अरुण देव की कविताएं

हर दूसरा आदमी या तो कुफ्र है
है या देशद्रोही 
– अरुण देव की कविता हमारे समय का बयान हैं। यहां दी जा रही कविताएं पाखी में छप चुकी हैं और इनकी आवाज़ एक गूंज पैदा करती है। इसी गूंज को अनुनाद दुबारा साझा कर रहा है। The Hindu में शफी किदवई ने अरुण की इन कविताओं पर टिप्पणी की है, उसे भी अनुनाद अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा है। 

Of blood and tears 

Arun Dev’s collection of poems not only brings out the incongruities of life with a sense of satire but also gives a unique perspective to the poetic persona of Malik Mohammed Jaisi through a short poem. Awe-inspiring creative exuberance at times produces maudlin and curious public perception but whatever is stashed away in the collective consciousness bristles with unmapped terrain of truth. It can only be brought to light by creative reasoning and this is what a short poem on the celebrated Oudhi poet Malik Mohammad Jaisi wraps up. The poem composed by talented young Hindi poet Arun Dev whose collection of poems “Koi Jagah to Ho” (There must be a space) won him Maithli Sharan Gupt national honour, revisits the popular belief about the author of trail-blazing romantic epic “Padmawat”. The poet endorses the popular perception as Jaisi’s ground-breaking long poem “Padmawat” is nothing but a full throated cry against the arrogance of the power that be: Aiysa kaha jata hain ki apne ant samay mein Malik Mohammad Jaisi Bagh mein badal gaiye the/ Agar theekh se padhen Padmavat to usme bhi yeh dahar sunai parti hai/ Satta ke ahankar par ek kavi ki dahar/( It is said that Malik Mohammad Jaisi transmitted himself into a Tiger during his last days /If Padmawat is read carefully, its roar becomes audible / It is the poet’s cry against the arrogance of the establishment). Arun Dev through multiple focalisation offers a unique perceptive to jog our memory about Jaisi, the icon of Oudhi poetry, and turns attention to the unanswered questions related to the poetic persona of the poet. For him Jaisi’s creative dexterity enabled him to portray the spiritual side of the life of desire with cadence. His poetry peels away the layers of ignominy that he had felt at having found his unprepossessing appearance the object of sheer ridicule but his poetry got widespread adulation even from the jeering crowd: Soulhivin Shatabi ke sufi Jaisi ke kurup pe hasne wale/ Unko sun kar rone lagte thhe /Unki kavita rakt aur ansu se likhi gai thi (The people who scoff at the unsightly appearance of Jaisi, the sufi poet of the sixteen century/ start crying their eyes out/ His poetry is made up of blood and tears.) Arun Dev whose two collections of poems including “Koi to Jagah to Ho” (These must be a space) to his credit, recited poems in the North East and Northern writers meet organised by the Sahitya Academy recently. His another poem “Is samay mein” (At this time) repudiates the dominant narrative of our time that draws its sustenance from religious identity and nationalism. With his penetrating irony the poet muses on a situation shaped by the insensitive contemporary society that fills the narrator of the poem with despair and bewilderment: Cheezen Nahin Ho Rahin Har Pal/ Dharmo Mein Kisi Trarah Ke Badlaw Ki Koi Technic Nahin Hain Hamare pas/ Har Doosra Admi ya to Kufr Hai/Hai Ya Desh Drohi (Things are not changing every moment/ We do not have any technique to change the religion/Every other person is either infidel or traitor.) In one of his refreshingly evocative and nuanced poem ‘Voiceless’ the young poet who edits a reputed literary web magazine ‘Somalochna’ initiates a dialogue between nature and man that takes place at the level of voice and sound. The poet concludes that crying too has natural disposition but if one decides to weep soundlessly then we must understand that the time has come to raise voice against all pervading decline and decay. The poet is completely lost to realise that universal truths and emancipatory ideologies have ceased to exist. The threat of an indissoluble uniformity produces in him a strong sense of dejection. Arun Dev’s poems “Chahat” (Love) “Rafi Ke liaye Ek Sham” (An evening dedicated to Mohammad Rafi) and “Vigyapan Aur Istri” (Advertisement and woman) try to encapsulate the vicissitude of contemporary life and narrator of the poems strives for going beyond the familiar reality to come to grips with the ever changing social values. Usurpation of values by cross commercialism sets in motion weird euphoria that produces plenty of darkness. Arun Dev eschews long-winded description and concentrates on polarization of sensitivity that resists stifling harmonization. The poet’s poems shun every streak of self-indulgence, sentimentalism and quick witted responses wrapped in statements and for him usual staid props seem to be some sort of anathema. His poem exhorts us to rely on visual senses more than the analytical sense. Arun Dev’s poetry acquaints us to a parallel reality in which there is no trace of fusion of emotive content His pungent sarcasm hardly recedes into self pity and his many poems are endowed with a marked sense of love when is gradually waning as a central motif of the poetry. Arun Dev’s poems betray a rare ability to fathom human psyche that stomachs the incongruities of life with a sense of satire. For him poetry is the only means of much desired redemption.
इसी समय में

