अनुनाद

ये कैसी हूक सी उठती है ख़ामोशी के सीने से…आत्मा को मथता आर्तनाद/ जगजीत सिंह पर कौशलेन्द्र सिंह का लेख

On Feb 8, 1941, nation got a virtuoso of music who gave number of popular ghazals which are still crooned by the music lovers. (HT File Photo)

स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन में कोई संगीत सुन रहा हूँ। कैसेट समाप्त होते ही पिता का स्वर उभरता है “अब तनिक मेरी पसंद का कुछ सुनो बेटा!” और वो एक कैसेट लगाते हैं, जिसके लगते ही पंजाबी टप्पे सुनायी देते हैं एक महफ़िल के चमकीले संगीत के साथ ‘मक्खियाँ डस लेंगी गुड़ थोड़ा खाया करो……’ (पंजाबी में)। वो रिकॉर्डिंग रॉयल अल्बर्ट हॉल, लंदन की थी और कलाकार एक युगल दंपत्ति था। जगजीत से वो मेरा पहला साबका था।

उस वक़्त ग़ज़ल से दूर दूर तक परिचय न था। होता भी भला कैसे वो उम्र ही नहीं थी। एक दस बारह वर्ष के बालक से ग़ज़ल सुनने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। हालांकि ये पंक्ति मुझे चुटीली लगी और शायद इसीलिए ज़ेहन में रह गयी। ख़ैर वो पहला ज़ायक़ा था किसी सजीव रिकॉर्डिंग को सुनने का जो धीरे धीरे बढ़ता गया सुनते सुनाते। जगजीत इस पसंद के पहले क़िरदार रहे और आख़िरी भी, शायद क्योंकि फिलहाल ऐसा कोई नाम उभरता नहीं दीखता इस क्षेत्र में।

ग़ज़ल एक अरबी शब्द है जिसके मायने है ‘माशूक से बातचीत’। गुज़रे ज़माने में शायद इसीलिए ये महफ़िलों में शराब और शबाब के साथ परोसी जाती रही। ग़ज़ल की पैदाइश ऐशोआराम और सुकून की तलाश में हुई, जहाँ इसके अंजुमन में बड़े बड़े निज़ाम, रसूखदार लोग शरीक़ होते रहे। ग़ज़ल से आम आदमी उसी तरह दूर रहा, जिस तरह किसी कीमती शय से मुफ़लिसी। दूरी का कारण ये भी शायद कि इसकी ज़बान, बनक पेचीदा थी। साथ ही साथ इसकी कहन में एक पर्दादारी थी, जोकि सबकी समझ से बाहर थी। आज भी ग़ज़ल के चाहनेवाले हैं तो ज़रूर मगर उसका वास्तविक लुत्फ़ उठानेवाले क़द्रदान कम ही मिलते हैं। उसका एक बड़ा कारण है नफ़ीस उर्दू को समझने वालों की बेहद कमी। ग़ज़ल सुनने और सुनानेवालों दोनों से एक मिज़ाज माँगती है, जिससे वो अपने चाहनेवालों से एक राब्ता क़ायम कर सके। जब तक ये नहीं होगा दोनों में से किसी को भी उसका स्वाद नहीं मिलेगा।

हिंदुस्तान में ग़ज़ल पनपी और ख़ासी मक़बूल हुई। बँटवारे के बाद बहुत से उम्दा ग़ज़ल गायक सरहदों में बंध गए। ग़ज़ल चाहने और गाने वालों की एक बड़ी जमात यहाँ से कूच कर गयी, जिसमें नूरजहाँ जैसी उम्दा ग़ज़ल गायिका थीं। फिर भी ग़ज़ल को चाहने सुनने और पढ़ने वाले बने रहे और इस तरह सदियों का सफ़र करते ग़ज़ल ज़िंदा रही। ग़ज़ल को संगीतबद्ध करना, उसे गाना, ये पूरी तरह से उसको एक नया कलेवर देता है, जिसमें वो अपने अनेक आयाम तलाशती एक पुरसुकूँ तासीर बुनती है। ग़ज़ल की एक निश्चित संरचना है, जिसमें क़ाफ़िया, रदीफ़ और उसका मीटर यानी बहर शामिल है। मतला, मक़ता, मिसरे भी उसी के हिस्से हैं। ग़ज़ल कविता नहीं है, इसलिए थोड़ी पेचीदा है। इसका एक शेर दूसरे से पूरी तरह भिन्न हो सकता है। इसका जो सेंट्रल थॉट या आत्मा है उसी से इसका असर उभरता है। उसी असर को केंद्र में रखकर इसकी कम्पोजीशन तैयार की जाती है। गाने वाले को उसे ध्यान में रखते हुए ग़ज़ल का मिज़ाज तय करना होता है। उर्दू शब्दों की गहरी समझ और उनके तलफ़्फ़ुज़ की बड़ी अहमियत होती है। हालांकि ग़ज़ल बहुत हद तक अपने स्वरूप में बदलते वक़्त के साथ ढल गयी है। ग़ज़लें अब हिंदी में भी लिखी जाती हैं, जिसकी शुरुआत दुष्यंत कुमार ने की और बेहद ख़ूबसूरती से की। ग़ज़ल अब रुमानियत के पर्दों से निकलकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ने लगी है।

हिंदुस्तानी ग़ज़ल गायिकी में चंद नाम ज़ेहन में सबसे पहले आते हैं, जिनमें बेग़म अख़्तर, मेंहदी हसन, नूरजहाँ, मल्लिका पुखराज, इक़बाल बानो, जगजीत सिंह, ग़ुलाम अली ख़ाँ हैं। गुज़रे ज़माने में फ़िल्मों के लिए भी ग़ज़लें लिखी जाती थीं और फ़िल्मों में बेहद सफल पार्श्वगायकों ने भी ग़ज़लें गायीं जो बहुत मक़बूल हुईं। इनमें शमशाद बेग़म, मुबारक़ बेग़म, सुरैया, मो.रफ़ी, तलत महमूद, मुकेश, लता मंगेशकर, आशा भोसले इत्यादि नाम शामिल हैं। कुछ फ़िल्मी संगीतकारों ने बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़लें सांगीतबद्ध कीं, जिनमें मुख्यतः दो नाम मुझे याद आते हैं- मदनमोहन और ख़य्याम।

