
कुछ कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से हमारे जीवन में प्रवेश करते हैं और धीरे-धीरे उनकी कविताओं के साथ उनका व्यक्तित्व भी हमारी चेतना का हिस्सा बन जाता है। ऋतुराज मेरे लिए ऐसे ही कवि थे। उनसे मेरा संबंध लगभग साढ़े चार दशक पुराना था। इस लंबे समय में मैंने उनकी कविता को पढ़ा, उस पर विचार किया और उनके साथ बातचीत, यात्राओं तथा निजी मुलाक़ातों के अनेक अवसर पाए। समय के साथ हमारे बीच परिचय से आत्मीयता तक का जो संबंध बना, उसमें साहित्य की साझेदारी के साथ जीवन के अनुभवों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। आज उन्हें याद करते हुए केवल एक वरिष्ठ कवि के अवदान का मूल्यांकन करना पर्याप्त नहीं लगता। उनके साथ बिताए समय, उनकी सहज उपस्थिति और उनकी कविताओं में लगातार सक्रिय रहने वाली बेचैनी को एक साथ याद करना अधिक ज़रूरी लगता है।
ऋतुराज से मेरा पहला संपर्क 1981 में हुआ था। उन दिनों मैं विदिशा से निकलने वाली अनियतकालीन पत्रिका ‘धरती’ का संपादन कर रहा था। पत्रिका का समकालीन जनकविता विशेषांक तैयार किया था। मैंने उसकी एक प्रति ऋतुराज को बूंदी के पते पर भेजी। उस समय उनसे मेरा कोई प्रत्यक्ष परिचय नहीं था। पत्रिका भेजने के बाद किसी प्रतिक्रिया या उत्तर की प्रतीक्षा स्वाभाविक थी, लेकिन तत्काल कोई उत्तर नहीं मिला। फिर भी साहित्यिक संपर्कों का अपना एक अलग समय होता है। कभी-कभी कोई छोटी-सी पहल तत्काल संवाद नहीं बनाती, लेकिन वह कहीं भीतर दर्ज हो जाती है। बाद में जब उनसे मिलना हुआ, तब यह अनुभव हुआ कि ‘धरती’ के कुछ अंक और उनमें उठाए गए सवाल उनकी स्मृति में बने हुए थे।
इसके कुछ वर्षों बाद मेरा स्थानांतरण कोटा हुआ। कोटा आने के बाद एक दिन मैं उनसे मिलने बूंदी गया। यह मुलाक़ात मेरे लिए महत्त्वपूर्ण थी। ऋतुराज से मिलकर ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी स्थापित कवि से औपचारिक भेंट करने आया हूँ। उनमें एक सहज आत्मीयता थी। बातचीत में साहित्य, कविता, आसपास के जीवन और उन स्थितियों की चर्चा हुई जिनसे हमारा लेखन बनता है। उनके व्यक्तित्व में एक ओर अपने समय को समझने की बेचैनी थी, दूसरी ओर जीवन के सामान्य अनुभवों के प्रति खुलापन। वे अपने कवि होने को किसी विशेष दूरी या आभामंडल में बदलने वाले व्यक्ति नहीं थे।
बूंदी का अपना परिवेश है। वहाँ का इतिहास, पहाड़ियाँ, महल, झीलें और उनके आसपास फैला प्राकृतिक संसार मनुष्य को ठहरकर देखने के लिए प्रेरित करता है। ऋतुराज के साथ वहाँ घूमते हुए मुझे उनके भीतर के उस मनुष्य को समझने का अवसर मिला जो केवल पुस्तकों और वैचारिक बहसों में नहीं रहता था। रास्तों पर चलते हुए, किसी दृश्य के सामने रुकते हुए या आसपास के जीवन की चर्चा करते हुए उनके व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष खुलता था। साहित्य पर बातचीत हमारे बीच सहज रूप से होती थी, लेकिन हर बातचीत का उद्देश्य किसी निष्कर्ष पर पहुँचना नहीं होता था। कई बार साथ चलना और आसपास के संसार को देखना ही पर्याप्त होता था।
