने, एक कांस्टेबल और एक हवलदार अपने तने पेटों और ढीली पैंटो को सँभालते, बूटों से रेत उड़ाते लाश के पास पहुँच गये। हवलदार ने अपनी मिचमिचाती आँखों से भीड़ का सरसरी मुआयना किया, दारजी ने गला साफ़ कर हाथ जोड़ उन्हें सतश्री अकाल बुलाया, तो उसने अपनी पगड़ी के तुर्र को हाथ से ठीक किया जैसे दारजी के सामने अपनी हैसियत बढ़ा रहा हो। दारजी ने हाथ के इशारे से भीड़ को परे होने और पुलिस को अपना काम करने देने को कहा। सारी भीड़ दारजी के हाथ के इशारे भर से लाश और पुलिस वालों के पास से हट, गुटों में बंट कर कानाफूसी का बाज़ार गरम करने लगी। दोनों हवलदार और कांस्टेबल ने आँखों-आँखों में दारजी की इज्ज़तदारी का सबूत अपनी पुलिसिया दिमाग़ में दर्ज़ कर लिया था ।

दारजी प्रभावशाली शख़्सियत के मालिक, सेना से सेवानिवृत, गाँव के सरपंच और धार्मिक और कानूनी जानकारी के ख़जाने के तौर पर आसपास के इलाके़ में सब उन्हें बहुत इज़्ज़त देते थे। गांव के लोग उनके पास अपने मसले ले कर आते थे, वो बहुत सुलझे ढंग से निपटारा भी करवा देते थे। सरकारें-दरबारें भी उनकी पूछ थी, लम्बरदार, एसअचओ, बीडीओ, जैसे अक्सर उनकी बैठक में चाय, लस्सी छकते दिखते थे। दार जी की छह फुट से कुछ अधिक की लम्बाई, चौड़ी छाती पर फैली हुई सफ़ेद दाढ़ी, हमेशा झक सफ़ेद दोनों तरफ ज़ेब वाला कुरता, नीचे तंग पजामा और चमचम करते जूते उन्हें सबसे अलग दिखते थे। फ़ौज से रिटायर हुए काफी साल हो गए थे, पर साफ़-सफाई और तरतीब से सब काम करना जैसे उनके खू़न में ज़ज्ब हो गया था। जूतों पर पड़ी धूल को उसी वक़्त साफ़ करने के लिए उनकी ज़ेब में एक कपड़ा हमेशा पड़ा होता। दार जी अच्छी-ख़ासी ज़मीन के मालिक, रिटायर होने के बाद उन्होंने अपनी ज़मीन को अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा था। दो तीन मजदूर पक्के तौर पर खेतों में कमरे बना रखे हुये थे, वो सारा साल खेतों की देखभाल में मदद करते थे। अच्छी सेहत थी, खेती बाड़ी का काम वो खु़द ही देखते थे, मजदूरों के साथ भी बेटों सा बर्ताव करते, तो वो भी उधर से उतनी ही जान मारते, उनकी ज़मीन सारे गाँव वालों से अधिक पैदावार देती थी। अभी वो पुलिस वालों के साथ साथ चल रहे थे।     

 

पुलिस तफ़्तीश में जुट गयी थी। हवलदार ने पास खड़े एक आदमी को लाश के ऊपर पड़े परने को हटाने को कहा, पानी में सिर के बल पड़ा वस्सन का चेहरा फूल कर डरावना लग रहा था, सिर के खिचड़ी बाल खुले हुए, आँखें उबल कर बाहर को निकलती हुईं, उसे और भी दिल दहलाने वाले रूप में दिखा रहीं थीं। उसे ऐसा देखते ही साबी और बिंदर पता नहीं डर या दुःख के मारे और ज़ोर से रोने लगे। बचनी के कीरने भी ऊँचे हो गये थे। हवलदार से मुख़ातिब हो दारजी ने विनम्रता से हाथ जोड़ पूछा,

“हवलदार साहिब, अगर आपजी इजाज़त दें, तो इन बच्चों को यहाँ से हटा दें, भूखे-प्यासे सुबह से रो -रो कर हलकान हुए पड़े हैं, आप जब कहोगे, बुला लेंगे। ” 

 

दारजी जैसे रसूख वाले सयाने बन्दे को उसे हाथ जोड़ साहिब बोलने पर हवालदार के अंदर के अहम् के पेड़ को खु़राक मिल गयी, उसने पगड़ी वाले भारी सिर को हिला कर मानो दारजी पर एहसान किया हो। दारजी ने झट पास खड़े केसर सिंह को बच्चों को घर ले जाने को बोला। पुलिस अपने काम में लग गयी।  

“सबसे पहले इस लाश को किसने देखा?”