बेग़म अख़्तर के पश्चात जो बड़ा नाम विभाजित भारत से वैश्विक परिदृश्य में उभरा वो जगजीत सिंह है। उनके जितनी लोकप्रियता कम से कम भारत से किसी दूसरे ग़ज़ल गायक की नहीं रही। उन्होंने ग़ज़ल को महफ़िल से निकालकर आम लोगों के मनोरंजन और सुकून तक पहुँचाया। उन्होंने ग़ज़ल के मूल स्वभाव को न छेड़ते हुए उसे नए कलेवर में ढाला। पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ साथ आधुनिक साज़ोसामान जैसे गिटार, की-बोर्ड, ड्रम, वायलिन, परकशन इत्यादि का प्रयोग किया। इसके लिए उन्होंने आरम्भ में ख़ासी आलोचना का सामना किया, लेकिन वो इस बात को लेकर इस क़दर मुतमईन थे कि वो कहते थे “मैं नहीं मानता कि ग़ज़ल को केवल तबला और हारमोनियम से ही हमेशा बंधे रहना चाहिए। ये ज़रुरी हैं, मगर समय के साथ प्रस्तुति में आधुनिकता का समावेश होना चाहिए

जगजीत ये भी कहते थे कि अब हमारे यहाँ आम लोगों में उर्दू को समझने वाले कम हैं इसलिए जब तक ग़ज़ल उनकी ज़बाँ में उन तक नहीं पहुँचेगी, तब तक वो कैसे उसका लुत्फ़ उठा पायेंगे! जगजीत अपनी ग़ज़लें चुनने में बड़ा समय लेते थे। वो आम ज़िंदगी की तक़लीफ़ों, सामाजिक, आर्थिक मुद्दों की मौज़ूदगी को अपनी ग़ज़लों में तरज़ीह देते थे और पूरे हृदय से उनको अपनी धुनों में उभारते थे। वो ग़ज़ल गायक से इतर एक बेहद उम्दा कम्पोज़र थे। फ़ारुख़ शेख़ के मशहूर कार्यक्रम  ‘जीना इसी का नाम है’ में उनकी पत्नी चित्रा, जोकि स्वयं एक सफल गायिका थीं ने कहा था  “मैं इनको पहले एक बेहतर कम्पोज़र मानती थी। लेकिन बीते अरसे में इन्होंने जिस तरह अपनी गायिकी में बदलाव किया, उससे मैं अब कह सकती हूँ कि ये उतने ही अच्छे गायक भी हैं जगजीत ने एक साक्षात्कार में कहा कि “मेरी आवाज़ शायद एक प्लेबैक सिंगर के लिए उतनी मुफ़ीद नहीं थी इसलिए मैंने ग़ज़ल पर ही ध्यान रखा। इसमें अपने हुनर को पेश करने की पूरी आज़ादी है और गायिकी का लुत्फ़ भी।”

जगजीत के आरंभिक दिनों में उनका स्वर भारी तो था ही उसमें एक बिखराव भी था, जिसे उन्होंने निरंतर रियाज़ करके बाँधा और सुधारा। उनकी आवाज़ में जो एक गमक थी, जिसे हम अंग्रेज़ी में बेस कहते हैं वो अद्भुत ठहराव के साथ उभरी। उनके बेहद क़रीबी रहे घनश्याम वासवानी जोकि स्वयं एक ग़ज़ल गायक हैं, उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते “वो ‘सा’ का रियाज़ घंटों करते थे, जिससे उनकी आवाज़ को वो वज़न मिला, जिसके शुरू होते ही पूरा हॉल गूँज उठता था। तालियों की गड़गड़ाहट थमती न थी। उनके स्वर का असर ही अलग था। उन्होंने मुझे गाने के अलावा कंपोज़ करने के लिए प्रेरित किया और एक दिन जब उनको लगा कि ठीक हुआ है तो उन्होंने फ़ौरन कहा “चलो रिकॉर्डिंग करते हैं।” इस तरह उनके साथ मेरा एक एल्बम ‘फॉरगेट मी नॉट’ आ सका जिसे लोगों का ख़ूब प्यार मिला।” उनकी ही टीम के बाँसुरी वादक रोनू मज़ूमदार जो आर डी बर्मन के साथ भी रह चुके थेए कहते हैं कि वास्तव में ‘सा’ को अगर किसी ने संगीत में साधा है तो पहले मेंहदी हसन और दूसरे जगजीत सिंह।

शुरुआत में उन्होंने जब अपनी पत्नी चित्रा सिंह के साथ ग़ज़ल गायिकी के लिए जोड़ी बनाकर गाना शुरू किया तो उन्हें कठिन संघर्ष से गुज़रना पड़ा। सबसे बड़ा कारण तो यही की दोनों की आवाज़ में बहुत फ़र्क़ था। जगजीत का स्वर भारी था और चित्रा जी का उतना ही तीखा, पतला। सत्या सरन की पुस्तक ‘बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी’ में चित्रा जी कहती हैं कि “कई बार वो थोड़ा झुंझला जाते थे क्योंकि जिस तरह से वो चाहते थे वैसा होने में मेरी आवाज़ की वज़ह से मुश्किल आती थी। प्रस्तुति के दौरान वो अक्सर जब मेरी तरफ़ देखते थे तो मैं समझ जाती थी कि अब मुझे रुकना है। कई बार इसी लिए वो अकेले गाना पसंद करते थे।” इन बातों को एक तरफ़ रखकर अगर देखें तो भी ये बात कहनी पड़ेगी की उनकी जोड़ी को लोगों ने पलकों पर बिठाया। उनकी गायिकी को पहली सफलता तब मिली जब एच एम वी ने उनको एल पी(लॉन्ग प्ले गोल विनाइल रिकॉर्ड) रिकॉर्ड करने की अनुमति दी तो इस बाबत उन्होंने उनको ख़य्याम साहब से मिलने को कहा।

ख़य्याम जगजीत की गायिकी को पसंद करते थे, मगर ये दोनों जब भी उनसे मिलने जाते तो वो रिकॉर्डिंग को छोड़कर बाक़ी ख़ूब बातें करते, बड़े स्नेह से मिलते और स्वागत करते। ये सिलसिला बहुत दिनों तक चला और जब बात बनती नहीं दिख रही थी, अत्यधिक विलंब हो रहा था, तो इन्हें चिंता सताने लगी क्योंकि कंपनी का मूड कभी भी बदल सकता था जोकि इतने दिन के संघर्ष के बाद बना था। इस डर से ये निर्णय लिया गया कि जगजीत ही अब उस एल्बम को कंपोज़ करेंगे। लिहाज़ा कंपनी को मनाकर रिकॉर्डिंग की गयी और इस तरह से इस जोड़ी का पहला एल पी बाज़ार में उतरा जिसे ‘अनफॉरगेटबेल’ नाम दिया गया। ये एल्बम इतना चर्चित और सफल रहा कि इसकी रिकॉर्ड बिक्री हुई। इसकी तमाम ग़ज़लें जिनमें ‘सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब, आये हैं समझाने लोग, बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, ये मोज़िजा… इत्यादि लोगों की ज़बान पर चढ़ गयीं। ये उनकी पहली सफलता थी। बाद में वो दोनों ख़य्याम साहब के पास उस रिकॉर्ड को लेकर उन्हें आदर सहित देने गए जिसका उन्होंने हृदय से स्वागत किया। जगजीत से एक बार साक्षात्कार में पूछा गया कि आप किसको संगीत जगत का सबसे बेहतरीन संगीतकार मानते हैं तो उन्होंने बेझिझक ख़य्याम साहब का नाम लिया और उनका एक गीत भी गुनगुनाया “कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है…..”।