ऋतुराज का कविता-संसार भी इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है। उनकी कविता को केवल प्रगतिशील या वामपंथी कविता कहकर उसकी विशेषताओं को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट थी, लेकिन वे विचार को कविता के ऊपर आरोपित नहीं करते थे। उनके यहाँ सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक अंतर्विरोध, प्रकृति और निजी जीवन के अनुभव एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। वे मनुष्य को किसी एक पहचान में सीमित करके नहीं देखते थे। उनकी कविता में सत्ता और व्यवस्था के प्रति असहमति है, बौद्धिक पाखंड पर व्यंग्य है, ग्रामीण जीवन की गंध है और निजी संबंधों के भीतर प्रवेश करती असुरक्षा भी है।
उनके संग्रह ‘हम उत्तर मुक्तिबोध हैं’ की कविताएँ पढ़ते हुए उनकी वैचारिक बेचैनी का एक महत्त्वपूर्ण रूप सामने आता है। मुक्तिबोध की परंपरा का उल्लेख यहाँ केवल साहित्यिक प्रभाव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मालोचन और सामाजिक विवेक की चुनौती के रूप में भी किया जा सकता है। ऋतुराज की कविता अपने समय की विसंगतियों को पहचानती है, लेकिन वह आलोचना की सुविधा केवल दूसरों के लिए सुरक्षित नहीं रखती। वह अपने वैचारिक संसार और उससे जुड़े लोगों के आचरण को भी प्रश्नांकित करती है। यही विशेषता उन्हें उन कवियों से अलग करती है, जिनके लिए प्रतिबद्धता प्रायः एक घोषित पहचान बनकर रह जाती है।
इस संदर्भ में उनकी कविता ‘अगन गीत’ मुझे विशेष रूप से याद आती है। वामपंथ के खंडहरों को देखने जाने से शुरू होने वाली यह कविता राजनीतिक पराजय, मोहभंग और आत्मपरीक्षण का ऐसा संसार रचती है, जिसमें अतीत की आकांक्षाएँ वर्तमान की विफलताओं से टकराती हैं। खंडहर यहाँ किसी विचारधारा के समाप्त हो जाने का सरल संकेत नहीं हैं। वे उन सपनों के अवशेष भी हैं जिन्हें कभी सामूहिक संघर्षों ने जन्म दिया था। कविता में सूखी घास, हवा का रीतापन और इतिहास में विस्मृत हो जाने की कसक जैसे बिंब राजनीतिक क्षरण को ठोस अनुभव में बदल देते हैं।
इस कविता का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उसका आत्मालोचन है। कवि केवल यह नहीं पूछता कि वामपंथी राजनीति अपने उद्देश्यों से दूर क्यों हुई; वह अपनी भूमिका पर भी सवाल उठाता है। ‘मैंने ही क्या किया’ जैसी आत्मस्वीकृति कविता को महज राजनीतिक आरोप-पत्र बनने से बचाती है। इसमें स्वीकार किया गया है कि किसी विचारधारा का संकट केवल विरोधियों की ताकत से नहीं पैदा होता। उसके भीतर सक्रिय लोगों की निष्क्रियता, आत्मरक्षा, निजी लाभ और समझौते भी उस संकट को गहरा करते हैं। यह स्वीकार करना आसान नहीं होता, विशेषकर तब जब व्यक्ति स्वयं को किसी परिवर्तनकारी विचार का प्रतिनिधि मानता हो।
ऋतुराज की कविता में मंत्री का हालचाल पूछ लेना, किसी समिति में नाम शामिल हो जाना या किसी सम्मान के कारण अख़बार में जगह मिल जाना मामूली घटनाएँ नहीं रह जातीं। इन छोटे प्रसंगों में वे उस प्रक्रिया को पहचानते हैं, जिसमें जनसंघर्षों से जुड़ी प्रतिबद्धता धीरे-धीरे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सुविधा के आगे कमज़ोर पड़ने लगती है। आंदोलन के उद्देश्य पीछे छूट जाते हैं और उसके साथ जुड़ी पहचान अपने आप में उपलब्धि समझी जाने लगती है। ऋतुराज की आलोचना की धार इसी पहचान में है। वे विचार और आचरण के बीच बढ़ती दूरी को सामने लाते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए अपनी वैचारिक जिम्मेदारी से अलग नहीं होते।