अजानों में धमिकयां थीं गेरुए टीके हिक्कारत से दमकते
भावनाओं के जख्मों से बहते लहू में लिथड़े थे शहर और कसबे
सर काटने को लम्बे जुलूस थे
पंचायतें थीं प्रेम के प्रतिशोध में
और नफरत की आंधी में कुछ दिख नहीं रहा था

मजहब की इबारतें इतनी मजबूत हुईं कि
कि उसकी छत में छिपना मुनासिब समझ रहे थे सब

न कोई कुछ कहता न इंकार करता
जहाँ थे सब चुप थे

जो जगहें थीं कहने सुनने की वहाँ अब कायदे थे
गुस्ताखी की सज़ा मौत थी

निरीह गायों से डर लगता
धर्म की किताबें किसी मानव बम से कम नहीं
कहीं भी फट सकती थीं

एक अदृश्य ताला था हर एक ज़बान पर

मिलने जुलने की जगहें जमीन और आकाश के बीच कहीं थीं
उसका हर पल अहसास होता पर वह थीं नहीं
हालांकि हम वहां देख सकते थे सुन सकते थे कह सकते थे

उसकी ताकत का एहसास तब होता जब उसके कारण
बंद हो जाते बाज़ार

चीजें नयी हो रहीं हैं हर पल
धर्मों में किसी तरह के बदलाव की कोई तकनीक नहीं है हमारे पास

हर दूसरा आदमी या तो कुफ्र है
है या देशद्रोही.


सोलहवीं शताब्दी के सूफी कवि जायसी के कुरूप पर हँसने वाले
उनको सुन कर रोने लगते थे
उनकी कविता रक्त और आँसुओं से लिखी गयी थी

उनके मुरशिद-पीरशाह मुबारक बोदले जागते रहते थे
पोस्ते का पानी उन्हें थोड़ी देर के लिए सुला जरुर देता था

जायसी ने अपनी पहली कविता पोस्तीनामा अपने पीर को सुनाई
उन्हें पीर के रतजगों का इल्म न था
और एक मुसलसल जगे हुए आदमी से वह अपनी कविता में
नशे के खिलाफ दूर तक चले गए

उसी रात छत गिरने से दब गए मालिक मुहम्मद के सभी बच्चे
ऐसा माना गया

जायसी के विलाप से पोस्ते-दाने का जब नशा टूटा
शाह मुबारक बोदले ने कहा जाओ तुम्हारी किताबें कयामत तक तुम्हें जिंदा रखेंगी

सूर्य की तरह तपता सुल्तान शेरशाह अस्त हो गया
चूर-चूर होकर गढ़ मिटटी में मिल गए

नहीं है अब रत्नसेन
नहीं है वह पारलौकिक सुन्दरी पद्मावती
वह क्रूर आसक्त अलाउद्दीन भी नहीं