जगजीत ने अपने संगीत के सफ़र में बेहद संघर्ष किया। हर तरह से लोगों के दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश की। शुरुआत में वो प्राइवेट महफ़िलों में गाते थे और ख़ूब सराहे जाते थे। वो तमाम ऐसे देशों में गए, जहाँ उन्होंने लोगों का भरपूर मनोरंजन करने के लिए पंजाबी गीतों में स्टेज पर सबके साथ डांस भी किया। इसे बताने में उन्हें कभी झिझक नहीं रही, हालांकि उनकी पत्नी चित्रा को ये पसंद नहीं था और जैसे जैसे वो मशहूर हुए ये सब छूटता गया। सुननेवालों को ख़ुद से जोड़ने के लिए वो तमाम लतीफ़े सुनाते थे ग़ज़ल के बीच ही, वो कहते थे भले आप कितना भी अच्छा गाते हों लेकिन ऑडियंस से एक गानेवाले को राब्ता बनाना पड़ता है। उसे यूँ लगे कि इतनी भीड़ में सिर्फ़ मेरे लिए गा रहा है, वरना आप आँखें बन्द करके अलाप लेंगे और जब खोलेंगे तो मैदान साफ़ मिलेगा।

प्रसिद्ध फ़िल्मकार और संघर्ष के दिनों के उनके साथी सुभाष घई एक घटना याद करते हैं जोकि किसी अंतरराज्यीय महाविद्यालयों की संगीत प्रतियोगिता थी, जिसमें हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से जगजीत प्रतिभाग लेने गए थे। बहुत सारे लोगों के गाने के बाद जब जगजीत स्टेज पर आए तो एक पगड़ी पहने सरदार को देखकर लोगों ने हूटिंग शुरू कर दी। ख़ैर जगजीत उससे विचलित नहीं हुए और उन्होंने गाना शुरू किया, थोड़ी ही देर में वहाँ सन्नाटा छा गया और जगजीत ने जब अपनी प्रस्तुति समाप्त की तो तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा प्रांगण गूँज उठा। लोगों ने एक और गीत की फ़रमाइश की जोकि वो तैयार करके नहीं गए थे। फिर उन्होंने रफ़ी साहब के गाए गीत ‘ओ दुनिया के रखवाले….’ गाकर सुनाया। प्रस्तुति के अंत में उन्हें दर्शकों से कुछ पैसे भेंट में मिले जो उनके सुननेवालों का उनके लिए स्नेह था।

जगजीत लगातार मुम्बई के संगीत जगत में संघर्ष कर रहे थे, उन्हें लोग सराहते तो बहुत थे पर काम कोई नहीं देता था। लोग प्राइवेट समारोहों, महफ़िलों में उन्हें बुलाते थे, जहाँ उन्हें ख़ूब तालियाँ मिलती थीं पर वही लोग उन्हें फ़िल्मों में या अन्यत्र कहीं पूछते तक नहीं थे। इसी दौरान उनका चित्रा जी से मिलना हुआ जोकि विवाहित थीं और उनकी एक बेटी भी थी। चित्रा के पति का एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो था जिसके मार्फ़त वो रिकॉर्डिंग के सिलसिले में उनके पति से परिचित हुए और इस तरह चित्रा से। किसी का व्यक्तिगत जीवन कितना अजीब हो सकता है ये इस बात से समझा जा सकता है कि चित्रा के पति ने जब उनसे तलाक़ के काग़ज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा तो वो अवाक रह गईं क्योंकि उनका गृहस्थ जीवन पूरी तरह ख़ुशहाल था और चित्रा को इस बात का अंदेशा तक न था कि ऐसा कुछ दूर दूर तक भी उनके जीवन में घट सकता है। चित्रा ने चुपचाप तलाक़नामे पर हस्ताक्षर कर दिए। उन्होंने अपने पति की तरफ़ देखा वो उनसे नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। बाद में पता चला कि उनके पति का अपनी सेक्रेटरी के साथ अफ़ेयर था।

इस हादसे के बाद जगजीत से उनकी क़रीबी बढ़ी और एक बार जगजीत के साथ रास्ते में एक दुर्घटना घटी जिसमें उनके पाँव में चोट आयी। चित्रा भी साथ में ही थीं वो उन्हें अपने घर ले गयीं और सिंकाई के लिए पानी गर्म करने लगीं, जगजीत कराह रहे थे और कुछ कुछ होश में नहीं थे। वो सोफ़े पर लेटे हुए थे और उनसे कह रहे थे कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। चित्रा हकबका सी गयीं और बोलीं “ ये क्या बात हुई…! ख़ैर धीरे धीरे उसके बाद नज़दीकियाँ बढ़ीं और दोनों ने एक समय बाद विवाह करने का निर्णय लिया। विवाह से पूर्व वो उनके पूर्व पति से मिलने भी गए शायद इस भाव से की जगजीत उन्हें बताना ज़रूरी समझते थे। चित्रा की बेटी मोनिका अपने पिता से उनके विवाह के बाद मिलने जाती थी, हाँ रहती वो जगजीत चित्रा के साथ ही थी। जगजीत उससे बेहद स्नेह रखते थे और वो भी उनके साथ वैसे ही घुलमिल गयी।

विवाह के पश्चात जगजीत चित्रा का जीवन अपना आकार लेने लगा और दोनों की मेहनत से उन्हें लोगों का प्यार मिलने लगा। अनफॉरगेटबेल के बाद उनके तमाम एल्बम आये, जिन्होंने ग़ज़ल की दुनिया में इस जोड़ी को एक ख़ास मक़ाम दिया, जिनमें मुख्य हैं माइलस्टोन, साउंड अफेयर, पैशन्स, बियॉन्ड टाइम, होप्स, लाइव एट रॉयल अल्बर्ट हॉल, डिज़ायर्स, इकस्टेसीस इत्यादि…बियॉन्ड टाइम पहला ऐसा एल्बम था जिसे डिजिटली रिकॉर्ड किया गया।