“मैंने साहिब, जब मैं सवेरे खेतों में काम के लिए इधर आया, कोई सात बजे।” बिशना बोला।

“तू कहाँ थी उस वक़्त?” हवलदार बचनी की तरफ़ देख बोला ।

“साहिब बहादर, मैं मवेशियों को कुल्ले से बाहर निकाल रही थी, तभी बिशना चिल्लाता हुआ नहर की तरफ़ से आया।” बचनी सुबकते सुबकते बोली ।

भीड़ से अलग हट कर, हवलदार और एक कांस्टेबल ने आपस में कुछ सलाह मशवरा कर दारजी और बचनी को एक तरफ ले जाकर, बचनी के घर का मुआयना करने का इरादा बताया। आगे-आगे दारजी और उनके पीछे-पीछे घिसटती बचनी, सौ दो सौ मीटर परे खेतों में बने दो अधपक्के कमरों के मकान की तरफ़ चल पड़े थे। दारजी ने हाथ के इशारे से सबको उधर ही रुकने के लिए कहा, तो सब लाश के पास ही जड़ हो गए।

 दो तरफ़ कच्ची ईंटों की और दो तरह चल्ल (लकड़ियों और झाड़) दे कर बनी चारदीवारी के अंदर दायें हाथ के तरफ़ दो कमरे और दूसरी तरफ़ जानवरों के लिए कच्चा पराली की छत्त वाला कुल्ला बना हुआ था। पहले कमरे में एक तरफ दो प्लास्टिक की मैली कुर्सियां और लकड़ी का मेज़ पड़ा था। मेज़ के ऊपर एक गिलास और जग रखा था। मेज़ के नीचे एक सस्ती शराब की ख़ाली बोतल लुढ़की पड़ी थी। कांस्टेबल ने झुक कर बोतल उठा ली। एक तरफ बड़ा सा तख़्तपोश पड़ा था और उसके एक तरफ खेसी तह की हुई पड़ी थी। कांस्टेबल ने गिलास और बोतल दोनों को सूंघा और कुछ डायरी पर लिख, दूसरे कमरे का रुख़ किया। ये कमरा उस कमरे से थोडा बड़ा था, एक चारपाई बिछी हुई थी और दूसरी सामने वाली दीवार के साथ खड़ी थी। एक तरफ दो चार लोहे के संदूक और बिलंग/अलगनी पर कपड़े टंगे हुए थे। दीवार में बनी अलमारी में पीतल के कुछ बर्तन सजा कर रखे हुए थे, पास में ही गुरु नानक देव जी की तस्वीर, जिसमें वो सफ़ेद दाढ़ी में अधखुली आँखों से ध्यान में मगन हैं, के सामने जपजी साहिब का गुटका पड़ा था। बचनी को नानक देव जी की तस्वीर की शीशे में दारजी का चेहरा दिखा, उसने दोनों को मन ही मन माथा टेका। उसी कमरे के साथ लगती एक आधी बनी रसोई थी, नीचे चूल्हा और लकड़ियों के ढेर लगा था और ऊपर दीवार से सट कर बनी लकड़ी के फट्टी पर दो टोकरियाँ पड़ीं थीं। कांस्टेबल ने एड़‍ियाँ उठा दोनों टोकरियाँ बारी-बारी देखीं, एक में रात के बचे अकड़े हुए फुल्के थे तो, दूसरी में आलू प्याज। दूर पड़े पतीले का ढक्कन उठाया तो उसमें मीट की बची तरी और कुछ हड्डियाँ थीं। दूध की भरी बाल्टी एक खूंटे पर टंगी हुई थी और दूध की काढ्नी सूनी और ठंडी पड़ी थी।  कांस्टेबल पता नहीं क्या-क्या अपनी डायरी पर कलम घसीटी कर रहा था ।

 

हवलदार ने बाहर पड़े तख़्त पर अपना शरीर ढीला कर दिया तो, दारजी भी पास पड़ी कुर्सी पर बहुत गंभीर मुद्रा में बैठ गए, बचनी घूंघट खींच थोड़ी दूर ज़मीन पर बैठ गयी ।

 “हूँ, तो कल मुर्गा शराब चली है। किस ख़ुशी में ..तेरे बाप का वियाह था, बोल ?”

“जी, वो कल खु़द ही शाम को शहर से ले आया था, मैंने बस पका दिया था उसे। बोतल पता नहीं वो कहाँ से ले आया था?” बचनी कांपती हुई बोली ।

“तू सवेरे सवेरे डंगरों को देखने चली गई, तेरे खसम की तुझे कोई ख़बर नहीं हुई कि मरा है या जींदा?”