पर है वह कहानी
युद्ध के अंत की वह राख अभी भी बची है
जो हर धर्म-युद्ध के बाद हर जगह बची रह जाती है
जिसे वह शायर अपनी डबडबायी करुणा में देख सका

ऐसा कहा जाता है कि अपने अंत समय में मलिक मुहम्मद बाघ में बदल गए थे

अगर ठीक से पढ़ें पद्मावत तो उसमें भी यह दहाड़ सुनाई पडती है
सत्ता के अहंकार पर एक कवि की दहाड़.

रफी के लिए एक शाम

मंच पर रौशनी थी
जितनी जरूरी होती है खुद से मुलाकात के लिए

नायकों की तरह एक-एक कर आये गीतकार
कोट पुराने थे उनके
जूते घिसे हुए
चेहरों पर समय की शिकन
हथेलियाँ में मशक्कत का खुरदरापन
थोड़ी फीकी उनकी रंगत
पर आँखों में बा-शऊर जिंदगी की चमक

माइक हाथ में लेते ही बहने लगा प्यार के राग का दिलकश संगीत

एक ऐसी दुनिया जहाँ इश्क था, थीं निष्ठुर प्रेमिकाएं
प्रेम के लिए आर्तनाद करते प्रेमी थे
बेवफाई का सुरीला गीत प्रेम के ध्वंस से उठता
और हुस्न वो शबाब के प्रार्थना में खो जाता

जहाँ न काशी से कुछ गरज था न काबे से कोई वास्ता

हालाँकि उनमें से कुछ के गले बैठे ग़ये थे
समय बड़ा भारी गुजर रहा था
हर मुलायम चीज हर मासूम शै रंगों रूप खतरे में थे

उस सर्द रात जब हवाएं पत्तों से होकर गुजरती
सन्नाटा बज उठता
तारों की रौशनी में कोई खोज़ रहा था अपने चाँद को

यार की याद में खोये- खोये आसमान के नीचे
उस रात लोग अपने-अपने गम सुनने को इक्कठे थे
कभी वे ख़ुशी में हंस पड़ते कभी ठहर कर चुप हो जाते 

एक दाढ़ी बेखुदी में हिल रही थी
देखा किये तुमको बन के दीवाना
एक फर वाली टोपी  कह रही थी आसूं की तरह न गिराना मुझे

एक खामोश आवाज़ ने धीरे से कहा बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है
पूरा जलसा फूलों से भर गया

किसी के यार की शादी में सब बिन बुलाये शामिल हो गए
जब बाबुल ने दुआ मांगी भीग़ गए सबके कंधे

फिक्र को धुंए में उड़ाते कई चेहरे वहाँ धुंआ धुंआ हो रहे थे
विरह की कंपकपाती लौ में किसी ने टूटी आवाज़ में पूछा
क्या हुआ तेरा वादा ?

बैठी स्त्रियों के श्रृंगार हंस रहे थे
जैसे कोई उनके ही लिए गा रहा हो ये रेशमी जुल्फें ये शरबती आंखें
कभी वे भी किसी के लिए चौदवीं की चाँद हुआ करती थीं
कोई उनके नाज़ुक होठों को छूने के लिए ऐसे ही लरजता था

इश्क के मनुहार का जब कोई गीत फूटता
वे हँसती

जैसे उन्हें अभी भी इंतजार हो कि कोई कहेगा अब तो आँखों में सारी रात जाएगी
जिसे लम्बे दाम्पत्य में भूल गये थे उनके पति

कुछ किशोर सोच रहे थे
यह कौन सी दुनिया है
ऐसे नगमे ऐसे साज़ ऐसे ज़ज्बात
यह कैसा झरना कि जहाँ जिंदगी खुद गाने लगे