जगजीत अपने संघर्ष के दिनों के तमाम मित्रों से निरंतर जुड़े रहे। अपने शायर दोस्त सुदर्शन फ़ाकिर की ग़ज़लों पर उन्होंने एक ख़ूबसूरत एल्बम निकाला जिसका नाम था ‘द लेटेस्ट ग़ज़ल्स’ जिसकी तमाम ग़ज़लों के साथ एक ग़ज़ल बेहद मक़बूल हुई ‘वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी….।

उसी दरमियान गुलज़ार जब मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब पर सीरियल बना रहे थे तो उसके संगीत और ग़ज़लों के लिए उन्हें जगजीत से बेहतर कोई नहीं मिला। जगजीत की संगीत यात्रा में ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ धारावाहिक एक मील का पत्थर साबित हुआ। मिर्ज़ा ग़ालिब जब तैयार होकर दूरदर्शन पर आने लगा तो उसको देखने की एक होड़ सी मच गयी। भारत को लेकर तमाम मुल्क़ों में मिर्ज़ा ग़ालिब को बेहद लोकप्रियता मिली जिसमें पाकिस्तान मुख्य है। राजेश बादल जी अपनी पुस्तक ‘कहाँ तुम चले गए’ में लिखते हैं कि पाकिस्तान में लोगों ने चोरी छुपे छतरियाँ लगाकर दूरदर्शन से प्रसारित होने वाले इस धारावाहिक को देखा। मिर्ज़ा ग़ालिब में संगीत को लेकर जगजीत और गुलज़ार के बीच ख़ूब बहसें होती थीं। ग़ालिब जिस समय में थे वैसे ही साज़ोसमान के साथ गुलज़ार साहब उसका संगीत चाहते थे, जबकि जगजीत उसमें आधुनिक वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल के लिए ज़ोर दे रहे थे। गुलज़ार साहब ये मानते थे कि ग़ालिब शायर थे कोई गवइये नहीं इसलिए उनकी कहन उसी हिसाब से होनी चाहिए। अंततः जगजीत को मानना पड़ा और उन्होंने उसी तरीक़े से सब कुछ बुना और वो इतना लोकप्रिय हुआ कि जब ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ का संगीत एल्बम आ रहा था तब गुलज़ार साहब ने जगजीत को अपना मनचाहा करने की स्वतंत्रता दी मगर जगजीत ने उसमें कुछ भी नहीं बदला। शायद तब तक वो उस बात को समझ चुके थे। जगजीत ने ग़ालिब को जिस तरह गाया है शायद किसी ने उस तरह से उन्हें उनके बाद नहीं गाया या अगर गाया भी तो हमेशा उसकी तुलना जगजीत से की गयी। इस तरह ग़ालिब के लिए गुलज़ार और जगजीत का काम एक मानक बन गया। गुलज़ार ने ये बात एक टी वी कार्यक्रम में कही कि मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल की कामयाबी में दो ही बड़े क़िरदार हैं, जगजीत सिंह और नसीरुद्दीन शाह।

चित्रा जी ने जब गायन को अलविदा कहा उस वक़्त जगजीत के साथ संगीत के सिवा कुछ नहीं बचा था। मुम्बई जैसे शहर में रहना और आजीविका कमाना सरल नहीं था, जब वो स्वयं एक त्रासदी से गुज़र रहे थे। लिहाज़ा उन्हें काम करना ही था, उन्होंने किया भी और इतना डूबकर किया कि उनकी मृत्यु के लगभग चौदह बरसों बाद भी लोग उनको सुनते नहीं थकते। यूट्यूब में जाने कितने चैनल उनके नाम से चल रहे हैं। कितनी उनकी सजीव रिकॉर्डिंग रोज़ आती हैं और ख़ूब सुनी जाती हैं। प्रेमगीत फ़िल्म में उनके मैनेजर रहे कुलदीप जी उनके चाहने वालों के लिए एक चैनल ‘जग्जिटेरियन’ नाम से चला रहे हैं। उसमें वो उनसे जुड़े कुछ अज़ीज़ लोगों से उनके बारे में कुछ अनसुनी बातें सामने लाते हैं। इसी चैनल से एक घटना का ज़िक़्र करना चाहूँगा जो इस्कॉन के स्वामी श्री सूरदास जी ने उनके विषय में बताई। वो पहले भी इस्कॉन से जुड़े रहे थे और कृष्ण भजन के कई एल्बम उनके आ चुके थे। स्वामी जी ने कहा कि “मैंने उनसे एक सजीव भजन का कार्यक्रम करने का अनुरोध किया, पर बात आयी गयी हो गयी। फिर भी वो जब भी मिलते मैं उनसे अपनी बात दोहराता वो सुनकर रह जाते। उन्हें घोड़े पालने का शौक़ था तो एक दिन उन्होंने मुझसे रेसकोर्स आने के लिए निवेदन किया, मैं पहुंच गया। उन्होंने मुझसे कहा कि आप भजन का लाइव प्रोग्राम करने को कह रहे हैं, लोग मुझे ग़ज़ल गायक मानते हैं मुझसे भजन भला कोई क्यों सुनेगा?”

मैंने कहा “नहीं सुनेगा तो इस्कॉन के सभी साधु सुनेंगे, उनसे ही स्थान भर जायेगा, तब उन्होंने कहा ठीक है जन्माष्टमी के दिन करते हैं। इस्कॉन ने इस बात का प्रचार प्रसार किया कि जन्माष्टमी में जगजीत जी लाइव भजन गायेंगे। जिस दिन जन्माष्टमी थी उस दिन जगजीत जब गाने पहुँचे तो इस्कॉन के प्रांगण में तिल धरने को जगह नहीं थी, यहाँ तक कि मंच में भी लोग बैठे मिले। ख़ैर किसी तरह जगजीत के लिए स्थान बनाया गया और जगजीत ने लगभग पूरी रात निरंतर गाया। सुनने वाले अपनी जगह से हिले तक नहीं! ये उनका पहला सजीव भजन का कार्यक्रम था जोकि अविस्मरणीय रहा।

जगजीत की ग़ज़लों और भजनों को संगीतबद्ध करने को लेकर राय बेहद स्पष्ट थी। वो कहते थे ग़ज़ल में मैं आधुनिकतम साज़ोसमान और धुनों का इस्तेमाल करता हूँ, मगर भजन विशुद्ध शास्त्रीय रागों पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ।