‘अगन गीत’ में नई पीढ़ी का प्रसंग भी इसी कारण महत्त्वपूर्ण है। कवि युवाओं की अधीरता को देखता है, उनकी हँसी और गालियों को सुनता है, लेकिन उन्हें आसानी से दोषी नहीं ठहराता। वह समझता है कि जिन शब्दों और आदर्शों ने कभी परिवर्तन का विश्वास जगाया था, वे जब व्यवहार में अपना अर्थ खोने लगते हैं तो अगली पीढ़ी का भरोसा भी टूटता है। ‘खंडित शब्दों’ से ‘खंडितकर्मों’ तक की यात्रा केवल भाषिक प्रयोग नहीं, बल्कि विचार और व्यवहार के बिखराव का संकेत है। ‘अगन गीत’ का ‘मर्सिया’ बन जाना इसी विडंबना को और गहरा करता है। जिस गीत में आग होनी चाहिए थी, वह अपनी ही बुझती हुई ऊर्जा का शोकगीत बन गया है।
ऋतुराज की कविता का यह पक्ष उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता को अधिक विश्वसनीय बनाता है। वे वामपंथ की आलोचना उसके घोषित मानवीय उद्देश्यों को छोड़कर नहीं करते। उनके लिए विचारधारा की ईमानदारी का अर्थ उसकी हर विफलता का बचाव करना नहीं, बल्कि उसके आदर्शों और वास्तविक आचरण के बीच पैदा हुई दूरी को पहचानना है। इसीलिए उनकी कविता में प्रतिरोध केवल सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का नाम नहीं है; वह अपने भीतर मौजूद सुविधाभोग, आत्ममुग्धता और समझौतों को पहचानने की प्रक्रिया भी है।
ऋतुराज को केवल राजनीतिक कविताओं के आधार पर याद करना उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा। उनकी कविता में राजस्थान के ग्रामीण और वनवर्ती परिवेश का अनुभव भी गहराई से उपस्थित है। बूंदी और उसके आसपास के भूगोल से लेकर दूसरे क्षेत्रों में जीवन के विविध रूपों तक, प्रकृति उनके लिए सजावट का साधन नहीं है। धरती, वनस्पति, ऋतुएँ और जीव-जंतु मनुष्य के जीवन-संघर्ष से जुड़े हुए हैं। ‘मरूँगा नहीं’ जैसी कविता में सूखी धरती पर आक और धतूरे की प्यास जीवन की जिजीविषा का रूप ग्रहण करती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखने वाले पौधे जीवन के पक्ष में खड़े रहने की उस शक्ति का संकेत देते हैं, जो किसी कृत्रिम आशावाद से नहीं, संघर्ष के अनुभव से पैदा होती है।
उनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन का चित्र किसी रोमानी सरलता से निर्मित नहीं होता। वहाँ प्रकृति के प्रति लगाव है, लेकिन अभाव, श्रम और असुरक्षा की अनदेखी नहीं है। इसी तरह ‘ज्ञानीजन’ जैसी कविता में वे बौद्धिक प्रतिष्ठा और वैचारिक आचरण के बीच के अंतर्विरोधों को सामने लाते हैं। किसी विचारधारा का नाम लेना उसके मूल्यों को अपने व्यवहार में उतार लेने का प्रमाण नहीं हो सकता। ज्ञान यदि सामाजिक विषमता को समझने और बदलने के बजाय प्रतिष्ठा तथा सुविधा का साधन बन जाए तो उसकी आलोचना ज़रूरी है। ऋतुराज की दृष्टि सत्ता के साथ-साथ उन प्रतिष्ठा-तंत्रों पर भी पड़ती है, जो प्रतिरोध की भाषा बोलते हुए भी निजी लाभों से संचालित होते हैं।
‘गाँधी हिल पर’ जैसी कविता में इतिहास के प्रतीकों और वर्तमान जीवन के बीच बढ़ती दूरी का प्रश्न सामने आता है। गाँधी और उनकी बकरी का प्रसंग केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भूख, उपेक्षा और सामाजिक विषमता की ओर भी संकेत करता है। नई पीढ़ी के लिए पुराने प्रतीकों का अर्थ बदल जाने की स्थिति को कवि एक सरल नैतिक उपदेश में नहीं बदलता। वह इस प्रश्न को खुला रखता है कि ऐतिहासिक विरासत वर्तमान की ज़रूरतों से किस तरह जुड़ सकती है। यही उनकी कविता की आलोचनात्मक प्रकृति है। वह पाठक को तैयार निष्कर्ष देने के बजाय उसके विवेक को सक्रिय करती है।