मेरे बगल में बैठा एक बच्चा अपने अब्बा को देख रहा था
इतने संजीदा होते थे ये तो
कभी मेरे सामने अम्मी का हाथ तक नहीं पकड़ा
और आज रुख से नकाब हटाने की ऐसी शोख गुजरिश कर रहे हैं

उनमें दूर- दूर तक न कहीं पिता था न पति
था तो बस एक पुरुष एक स्त्री के सामने खड़ा
जो कातरता से कह रहा था मुलाकात का वादा तो करती जाओ

तीर,तलवार, कांटें, बरछी जैसे दिनों में यह राहत की शाम थी
यह रफी की शाम थी.

विज्ञापन और स्त्री

यह सुंदर देह
आत्मविश्वास से भरी यह मुद्रा
स्वास्थ्य की यह चपलता
मैं तुम्हें बार-बार देखता हूँ

पर कुछ ही देर में तुम बेचने लगती हो घड़ी, कपड़ें, कारें

एक सोफा तुम्हारे जैसा तो कभी नहीं हो सकता ?

तुम्हारी आवाज़ तक में फंदे डाल दिए गए हैं

हाट में सब्जी बेचती हैं स्त्रियाँ
पर मैंने कभी लौकी खरीदते हुए उसमें उन्हें शामिल नहीं पाया

इतिहास में इतनी चीजें इतनी बार बेची खरीदी जा चुकीं हैं कि
उसमें पहले विक्रेता का चेहरा नहीं दिखता

अनाजों के अदल बदल में संभव है कि किसी स्त्री को ही सूझा हो विक्रय
संभव हो इस धरती की पहली विक्रेता कोई स्त्री हो

जब तक यह व्यापार स्त्रियों के हाथों में रहा होगा हाट में सामान ही बिकते होंगे
यह मुनाफा नहीं था
यह सभ्यता की सीढियाँ थीं
सभी चीजों के सभी जगह उपलब्ध होने का एक उत्सव
जहाँ रंग मिले, आवाजों ने एक दूसरे को पहचाना
गान और कथाओं की बैठकी जमी
स्वाद, श्रृंगार और परिधान के आदान-प्रदान का मेला लगा  

अधीनता के फिर लम्बे बर्बर दौर में 
वे धीरे धीरे खुद सामानों में बदल गयीं

उनका श्रम बिका,   बिके उनके बच्चे
उनका रूप, उनकी आवज़, उनका नृत्य उनकी देह, उनका होना भी खरीद लिया गया

समुद्रों पर खींच दी गयीं रेखाएं
रेगिस्तानों में लम्बे-लम्बे कारवां थे
सरायों में भरे रहते थे व्यापारी

अब  तलवारें, घोडें और गुलाम बिकने लगे

और फिर बिके देश, लोग और खरीदने बेचने की आज़ादी
और फिर उनकी खुद की आज़ादी 

आज तुम्हारी आड़ में कोई नियत्रित कर रहा है मेरी जरूरतें
वह बेच रहा है तुम्हारा रूप
बेच रहा है  स्त्री पुरुष का  आदिम आकर्षण

वह फिर तुम्हें बेच रहा है
तमाम तरह की आजादियों के बीच.

बे आवाज़

बे आवाज़ गिरते हैं पत्ते
वे वृक्षों के लिए गिरते हैं, जड़ों पर गिरते हैं

बे आवाज़ घूमती है पृथ्वी घूमती हुई अपनी धुरी पर
हर हिस्से को रौशनी में रंगती हुई, ऋतुओं के लिए

चन्द्रमा घटता बढ़ता है
सूरज से उसकी शिकायत का ज़िक्र तक नहीं किसी कथा में

जल जैसा चुप्पा तो मैंने आज तक नहीं देखा
अपने लम्बे फैलाव में चादर तान कर सोता हुआ 

तमाम फुसफुसाहटों के बावजूद जंगल की ख़ामोशी में चुपचाप पलता रहता है
एक दूसरा ही संसार
जैसे समुद्र के तल पर तमाम तरह की हरकतों के बावजूद हमतक
नहीं आती कोई आवाज़

यहाँ तक कि प्रेम के सघन वन में
हमारे पास आवाज़ की जगह कुछ ध्वनियाँ ही रह जाती हैं

पत्ते तब शोर करते हैं जब काटा जाता है वृक्षों को
आत्मरक्षा में वे इससे अधिक और क्या कर सकते हैं ?

