अनुनाद

और इधर एक स्त्री यादों में खोई गाती रहती है ‘कलकतवा से मोर बलमू अइलें हो राम’/ चन्‍दन कुमार की कविताएं

चन्‍दन कुमार की कविताएं अटपटे सामाजिक बंधनों, दुर्व्‍यवस्‍थाओं और खोखलेपन से लिथड़े  समाज के प्रति अन्‍तर्मन की छटपटाहट को व्‍यक्‍त करती हैं। उत्‍तरआधुनिक हो चले समय में बार-बार प्रकृति और लोक संस्‍कृति की ओर लौटने का निवेदित स्‍वर भी यहां दिखाई देता है। अनुनाद पर चन्‍दन … की कविताओं के प्रकाशन का यह प्रथम अवसर है, उनका यहां स्‍वागत है ।

अनुनाद  

 

तुम नहीं चुन सकते

 

यदि तुमसे कहा जाए 

तुम समानता, स्वतंत्रता, बंधुता को चुनो

तो तुम नहीं चुन सकते इन मूल्यों को

तुम समरसता को चुनोगे

 

श्रेष्ठता बोध की बीमारी से ग्रस्त

तुम नहीं छोड़ना चाहते हो बहुत कुछ

बहुत लोगों के लिए

 

अप्राकृतिक नियम बनाने वाले 

भाषा में बकैती करते हैं

और पढ़ाते हैं दुनिया को कर्तव्यों का पाठ

 

यदि तुमसे कहा जाय

तुम प्रेम को चुनो

तो तुम नहीं चुन सकते प्रेम

द्वेष – घृणा में लिपटे

तुम हमेशा नफरत को चुनोगे

 

नफरत के दम पर ही 

तुमने महानता का महल तैयार किया है

भावनाओं से खेलने वाले 

खेलते हो दूसरों की गरीबी से

भुखमरी, बेरोजगारी और लाचारी से

 

दुःख तुम्हारे शब्दकोश से बाहर है

किसी के रोने – कलपने से तुम्हें क्या

कीड़े समझते हो तुम लोगों को

और रगड़ते हो जूते की नोंक से

 

किसी का प्रेम करना 

तुम्हें तनिक भी नहीं सुहाता

तुम्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता 

जो तुम्हारी जाति के बाहर होता है

 

मानवता का संदेश देने वाले

अमानवीय दुनिया के मालिक

तुम क्यों चाहते हो सारी दुनिया

तुम्हारे इशारे पर नाचे?

 

जाति के रखवाले

जाति टूटेगी तो टूटेगी तुम्हारी श्रेष्ठता

जाति टूटेगी तो टूटेगी तुम्हारी नफरत

जाति का टूटना उन सारी चीजों का टूटना है

जिससे बचाया जा सकता है एक जीवन

बचाया जा सकता है प्रेम

बचाई जा सकती है मानवता।

***

 

 नैतिक पतन

 

जो चाहते हैं बनी रहे 

उनकी श्रेष्ठता

वे भाषा में नैतिक पतन के शिकार होते हैं

 

वे दिखने में सभ्य – साधारण दिखेंगे

लेकिन ज़ुबान खोलते ही 

उनकी हिंसक जीभ लपलपाने लगती है

किसी मज़लूम की छाती पर बैठकर खू़न चूसने के लिए

 

वे हमेशा से मौजूद रहे हैं इस धरती पर

उनके द्वारा फूलों को रौंदना 

उनके जैविक खेलों में शामिल है

वे जो सबके होने की बात करते हैं

वे किसी के नहीं होते

 

उनके यहां न्याय, समानता 

महज़ खोखले शब्द हैं

उनकी संरचना अन्यायी रही है

वे अन्याय में संलिप्त 

नैतिकता की ओट लेकर छिपते रहते हैं

 

उनके विषदंत इतने जहरीले होते हैं कि

प्यार से हंस भी दें तो

उनकी कुटिल मुस्कान

विष बनकर कलेजे के पार चली जाती है

 

वे जो आततायी थे, आततायी हैं

आततायी बने रहना चाहते हैं

वे दुनिया के तमाम संसाधनों पर

अवैध कब्ज़ा करके बैठे हुए लोग हैं

 

उनके शब्दकोश में श्रम शब्द है ही नहीं 

भाषिक बकैती उनके वैश्विक धरोहरों में शामिल है

लठैती से उनका पुराना नाता है

अब जब दुनिया उत्तर आधुनिक हो रही है तो

वे पशुवत जीवन की तरफ लौट जाना चाहते हैं

 

आगे की तरफ बढ़ती दुनिया

पीछे नहीं लौटना चाहती

तुम लाख कोशिश कर लो

अंततः तुम्हें मनुष्यता के रास्ते पर ही चलना होगा।

***

 

अब तो जाना ही होगा

 

जब आम में बौर आए हों

पेड़ों पर नई कोपलें दस्तक दे रही हों

चिड़ियों का कलरव तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता

इसके बाद भी तुम्हें जाना होगा दोस्त!