ऋतुराज की भाषा में लोकजीवन के शब्दों, ठोस वस्तुओं, वैचारिक संकेतों और व्यंग्य का ऐसा मेल दिखाई देता है, जो उनके अनुभव-संसार को विशिष्ट बनाता है। वे जब राजनीतिक क्षरण को खंडहरों, सूखी घास और हवा के रीतेपन के माध्यम से व्यक्त करते हैं तो विचार दृश्य और अनुभूति में बदल जाता है। जब वे शब्दों और कर्मों के खंडित होने की बात करते हैं, तो भाषा का विन्यास ही सामाजिक स्थिति का अर्थ खोलने लगता है। उनके यहाँ व्यंग्य का उद्देश्य केवल हँसाना नहीं, बल्कि सामान्य व्यवहार के भीतर छिपे अंतर्विरोधों को उजागर करना है। जहाँ अनुभव, बिंब और विचार एक-दूसरे में घुलते हैं, वहाँ उनकी कविता अधिक प्रभावशाली बनती है। कहीं-कहीं सीधे राजनीतिक कथन की सीमा भी दिखाई देती है, लेकिन उनकी श्रेष्ठ रचनाओं में वैचारिक बेचैनी कलात्मक रूप ग्रहण कर लेती है।
हमारा संपर्क केवल कविताओं और साहित्यिक चर्चाओं तक सीमित नहीं रहा। 1991 में मेरा स्थानांतरण जयपुर हुआ, लेकिन ऋतुराज से मिलना-जुलना बना रहा। अलग-अलग शहरों में रहने के बावजूद साहित्यिक मित्रता की निरंतरता बनी रह सकती है, यह मैंने उनके साथ अनुभव किया। भद्रावती, नागपुर और चंडीगढ़ के निकट नालागढ़ जैसे स्थानों पर हुई मुलाक़ातें इस संबंध के अलग-अलग पड़ाव हैं। इन मुलाक़ातों में यात्राओं की परिस्थितियाँ, जीवन के अनुभव और साहित्य की दुनिया के बदलते रूप बातचीत का हिस्सा बनते रहे।
2001 से 2004 के बीच जब मैं नागपुर में था, ऋतुराज जयपुर स्थित मेरे घर पर ठहरे। किसी साहित्यिक मित्र का घर आना केवल अतिथि-सत्कार का प्रसंग नहीं होता; उससे साझा जीवन का एक नया अध्याय जुड़ता है। जब कोई व्यक्ति हमारे निजी परिवेश में सहज रूप से शामिल हो जाता है, तो साहित्यिक परिचय की औपचारिक सीमाएँ पीछे छूटने लगती हैं। ऋतुराज के साथ मेरा संबंध भी धीरे-धीरे इसी आत्मीयता तक पहुँचा था। 2005 में उन्होंने जयपुर में मेरे घर के पास ही अपना मकान लिया। भौगोलिक निकटता ने मुलाक़ातों की संभावनाएँ बढ़ाईं और यह एहसास भी दिया कि लंबे समय से चला आ रहा साहित्यिक संबंध अब जीवन के रोज़मर्रा के भूगोल में भी जगह पा चुका है।
2007 में मैं जयपुर छोड़कर बारां चला गया। 2015 में सेवानिवृत्ति के बाद फिर स्थायी रूप से जयपुर आ गया। इन स्थानांतरणों के बीच शहर बदलते रहे, लेकिन ऋतुराज के साथ संबंध की आत्मीयता बनी रही। हमारे जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग होते हैं, जिन्हें किसी व्यवस्थित संस्मरण में दर्ज करना कठिन होता है। वे किसी बड़ी घटना की तरह याद नहीं आते, लेकिन समय बीतने पर समझ में आता है कि संबंधों की वास्तविक पूँजी उन्हीं छोटे-छोटे अनुभवों से बनती है। किसी पुराने प्रसंग का अचानक याद आ जाना, किसी बातचीत की ध्वनि का मन में लौटना या किसी परिचित जगह को देखकर किसी व्यक्ति की उपस्थिति महसूस करना—ये सब स्मरण के ऐसे रूप हैं, जिनका कोई निश्चित क्रम नहीं होता।