जब तोड़ा जाता है पहाड़ों को
उनके अंदर से एक बड़ी डरावनी सी आवाज़ आती है
जैसे किसी गुफा में कहीं से फूटती रौशनी के रास्ते में आ जाये कोई भारी पत्थर

नदियों में गिरते नाले में बदबू का शोर भरता रहता है
कुँए से कभी-कभी आती है गों गों करती आवाज़
जिसे दम घुटने पर शरीर अपनी तनी मांसपेशियों से पैदा करता है 

जब एक घड़ी साज से कहा गया कि अब नही है घड़ियों के लिए जगह
तब मैंने उसके अंदर से सुइयों के तेज़-तेज़ चलने की आवाज़ सुनी
हालाँकि वह चुप चाप लौट रहा था घर की ओर

सिलाई मशीन को ठीक करते रोशन सिंह के अंदर से मुझे आती है
कलपुर्जों की खट-खट
जैसे वे स्त्रियों के लिए व्यक्त कर रहे हों आभार
जो अपने असहायता में कपड़ों को जोडती हुई मोहताज़ नहीं हैं किसी की

तार, ट्रंककाल, टेलीफोन की स्वर लिपियां लुप्त हो गयीं हैं
चिट्ठियों तक की सूख गयी है स्याही
कभी इसका पानी हमारी ख़ुशी में उछलकर आखों में चमकने लगता था
दुःख से लुढकते हुए गालों से बह जाता था

रोने की भी स्वाभाविकता होती है
पर अगर कोई बे आवाज़ रोये
तो समझ लेना चाहिए कि यह आवाज़ उठाने का समय है. 


तारे लिखते हैं तुम्हारा नाम
सरसराती हुई हवा तुम्हें पुकारती है
तुम्हारी याद में हरा कुछ और गाढ़ा हो गया है

नदी से अभी अभी निकले सूरज को देखता हूँ
तुम्हें कभी भी पूरा कहाँ देख पाया मैं

नदी के पार मेरा घर है
पर मुझे अपने साथ बसा लो
मैं लम्बे रेगिस्तानों को पार करता हुआ सदियों से खोज रहा हूँ तुम्हें

मेरे पास सिवाय चाहत के और कुछ नहीं है.
अरुण देव
१६ फरवरी १९७२, कुशीनगर
उच्च शिक्षा जे.एन.यू. नई दिल्ली से
युवा कवि और आलोचक
क्या तो समय’,  कविता संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से २००४ में और कोई तो जगह हो, कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से २०१३ में प्रकाशित.
कोई तो जगह होके लिए २०१३ का राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान
नेपाली, मराठी, असमिया, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में कविताओं का अनुवाद और कुछ लेख प्रकाशित
५ वर्षों से हिंदी की चर्चित वेब पत्रिका समालोचन का संपादन
सम्पर्क :
Dr. Arun Dev
5/ Himalayan Colony (Nehar Colony)
Najibabad (Bijnor)
UP- 246763
e mail: devarun72@gmail.com

0 thoughts on “अरुण देव की कविताएं”

  1. विषय मे नयापन है।कविताएँ मुझे मौलिक लगीं जो कविता का मेरुदंड होती हैं। बेवजह का
    चमत्कार और कलाकारी नही है। बधाई बंधु को।

  2. अनुनाद का आभार। अरुण जी को पढ़ने का अलग आनंद है। न जटिलता, न कृत्रिमता। धीमे धीमे, शाइस्तगी से बात कहती कविताएँ।