फिल्मों में उनकी शुरुआत ‘प्रेमगीत’ फ़िल्म से हुई जिसमें उनकी गायी ग़ज़ल ‘होंठों से छू लो तुम…..बहुत मशहूर हुई जिसे आज भी लोग गुनगुनाते हैं। फिर महेश भट्ट की फ़िल्म ‘अर्थ’ में भी उन्होंने संगीत दिया जिसकी ग़ज़लें ‘तुम इतना क्यों मुस्कुरा रहे हो…., झुकी झुकी सी नज़र…., कोई ये कैसे बताए…. इत्यादि बेहद मक़बूल हुईं और आज भी अनेक गायकों द्वारा निरंतर दोहरायी जाती हैं। फ़िल्म ‘साथ साथ’ में उनकी गायी ग़ज़ल ‘तुमको देखा तो ये ख़याल आया…’,ये तेरा घर ये मेरा घर….’ आज भी सुनते ही एक भावुकता घेर लेती है। जगजीत वहाँ सबसे अलग नज़र आते हैं, जहाँ वो आम आदमी के दर्द और झंझावातों से जुड़ जाते हैं। उनकी आवाज़ में जो सोज़ था वो कम गायकों में सुनने को मिलता है। फिर भी उनकी आवाज़ को जब भी कोई ईश्वर का उपहार कहता तो वो पूरे ज़ोर से कहते “सब कुछ आप ईश्वर पर मत छोड़ा करिए, मुझसे अच्छी क़ुदरती आवाज़ बहुतों की है, अपनी आवाज़ पर मेहनत कीजिये, मन से रियाज़ कीजिये, कहाँ किस लफ़्ज़ पर कितना ज़ोर देना है, कितना ऊँचा गाना है, कब धीमे से सुर में कहना है ये सब कुछ धीरे धीरे आता है। पहले एक राग को साधिए तब दूसरे पर जाइये, सब कुछ ज़ल्दी से नहीं होता, समय लगता है।” संगीत में वो ‘सा’ और ‘ख़रज’ के रियाज़ पर ख़ासा ज़ोर देते थे। वो घंटों एक सुर को साधते थे। कॉन्सर्ट कितना भी थकान भरा क्यों न हो, वो अगली सुबह तानपुरा लेकर रियाज़ के लिए बैठ जाते। उन्होंने तमाम शास्त्रीय बंदिशें बेहद मोहक अंदाज़ से गायी हैं जोकि उनके एल्बम ‘डिफरेंट स्ट्रोक्स’ में संकलित हैं। उन्होंने अपने समय के लगभग सभी मशहूर शायरों को गाया पर उनका रिश्ता निदा फ़ाज़ली साहब से कुछ अलग ही था। उन्होंने उनकी बहुत सारी ग़ज़लें गायी, केवल उनकी लिखी ग़ज़लों पर एक एल्बम निकाला जिसका नाम ‘इनसाइट’ है। फ़िल्मों में भी निदा साहब की ग़ज़लें गायी, जिसमें चर्चित ग़ज़ल ‘होश वालों को ख़बर क्या…..’ शामिल है। इस ग़ज़ल का भी एक किस्सा है। वो अक्सर एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में जाते थे तो उनकी भेंट वहाँ कभी कभार संगीतकार जतिन से हो जाती थी। जब भी वो उनसे टकराते जगजीत उनसे कहते “मेरे लिए कोई गाना बनाओ यार”। जतिन मुस्कुराते हुए कहते “अंकल फ़िल्मों में ग़ज़ल आजकल रहती ही नहीं हैं” इसी तरह बात आयी गयी हो गयी। जब जतिन-ललित फ़िल्म ‘सरफ़रोश’ का संगीत तैयार कर रहे थे, तो उनको एक ग़ज़ल रखने का अवसर मिला और फिर उन्हें जगजीत याद आये। जतिन ने उनको फ़ोन किया कि आइये आपके लिए ग़ज़ल तैयार है, आप ही इसको कंपोज़ करिए। जगजीत हँसते हुए बोले कि नहीं तुम ही कंपोज़ करो वरना वो फिर बिलकुल मेरी लगने लगेगी, फ़िल्म से एकदम अलग। जतिन ने कंपोज़ करने के बाद उनको रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया और रिकॉर्ड की। जगजीत को धुन बेहद पसंद आयी पर वो बोले अब इसे मुझे दे दो, इसमें मैं थोड़ा अपना अंदाज़ मिलाऊँगा। उन्होंने जतिन की धुन पर ही ग़ज़ल अपने अंदाज़ में गायी जोकि आज तक लोगों की ज़बान पर है। लगभग हर लाइव कॉन्सर्ट में लोग उस ग़ज़ल की फ़रमाइश करते हैं।

चित्रा जी के संगीत छोड़ देने के बाद उनके सोलो एल्बम ही आये जिनमें इनसाइट, इंसर्च, विज़न्स दो भाग में, एनकोर, सिलसिले, सोज़, कोई बात चले,  इंतेहा, संवेदना, फॉरगेट मी नॉट, फेस टू फेस, लव इज़ ब्लाइंड, लाइव विद जगजीत सिंह, सहर, सजदा, यूनीक आदि प्रमुख हैं। ‘द मास्टर एंड हिज मैजिक’ उनकी मृत्यु के बाद आया इसमें उनकी उन ग़ज़लों का संकलन था, जो लोगों के सामने नहीं आ सकीं थीं।

जगजीत के भजन एल्बम भी ख़ासे लोकप्रिय हुए। उनके द्वारा गाया और संगीतबद्ध किया गया भजन ‘हे राम’ बेहद लोकप्रिय हुआ और उसके लाखों कैसेट बिके। एक स्कूल में जब उनको बुलाया गया तो वहाँ के संस्थापक ने बताया कि आपका ये भजन हमारी रोज़ की प्रार्थना में गाया जाता है। उन्होंने सभी धर्म, पंथों के भजन गाए जिसमें शबद गुरुवाणी, यीशु के लिए करुणा, साईं भजन, माँ दुर्गा के लिए माँ, कबीर, मुख्य हैं। कृष्ण और राम भजन तो उन्होंने प्रमुखता से गाए ही जिनके कई एल्बम हैं।