बचनी ने दुपट्टे के अंदर से ही दारजी का शांत पर ओज वाला चेहरा मोहरा देखा, उसे जैसे हौंसला हो गया और भर्राए गले से बोली, 

“साहिब जी, मुझे लगा वस्सन सिंह जंगल-पानी के लिए खेतों में गया होगा, अक्सर रात को पी कर वो सवेरे देर से ही उठता था। यही सोच मैं गोहे कूड़े को लग गयी। हमका क्या पता था, ये पाना वरत गया है।”

 

वो और ऊँची ऊँची रोने लगी। दारजी और पुलिस वाले बचनी को उधर छोड़ एक तरफ चले गए, दारजी बहुत धीरे धीरे बताने लगे कि बचनी बड़ी सच्ची सुच्ची औरत है, दोनों बच्चों का पूरा ध्यान रखती थी। बस्सन सिंह शराबी था, रात को लगता है फ़ारिग़ कहीं होने गया होगा और शराब के लौर में पानी की छप्पड़ में गिरा और फिर उठ नहीं पाया। बाक़ी आप की तफ़तीश जो नतीजे पर ले जाये। दारजी हाथ जोड़ खड़े रहे और बोले,

“साहिब बहादर दिन ढलने लगा है, हमें लाश को भी ठिकाने लगाना है। जे तुहाडा हुकुम होवे।”

 

लाश को पोस्ट मार्टम के लिए शहर के हस्पताल में ले जाया गया। सब गाँव वालों ने शाम ढलने से पहले पास बने शमशान घाट में वस्सन सिंह की लाश को आग के हवाले कर दिया। बचनी और बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल था। ज़िन्दगी कहाँ रुकती है, सर्दी के बाद गर्मी और फिर सर्दी। बचनी को महीने -दो महीने बाद पुलिस स्टेशन बुला लेते पर हर बार दारजी या तो खु़द या फिर कोई महिला साथ में भेजते थे। दोनों बच्चों को तो बीजी ने गाँव के कई बच्चों की तरह गोद ही ले लिया था। हफ़्ता, दस दिन में एक बार ज़रूर बीजी पास बैठ कभी गुड़, कभी पिन्नियां खाते भी और बचनी के लिए पल्ले बाँध भी जाते। बचनी की ज़िन्दगी ने फिर रफ़्तार पकड़ ली।

 

पुलिस ने दुर्घटनावश हुई मौत मान केस बंद कर दिया। साबी की शादी करवा, बचनी अपने जवान होते बेटे के साथ उम्र के कई पड़ाव पार कर आई थी। दारजी ने बढ़ती उम्र के चलते एक बार फिर से रिटायरमेंट ले ली थी पर, इस बार घर-बार के कामों से और पूजा पाठ तक अपने आप को सीमित कर लिया था। सेहत भी कुछ ढीली चल रही थी।

 

शाम का वक़्त दारजी के पाठ करने और फिर अपने रेडियो पर धार्मिक चर्चा या आरती सुनते का था। तभी दरवाज़े पर अपने स्थूल शरीर का बोझ लादे बचनी ने अंदर झाँका। दारजी को अकेला देख उसने दहलीज लांघ, हाथ जोड़ दारजी को सतश्री अकाल बुलाया, तो नज़र कमज़ोर के चलते उनसे पहले तो बचनी पहचानी नहीं गयी पर, जब बचनी की आवाज़ सुनी तो उन की आँखों में पहचान के डोरे उतर आये, उन्होंने सर हिला कर अभिवादन का जवाब दिया ।

“आ बचनी बैठ, सब ठीक ऐ? साबी सोहरे घर खुश ऐ ?” दारजी ने आदतन सब घर-बार की खै़र ख़बर पूछी।

“सब तुहाडी मेहर ऐ दारजी, मुंडा अब ज़मीन देख लेता है, मैं बेफ़‍िक्र हूँ अब ।”

 

बचनी ने दरवाज़े के बाहर और खिड़की के पार नज़र घुमाई, किसी को आस पास न देख उसने दुपट्टे का पल्ला हाथों पर फैला दारजी के पांव पकड़ लिए। दारजी ने चौंक कर हाथ जोड़ पांव पीछे खींच लिए,

“क्यों पाप दी गठड़ी मेरे सर चाढ़ दी ऐन बचनी, जिउंदी बसदे रहो सदा।”