ऋतुराज की कविताओं में निजी संवेदना का पक्ष भी इसी व्यापक मानवीय अनुभव से जुड़ा हुआ है। ‘प्रेम की भूतकथा’ जैसी कविता में बीते संबंधों और उनसे जुड़ी रिक्तता का अनुभव मिलता है। यहाँ असुरक्षा का स्रोत राजनीतिक संस्थाएँ नहीं, बल्कि मनुष्य के निजी संबंध हैं। फिर भी इन दोनों क्षेत्रों को जोड़ने वाला तत्त्व मनुष्य की नश्वरता और उसके संबंधों की अनिश्चितता है। मनुष्य केवल विचारों और सार्वजनिक संघर्षों से नहीं बनता; वह उन आत्मीय संबंधों से भी अपना अर्थ ग्रहण करता है, जिनमें उसकी स्मृतियाँ, आकांक्षाएँ और कमज़ोरियाँ सुरक्षित रहती हैं।
आज ऋतुराज को याद करते हुए उनकी कविता और उनके व्यक्तित्व के बीच कोई कृत्रिम विभाजन नहीं कर पाता। उनकी कविताओं में जिस आत्मालोचन, असहमति और मानवीय जिजीविषा की पहचान होती है, उनके साथ बिताए समय में भी उसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है। वे ऐसे कवि थे जिनकी रचनाओं को पढ़ते हुए केवल उनके विचारों से सहमत होना पर्याप्त नहीं था; वे उन सवालों की ओर भी ले जाती थीं जिनसे बचकर निकलना आसान नहीं होता। विचार और आचरण के बीच की दूरी, प्रतिबद्धता का निजी लाभ में बदल जाना, पुरानी राजनीतिक विरासत के सामने खड़ी नई पीढ़ी की निराशा और प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवन के पक्ष में खड़े रहने की ज़िद—ये सब उनकी कविता के स्थायी सरोकार हैं।
किसी आत्मीय व्यक्ति के जाने के बाद उसके साथ बिताया समय समाप्त नहीं हो जाता, लेकिन उसका स्वरूप बदल जाता है। पहले जिन बातों को दोबारा कहे जाने की ज़रूरत नहीं होती थी, वे अब स्मरण के सहारे लौटती हैं। जिन जगहों पर साथ चला गया था, वे अपने दृश्य के साथ उस व्यक्ति की अनुपस्थिति भी सामने लाती हैं। अनुपस्थिति का अर्थ केवल किसी का न होना नहीं है; वह उन संबंधों और अनुभवों के भीतर पैदा हुई रिक्तता भी है, जिनका निर्माण दो लोगों की साझा उपस्थिति से हुआ था। ऋतुराज के जाने के बाद यह रिक्तता उनके काव्य-संसार को फिर से पढ़ने और उसके भीतर छिपे प्रश्नों को नए सिरे से समझने की प्रेरणा भी देती है।
मेरे लिए ऋतुराज को याद करना एक ऐसे समय में लौटना है जिसमें साहित्य जीवन से अलग कोई गतिविधि नहीं था। हमारी मुलाक़ातों, यात्राओं और बातचीत में कविता बार-बार जीवन के बीच लौट आती थी। उनके साथ बिताए वर्षों का मूल्य केवल इस बात में नहीं है कि मैंने एक महत्त्वपूर्ण कवि को निकट से जाना, बल्कि इस बात में भी है कि उनके माध्यम से कविता को जीवन के अंतर्विरोधों से जूझते हुए देखने का अवसर मिला।
ऋतुराज अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कविताओं में उपस्थित प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुए हैं। शायद कविता की यही सार्थकता है कि वह अपने रचयिता की अनुपस्थिति में भी हमारे समय से संवाद करती रहती है। उनके साथ बिताया समय अब स्मृति का हिस्सा है, पर वह स्मृति निष्क्रिय अतीत नहीं है। उसमें बातचीत की आवाजे़ं, बूंदी के रास्ते, साझा यात्राएँ और उन कविताओं की बेचैनी एक साथ मौजूद हैं, जिन्हें पढ़ते हुए हम अपने समय और अपने आचरण को जाँचने के लिए विवश होते हैं। ऋतुराज मेरे लिए केवल एक वरिष्ठ कवि नहीं, बल्कि जीवन के लंबे रास्ते पर मिला ऐसे आत्मीय सहयात्री हैं, जिसकी उपस्थिति अब स्मरण में है और जिनकी कविता अब भी अपने सवालों के साथ हमारे सामने खड़ी है।
संपर्क: 34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033
मो.: 7838897877