  3. आपकी कविताएं अनुभव और संवेदना का एक शिखर रचती हैं। वे अपने समय के यथार्थ और संवेदना की नमी से भीगी हुई लगती हैंैं। जायसी को लेेकर जो काव्‍यात्ममक संंरचना आपने बुुनीहैै, रफी केे लिए एक शाम जिस पिच पर श्‍ाुरु होकर जिस मोड़ पर खत्‍म होती हैै वह कवि के भ्‍ाीतर की मस्‍ती का परिचय देती हैै। उसकी चाहत भी कितनी माामूली ओर कितनी अपरिहार्य है यह चाहत कविता खुद ही बयान करती है। अरुण देव का कविता संंसार आहिस्‍ता आहिस्‍ता अपने चुुबंक से सहदयों को अप्रभावी नही रहने देता। अनुनाद को बधाई कि उसे ऐसे तेजस्‍वी कवि की कविताओंं काा सहकार मिलाा।

  4. अरुण जी की कविताओं को पढना याने एक नयी दृष्टी से जीवन को देखना. जीवन से जो लुप्त होता जा रहा है उसे अचानक सामने खड़ा पाते हैं आप इन कविताओं में. अब जैसे यह वाक्य मेरे पास सिवाय चाहत के और कुछ नहीं है. शुक्रिया शिरीष जी का इन अद्भुत कविताओं को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए.

  5. Prajna Pathak
    विज्ञापन और स्त्री ; जिनका "होना" बिक चुका है वह "आजादी" के भरम में फिर फिर बिक रहा है .स्त्रियों के सन्दर्भ में आज़ादी की मुकम्मल पहचान एक कठिन काम है .उस कठिन काम की ओर उठाया गया एक मजबूत कदम है ये कविता .

    Sushil Kumar
    विज्ञापन और स्त्री : स्त्री से स्त्रैण तक बाजार में बिकने की क्रियाओं का बड़ा जीवंत चित्रण किया है , Arun Dev आपने , सभ्यता के विकास की आड़ में बाज़ार के कुत्सित रूप की कई छवियों को स्मृति के कागज पर उकेरकर । अभिभूत हुआ इसे पढ़कर । बधाई इस बढ़िया कविता के लिए !

    Vandana Sharma
    विज्ञापन और स्त्री : विज्ञापनों के बाज़ार में प्रायोजित स्त्री की प्रायोजित छवि का सूक्ष्म निरीक्षण और परीक्षण है इस कविता में । विवश समय में सामान में ढाल दी गई स्त्री ने माँ , पत्नी , बेटी, बहन….न जाने कितने रूपों में अपने "होने" को बचा ही लिया था लेकिन इन तथाकथित सुन्दरियों ने उसके हिस्से के स्वाभिमान और उपलब्धियों को भी दाँव पर लगा दिया है । सामानों की क़तार में उन्होनें स्वयं को सज़ा लिया है । आज़ादी का संकल्प उठाने वाली आधी आबादी की संघर्ष यात्रा को विराम लगा दिया है ।इस आधी आबादी की नई पीढ़ी इनके सपनों को ही अपना यथार्थ मान रही है क्योंकि उन्हें ये रास्ता आसान दिखाई दे रहा है । बाज़ार में अपने कोस्वयम् प्रस्तुत करती औरतोंके सच को बयान करती इस कविता के कटु यथार्थ को कैसे कह दूँ ? अति सुन्दर । स्त्री-मुक्ति के छद्म को बेनक़ाब करने वाली इस कविता के कवि के कन्सर्न को अवश्य सलाम …लाल नहीं हरा नहीं ,भगवा नहीं पीला,गुलाबी बैंगनी… नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ मानवीय सलाम ।
    ————– पता नहीं किन वजहों से ये कुछ टिप्पणी लग नहीं पायीं, इन्हें अपने इनबाक्स से यहां लगा रहा हूं

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