 

तुम्हें जाना होगा

क्योंकि आगे बढ़ते रहना ही ज़िंदगी है

 

तुम्हें जाना होगा

अंतिम कक्षा पास करने के बाद

छोड़ने होंगे क़रीबी दोस्त

छोड़नी पड़ेगी हंसी – ठिठोली

एक अनकही पीड़ा भीतर लिए

तुम्हें जाना होगा दोस्त!

 

तुम्हें जाना होगा

अगली सुबह पूंजी के हाथों बिक जाने के लिए

ताकि भूखमरी की मार से बचाया जा सके बचपन

 

जीवन की नई चुनौतियां

तुम्हारा इंतिज़ार कर रही हैं मुंह बाए

किसी अंधेरी कोठरी में धकेलने के लिए

जहां से निकलकर स्मृतियों में जाना

शायद नामुमकिन होगा

 

इसके बाद भी तुम्हें जाना होगा

तुम्हें जाना होगा दोस्त! 

ताकि तुम और आगे पढ़ सको, लड़ सको

दुनिया को बदल सको।

***

 

 लोकगीत

 

बहुत दूर…

रात के अंधियारे में 

ढोलक की थाप पर 

कोई धुन टकरा रही है कानों से

शायद कोई परिचित आवाज है

 

ये आवाज़ें सदियों से सुनाई दे रही हैं

मैं उन आवाज़ों तक 

पहुंचना चाहता हूं

उन्हें छू लेना चाहता हूं

 

कहते हैं लोकधुनें अचानक निर्मित नहीं होतीं 

उनमें बसी होती हैं जीवन की अनंत कथाएं

हरवाही से लेकर चरवाही तक

जंतसार से लेकर रोपनी तक का जीवन

गूंथा होता है इन गीतों में

 

बारिश के महीने में झींगुर की आवाज़ 

कठफोड़वा का अनथक गान

गौरैया की चहचआहट

मेंढक की टर्राहट

पत्तों का सिहरन

उँख की सरसराहट

ओस की टपकन

सब कुछ शामिल होते हैं एक लोकगीत में

 

कोयल की कूंक जब फगुनहट में

आधी रात कूकंती है तो

दूर बैठी विरहनी को पिया की याद दिला जाती है

रात के दो बजे हैं

और लोकगीत का एक टुकड़ा 

बार – बार याद आने पर

दिल में हूक – सी उठने लगी है

 

किसी अजानी चोट की पीड़ा

सीने में उभर रही है…

 

रात के तीसरे पहर 

जंतसार गाती एक स्त्री

आज भी यादों में कौंध जाती है

और उसकी वह दुबली – पतली – सी काया

जिसे वह एक साड़ी में लपेटे रहती

जिसमें दुनिया की तमाम शक्ति को समेटे

वह दुपहरिया – तिजहरिया खटती रही है

उसकी टोह लेने वाला 

न तो कोई तब था और न ही अब है

 

चाकी के पाटों के बीच से निकलती

एक मद्धिम लय 

जीवन की एक त्रासद दुनिया की तरफ खींच ले जाती थी

 

परदेस में बसे पति की याद 

और मिलन की आस से बंधी लय में 

एक नई सुबह का अंदेशा भर होता था

 

वर्चस्व के ख़िलाफ़ प्रतिरोध

पुरखिनें रचती रही हैं

आज उन गीतों का सुध लेने वाला कोई नहीं है

जिनसे पुरखिनों की लड़ाई को जाना जा सके

और उसकी गतिकी को आगे बढ़ाया जा सके

 

भूख, गरीबी, में दम तोड़ती जिंदगियां

सभ्यता के मुहाने पर पहुंचने से पहले

भेज दी जाती हैं किसी प्रदेश में

खाने – कमाने के लिए

जहां से निकलने में

पूरी की पूरी उम्र बीत जाती है

और इधर एक स्त्री यादों में खोई गाती रहती है

‘कलकतवा से मोर बलमू अइलें हो राम’ 

*** 

परिचय : चन्दन कुमार ( असिस्टेंट प्रोफेसर – हिंदी )

गांधी शताब्दी स्मारक पी. जी. कॉलेज कोयलसा,
आजमगढ़
कथादेश, जलवायु, समयांतर, अदहन पत्रिकाओं में कविताएं एवं अपनी माटी, समय संज्ञान, शोधमाला पत्रिकाओं में शोध आलेख प्रकाशित।
संपर्क :  chandan032014@gmail.com

 

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