“ऐ जन्म तो आप जी ने बख़्शा है दारजी। आज मुझे आप मत रोको,बोलने दो। मैं भी मर के अगले जहान सत्गुरण नू मुह दिखाना ऐ। तुसीं मेरे लई रब्ब तो घट नहीं। आपको तो पता ही है, मुझ जैसी कदेसन की बेटी की, वस्सन सिंह के साथ नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू हुई तो लगा, मेरे  क्लेश  कट गए ।  बेटा हुआ तो साबी को भाई मिल गया, मैं तो उन दोनों को देख-देख अपने सारे पुराने जख़्म और कभी कभी वस्सन को भी भूल जाती। अपनी रौ में आंखें बंद पड़ी रहती, एक दिन रात को अँधेरे में वस्सन सिउं को साबी की मंजी पर हाथ फेरते देखा, तो मेरे जैसे पुराने सब जख़्म छील दिये हों किसी ने, कभी अपनी किस्मत सड़ी माँ, कभी अपनी देह पर फिरते मेरे रिश्ते के लगते बाप के हाथ और कभी अपनी मरी बेटी का चेहरा मुझे साबी में दिखता था। मन के दाग़ जब भरते-भरते फिर से हरे होने लगें, तो वो पहले से अधिक गहरे और बदबूदार होते हैं। दार जी, रिश्ते दिलों के होते हैं, साबी से मेरा रिश्ता शरीर का नहीं था दिल का है, उसका अपने शरीर के जन्मदाता से रिश्ता शायद शरीर का ही था, दिल का नहीं।  मगर साबी की माँ अभी ज़‍िन्दा थी, मेरी माँ की तरह मरी नहीं थी। साबी का वस्सन से कतराना, रात को डर कर चीखना, गुमसुम रहना, पढ़ने में अच्छी थी, पर उसके फेल होने ने मुझे अंदर तक झिंझोड़ दिया। मैं अपने घर में ही दूसरी बचनी नहीं चाहती थी।”

“छड्ड धिये, पुरानियां गल्लयां नहीं बोह्तियाँ गोल्ली दियां, बीत गया सो बीत गया।” दारजी बचनी दे सिर ते हाथ फेरदे बोले ।  

“नहीं दारजी, तुस्सीं मेरे रब पैगम्बरां की जगह हो। बड़े साल होये ये सल्ल मेरे अंदर दब्बेया। आज मुझे बोलने दें। मैंने अपने जख़्म किसे सुनाने? वस्सन सिंघ को एक दिन मैंने घेरा, खू़ब लड़ी भी, पर दार जी, मर्दों के आगे औरत जात जब भी तुलती है,उसका पलड़ा हल्का ही होता है, वो भी एक कदेसन की बेटी का, जिसके न आगे कोई था, न पीछे। मेरी उस लड़ाई का उल्टा ही असर हुआ, अब तो वो शर्म या इज़्ज़त का परना भी उतार सिरहाने रख चुका था। वो अब दिन दिहाड़े ही मेरी पीठ होते ही, अपनी नीच हरकतों पर उतर आता था। वस्सन सिंघ को किसी का डर ही ना रहा था। लड़की जात, पुलिस के पास जाती, तो उसका नाम ख़राब हो जाता, कौन करता उससे शादी। उसकी शादी की कढ़ाई की चादर पर कोई दाग़ लगे, मुझे मंजूर नहीं था।”

         बचनी ने एक लम्बी हिचकी सी सांस ली, जैसे कई मन बोझ उठा, वो मीलों चली है और अब वो थक गई है। उसने पास पड़े मिट्टी के घड़े पर से गिलास उठा, लम्बे लम्बे दो चार घूँट गले से नीचे उतारे और ऊपर ली सूती चादर से मुंह साफ़ कर, सिर ऊपर कर दारजी को देखा। दारजी जो अब तक हाथ जोड़े, आंखें  बंद किये चुपचाप सुन रहे थे, ने अपने गोद में पड़े साफ़ सुथरे तौलिये से अपनी आँखों के किनारे और सफ़ेद भीगी हुई दाढ़ी साफ की और अपने कांपते हाथों से उन्होंने बचनी के सिर पर हाथ रख दिया।

                 “धिये, मुझे साफ साफ़ याद है, उस ठण्ड में भी वस्सन सिंह के मंजे पर तह किया खेस और ठंडी पड़ी काढ्नी जो हर घर में सुबह चार बजे ही चढ़ जाती है और साबी की आँखों में दुःख से ज्यादा राहत और सकूं, मेरी बूढ़ी आँखों से छुपा नहीं था। तेरा कीआ मीठा लागे। हरि नामु पदारथ नानक मांगे॥”

दोनों के चुप होते ही पास पड़ी तिपाई पर रखे रेडियो से भक्ति की संगीत लहरियों पर तैरता एक दुर्गा सप्तशती का  श्‍लोक गूँज उठा ।

“इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।

तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्।।

***

 

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