फ़िल्में उन्हें इतनी नहीं मिलीं, लेकिन जिस फ़िल्म में भी उन्होंने गाया वो गीत अमर हो गया। नई फिल्मों की बात करें तो उन्होंने लीला, जॉगर्स पार्क, तुम बिन, दुश्मन, तरक़ीब, सरफ़रोश में ग़ज़लें या गीत गाये जोकि सभी हिट हुए और आज भी उसी शिद्दत से सुने जाते हैं। जगजीत ने फ़िल्म अविष्कार में ‘बाबुल मोरा नैहर…..’ जैसी प्रसिद्ध ठुमरी को अपने अंदाज में बेहद ख़ूबसूरती से गाया जिसे कभी के एल सहगल साहब ने गाया था। जगजीत संगीत में प्रयोगों से कभी नहीं हिचकिचाए, उन्हें जो मुफ़ीद लगा उन्होंने किया और शायद इसीलिए उनका काम आज भी नया लगता है। ‘तेरे ख़त’ और ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी’ जैसी नज़्में इसकी गवाह हैं। दोनों ही कम्पोजीशन में एक आरोह है, जो धीरे धीरे ऊपर जाता है। उनकी भारी आवाज़ में गहरे सागर जैसा ठहराव और निस्तब्धता थी। कभी कभी उनकी आवाज़ से एक हूक सी उठती थी, जिसे सुनकर अक्सर उनके कॉन्सर्ट में लोग रोने लगते थे। मिट्टी दा बावा….. जब वो गाते थे तो तालियाँ थम जातीं, लोग आँसू पोंछते नज़र आते। प्रसिद्ध पंजाबी शायर वारिस शाह की लिखी ‘हीर’ जब वो गाते थे तो उनके साथ बजाने वाले साजिंदे तक रो पड़ते थे। ऐसे ही उन्होंने प्रसिद्ध पंजाबी कवि शिवकुमार बटालवी की कुछ कविताएँ गायी, जिनमें इतनी शिद्दत से उकेरी उनकी करुण पुकार सुनायी देती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी की कुछ कविताएँ उन्होंने गायी, जिसे ‘संवेदना’ नाम से कैसेट और सीडी की शक़्ल में निकाला गया जोकि ख़ूब सराही गयी। उसमें ‘झुकी न अलकें…..और दूर कहीं कोई रोता है…..में अद्भुत कारुण्य है। एक साक्षात्कार में पूछे जाने पर उन्होंने कहा “डेप्थ दुःख में ही है, ख़ुशी में नहीं….हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं…।”

जब शुरुआत में वो एक लंबा अलाप लेते, उनकी आवाज़ खुले आसमान में उड़ते परिंदे की तरह पंख पसारकर उड़ती, जैसे कोई सुरीलेपन से अज़ान देता हो, जो दूर तक पहुंचकर अपनी अनुगूँज में लौट आती है। वो अज़ान के नोट्स कई बार ग़ज़ल गाते हुए गाने लगते जोकि बेहद मुश्किल होते हैं। उनकी आवाज़ में जितना दर्द था उतनी ही रूमानियत और सुकून भी। बहुत सी उनकी ग़ज़लें लोग सोते समय सुनते हैं, जिससे उनको शांति और क़याम मिले, जिसमें से एक मुझे याद पड़ती है क़तील शिफ़ाई की लिखी ‘परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ……’

गायिकी के सफ़र में एक मक़ाम ऐसा आया जब उनका मन स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी के साथ काम करने का हुआ। लता जी तक संदेशा पहुँचा पर उन्होंने शायद बहुत रुचि नहीं दिखायी। कारण जो भी रहा हो मगर एक समय के बाद वो तैयार हो गयीं। उस एल्बम में वो एक संगीत निर्देशक के तौर पर ही काम करना चाहते थे, मगर लता जी ने उनसे साथ गाने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकारा। उसका नाम भी लता जी ने ही रखा ‘सजदा’। ‘सजदा’ एक गुलदस्ता है ख़ूबसूरत ग़ज़लों का जोकि ख़ूब चर्चित हुआ और सुना गया। सजदा की ग़ज़लों में दूर से आती एक गुमनाम पुकार सुनायी देती है, जिसे इस क़दर उकेरा गया है कि उसको तलाशते कोई बहुत दूर निकल जाता है। उनमें कहीं दूर तक बिखरा रेतीला सन्नाटा, भटकाव है, तो कहीं किसी ग़मज़दा आशिक़ की गूँजती आवाज़। दर्द से मेरा दामन भर दे…, धुआँ बनाके फ़िज़ा में……., तुझसे मिलने की सज़ा देंगे तेरे शहर के लोग…, हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी……., मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारों….., सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो…….आदि ऐसी ग़ज़लें हैं जिन्हें सुनने के बाद भुलाना मुश्किल है।

बहुत से संगीत जगत के लोग कहते हैं कि जगजीत बहुत ऊंचे सुर नहीं गाते थे या उनकी रेंज कम थी, ऐसा नहीं लगता। हाँ वो बेवज़ह ऊँचा नहीं गाते थे। ग़ज़ल वैसे भी बहुत ऊँचा गाने वाली शय नहीं है। वो जब सजीव कार्यक्रम में गाते थे तो बहुत ऊँचे अलाप लेते थे। उनकी वज़नी आवाज़ हर सिम्त उड़ान भरती थी, हवा के किसी झोंके की तरह जो उसी परवाज़ में सुनने वालों को कई जहानों की सैर कराती।

 गायक और कम्पोज़र के साथ ही वो एक बेहतरीन म्यूजिक अरेंजर भी थे। तलत अज़ीज़ कहते हैं “वो गाना या ग़ज़ल तैयार करने के बाद अपने साजिंदों को उनके संगीत नोटेशन लिखकर दिया करते थे कि उन्हें गीत के अंतराल में ये बजाना है। आज किसको इतना पता और फ़िक़्र है। उनकी उर्दू भी लाज़वाब थी तलत अज़ीज़ के एल्बम को उन्होंने अपना नाम दिया था, जिसमें लिखा था ‘जगजीत सिंह प्रेजेंट्स तलत अज़ीज़’। ऐसा उन्होंने तमाम उभरते गायकों के लिए किया।

उन्होंने कुछ धारावाहिकों के टाइटल गीत गाए जैसे ‘सैलाब’ का ‘अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं……’ ‘नीम का पेड़’ का ‘मुँह की बात सुने हर कोई..’ हेलो ज़िंदगी का ‘ हेलो ज़िंदगी ज़िन्दगी नूर है..इत्यादि जिन्हें लोग आज भी गुनगुनाते हैं। उनकी बनायी धुनें सादा और लोगों के दिलों में सीधे असर करने वाली होती थीं। वो पेचीदगी में विश्वास नहीं रखते थे, जिनमें सुननेवाला उलझकर रह जाए। कम संगीत जानने वाले भी गुनगुना सकें ऐसी उनकी कोशिश रहती थी, इसीलिए उनको सुननेवाले हर वर्ग के लोग थे। उनके चाहने वाले दुनिया के कोने-कोने में थे। वो कहते भी थे “मैं जहाँ जाता हूँ मुझे सुननेवाले वो लोग होते हैं, जिन्होंने बरसों पहले अपना देश छोड़ दिया किसी वज़ह से और आज वो अपने देश की यादों को सीने से लगाए बैठे हैं। बहुत याद करते हैं!” वो अपने समकालीन ग़ज़ल गायकों से कहीं ज़्यादा सफल थे। शेखर सुमन ने अपने टी वी शो में उनसे जब चुहल करते हुए कहा “ग़ज़ल का धंधा मंदा चल रहा है…” तो उन्होंने तपाक से कहा “मेरा तो नहीं है, औरों का नहीं कह सकता!”

इन तमाम बातों, यादों और ग़ज़ल गायिकी को लेकर उन्होंने जो मक़ाम हासिल किया, उनका व्यक्तिगत जीवन त्रासदियों से भरा रहा। जगजीत अपने जीवन में या तो संघर्ष करते रहे या आपदाओं से जूझते रहे। उनकी अपनी ख़ुशी शायद केवल उनका संगीत ही था, जिसने उन्हें सत्तर बरस ज़िंदा रखा। उनके पिता ने सिख धर्म अपनाया था और उन्होंने ही उनको संगीत की शिक्षा दिलवायी गुरुवाणी, शबद गाने के लिए। बचपन में उनके एक गुरु ने उनका नाम रखते हुए कहा था कि ये जग को जीतेगा। वो बीच में ही पढ़ाई छोड़कर बिना किसी को बताए मुम्बई आ गए थे, जिससे वो अपने परिवार से कुछ समय के लिए पूरी तरह कट गए। उनके पिता को इस बात का गहरा सदमा लगा। फिर जब उन्होंने संगीत के लिए अपने बाल कटवाए तो उनके पिता फूट-फूट कर रोये, लेकिन उनकी माँ ने उनका दृढ़तापूर्वक साथ दिया। विवाह के विषय में जब उनके परिवार तक ख़बर पहुँची कि उन्होंने एक तलाक़शुदा बंगाली महिला से विवाह किया है तो उनके पिता को कतई रास नहीं आया। उनके छोटे भाई उनके बेहद क़रीब थे, जिनसे उनकी बातें होती थीं और उसी मार्फ़त उनके घर तक ये सूचनाएँ पहुँचती थीं। ख़ैर एक लंबे अरसे बाद जब उनके पुत्र ने जन्म लिया और थोड़ा बड़ा हुआ तो जगजीत सपरिवार अपने माता पिता से मिलने गए। अपने पोते को देखकर उनके पिता सब कुछ भूल गए और खुले दिल से सबको गले लगा लिया। पोता अपने बाबा से इतना घुलमिल गया कि वो उन्हें छोड़ता ही न था। मुम्बई से भी वो उनसे लगभग रोज़ बात करता।

‘सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला…..’

किसे मालूम था कि जिसने सबको मिलाया वही इतनी ज़ल्दी सबसे बिछड़ जायेगा। जगजीत के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी उनके बेटे ‘विवेक’ का बीस बरस की उम्र में एक सड़क दुर्घटना में गुज़र जाना रहा। वो इतना प्रेम करते थे उससे कि जब तक किसी ग़ज़ल की धुन को वो हाँ नहीं कहता था वो उसे अंतिम रूप नहीं देते थे। जिस रात घटना घटी वो एक प्राइवेट कार्यक्रम में गए थे मेहमान के तौर पर, मगर वहाँ कुछ सिने जगत के लोगों ने उनसे ‘दर्द से मेरा दामन भर दे….गाने की फ़रमाइश कर दी। उनका बिलकुल मन ना था मगर घोषणा होने के बाद उन्हें गाना पड़ा। वो मन से नहीं गा पा रहे थे शायद उन्हें उस आनेवाले हादसे  की भनक मिल रही थी। जब वो देर रात घर पहुँचे तो उन्हें फ़ोन पर सूचना मिली। जगजीत जड़ हो गए जैसे प्राणहीन हो गए हों। बेटे के निधन के बाद जगजीत के घर में महीनों सन्नाटा पसरा रहा। कोई किसी से बोलता न था। एक अघोषित मौन जिससे रह रह कर अंतस को मथ देने वाला रुदन फूट पड़ता था। एक अरसा लगा उन्हें विवश होकर काम में लौटने में, चित्रा ने उसके बाद भूलकर भी संगीत की ओर नहीं देखा। कैसे देखतीं भला! जगजीत कभी कभी कह उठते थे कि सचमुच ऊपरवाले ने मेरी पुकार उस दिन सुन ली, मेरा दामन दर्द से भर दिया।

उनकी बेटी मोनिका अपने छोटे भाई से बेहद प्यार करती थी। मीडिया ने जिस तरह उस घटना को छापा कि उस समय विवेक शराब के नशे में गाड़ी चला रहा था। इससे आहत होकर उसने उसको निर्दोष साबित करने की लंबी लड़ाई लड़ी और अंततः निर्णय उसके पक्ष में आया। मीडिया को भी अपनी गलती माननी पड़ी।

जगजीत के दुःख यहीं ख़त्म नहीं हुए। आज से लगभग पंद्रह बरस पहले उनकी बेटी मोनिका ने निजी जीवन की उठापटक के मध्य ख़ुदकुशी कर ली। तब वो किसी कॉन्सर्ट के लिए अमेरिका गए थे। मोनिका, चित्रा और उनके पूर्व पति देबू की बेटी थी, लेकिन वो उससे वैसा ही प्यार करते थे जैसे एक बाप अपनी बेटी से करता है। उसके कुछ ही बरसों बाद उनका भी निधन हो गया।

अपने सत्तरवें जन्मदिन के वर्ष में उन्होंने सत्तर कॉन्सर्ट तय किये थे और वो उसके कहीं मध्य में थे जब एक रात उनका सर फट रहा था। चित्रा जी से बताया तो उन्होंने डॉक्टर बुलाने की बात की पर वो नहीं माने। उसके थोड़ी ही देर बाद वो अचेत हो गए। 10 अक्टूबर 2011 को उन्होंने लीलावती अस्पताल में आख़िरी साँस ली।

उन्हें जीवन से जो कुछ भी मिला उससे कोई भी व्यक्ति पूरी तरह टूटकर बिखर सकता है। आस्तिक, नास्तिक हो सकता है लेकिन उसके लिए उन्होंने ईश्वर को भी कभी कोसा हो, उनके जीवन को देखते पढ़ते सुनते ऐसा कभी नहीं लगा। वो अपना दर्द बाँटते हुए कम से कम सार्वजनिक जीवन में उनसे जुड़े लोगों की बातें सुनते, उनको सुनते, कहीं नहीं दिखे। साक्षात्कारों में महज़ संगीत या ग़ज़ल की बात, बहुत कोई ख़ास हुआ तो बचपन का कोई किस्सा सुना दिया या चित्रा जी से मुलाक़ात की बात बता दी वो भी बेहद कम लफ़्ज़ों में। उन्हें जो कुछ जीवन से मिला उसके बरक़्स उन्होंने हर संघर्ष करने वाले के लिए, ज़रूरतमंदों के लिए खुले दिल से लुटाया। वो अपने संघर्ष के दिनों की पीड़ा समझते थे इसलिए हर नए गानेवाले का भरपूर साथ देते। चित्रा उनकी मृत्यु के बाद आये एल्बम में कहती हैं “वो कहते थे जो मेरा है ही नहीं उसे देने में क्या हर्ज़ है…” कुछ घटनाएँ इस बात की बानगी हैं।

उनके ड्राइवर का एक मित्र उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसको बैठाया और पूछा। उसने कहा “साहब बिटिया की शादी करनी है, आप मेरे शहर में एक कार्यक्रम कर देते तो कुछ पैसे बच जाते जिससे मेरी मदद हो जाती। उन्होंने कहा ठीक है बताता हूँ। कुछ दिनों बाद उन्होंने उसको बुलाया और कहा “कितने रुपए बच जायेंगे?”। उसने ज़वाब दिया, वो थोड़ी देर चुप रहे फिर भीतर गए। वापस लौटे तो बोले “भाई मैंने अभी देखा उस दिन मेरा एक अलग प्रोग्राम है इसलिए न कर सकूँगा, बिटिया के लिए ये मिठाई मेरी तरफ़ से, माफ़ करना”। वो व्यक्ति निराश लौट गया मगर घर जाकर जब उसने डब्बा खोला उसमें ढेर सारे नोट भरे थे। उसने ड्राइवर से बताया तो ड्राइवर उनके पास गया। उन्होंने कहा “वो जिस शहर में कार्यक्रम कराना चाहता था वहाँ उसको इतने पैसे नहीं बचते। इस तरह की न जाने कितनी बातें हैं जो दबी रह गयीं, ये उनके ड्राइवर से जुड़ी थी तो सामने आ सकी। उनके निकट जो भी ज़रूरतमंद होता था उसको वो याद कर लेते थे, फिर कोई एक दिन निश्चित करके चुपचाप सबको लिफ़ाफ़े बाँट आते थे। एक बार वो एक रेस्तराँ में खाना खाने गए। किसी कार्यवश उधर गए थे तो निकट देखकर उसमें घुस गए। रेस्तराँ का मालिक निहाल हो गया, बड़ी आवभगत की और उसका खाना भी उनको बहुत पसंद आया। फिर वो अक्सर वहाँ जाने लगे, उसके मालिक से अच्छी मित्रता हो गयी। एक दिन उन्हें लगा कि इतना अच्छा खाना देने के बाद भी लोग वहाँ कम जाते थे, उसके बारे में लोगों को शायद इतना मालूम न था। उन्होंने उसके मालिक से कहा कि रुको यहाँ प्रोग्राम करते हैं और मीडिया वालों को भी ख़बर कर देते हैं कि प्रोग्राम को कवर करे। मालिक संकोच में पड़ गया शायद उनके जैसे कलाकार की वो फीस नहीं चुका सकता था। उन्होंने कहा कोई चिंता मत करो सब हो जायेगा। उनके गाते गाते ही लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया। इसके बाद से उसका रेस्तराँ चल निकला।

लल्लनटॉप में श्री राकेश बादल जी जिन्होंने जगजीत पर पुस्तक लिखी है ‘कहाँ तुम चले गए’ सौरभ द्विवेदी को दिए साक्षात्कार में कहते हैं “सौरभ! यूँ ही नहीं बन जाता कोई जगजीत। एक समय था जब वो लता जी, रफ़ी साहब के गाने गाकर सिक्के बटोरा करते थे, उन्हीं लता जी ने उनके संगीत निर्देशन में कई गाने गाए। रफ़ी साहब ने भी एक गीत गाया हालांकि वो फ़िल्म नहीं आयी लेकिन फिर भी कितने लोगों को अपनी ज़िंदगी में ऐसा मक़ाम मिल पाता है?

उन्हें सरकार ने पद्मश्री और पद्मविभूषण सम्मान से नवाज़ा। उन्होंने संसद के सेंट्रल हॉल में 1857 की क्रांति के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 10 मई 2007 को बहादुर शाह जफर की मशहूर ग़ज़ल ‘लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में’ प्रस्तुत की जो अपनेआप में एक बड़ा सम्मान है।

जीवन कुछ लोगों के लिए बहुत बड़ा हो जाता है और कुछ के लिए शायद उतना ही छोटा, जितने में हमारी पलकें खुलकर झपक जाती हैं। हम जान नहीं पाते और उम्र बीत जाती है पर ये बात सोचने की है कि अगर आपके जीवन की सबसे अनमोल चीज़ जो आपका ही एक हिस्सा है छिन जाए तो भला जीवन किस तरह जीया जायेगा! हर एक क्षण सदियों जितना भारी और बोझिल। जगजीत ने उसी जीवन के सत्तर बरस जीये बल्कि जीये ही नहीं कितना कुछ छोड़ गए, जो आज भी लोगों के सूनेपन का सहारा है। वो आवाज़ एक मरहम सी लगती है पर जिस सीने से वो निकलती थी उसमें ज़ख़्म ही ज़ख़्म थे। दर्द किस तरह जीने की वज़ह हो सकता है जगजीत का जीवन उसकी जीती जागती दास्ताँ है। अपने बेटे की याद में उनके एल्बम ‘समवन समव्हेयर’ की एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ

देखा तो मेरा साया भी मुझसे जुदा मिला

सोचा तो हर किसी से मेरा सिलसिला मिला

(शायर- अयाज़ झांसवी)

उनकी ज़िंदगी के लिये कितनी सटीक लगती हैं।

***मैनेजर

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