अनुनाद

हौले से धूप छुप रही है पहाड़ों की ऊंची चोटियों की ओट में/ निहाल सिंह की कविताएं

बकरी चराती लड़की

 

धूप उतर जाती है उसके 

कपड़ो पर 

ओढ़नी बनाकर ढ़क लेती है

धूप से अपनी देह को वह

ताकि पहाड़ों का मौसम चोट 

न पहुंचा सके

उसके 

कच्चे बदन को 

क्या पता कब बदल जाए 

पहाड़ों का मौसम

कब टूट के गिर जाएं बादल

कब सरक जाए 

मिट्टी के पहाड़ 

 

पत्थरों से कटी हुई 

सँकरी सी पगडंडी 

जिससे गुज़रती है 

पीठ पर लादकर 

बकरी के बच्चे को 

जिसे देखने पर 

थरथराने लगते है पाँव

कंपकपाती है देह

रोंगटें खड़े हो जाते हैं 

चमड़ी के

अचानक गायब हो जाती है 

बकरें के संग वो 

पहाड़ों की चोटियों में 

उसे ढूंढ पाना मुश्किल है 

***

courtesy : Pablo Picasso

ठाकुर की हवेलियां

 

ठाकुर की हवेलियों में 

इंसान कम 

कबूतर ज्यादा रहते है 

दीवारों से चिपके रहते है 

चमगादड़ काले रंग के

महिलाएं खड़ी हैं घूंघट में 

छत के ऊपर 

तर्जनी अंगुलि से इशारा 

करते हुए बुलाती हैं

 

जो समझ जाते है

वह 

आगे बढ़ जाते है 

ना समझ

खड़े रहते है

वह ऑंखें फाड़कर देखते रहते हैं

हवेली की दीवारों को

चौखट और खिड़कियों को

गिनते हुए सो जाते हैं 

 

भीतर खुंटी पर टंगी है 

मोटी तलवारें

दीवारों पर चिपकी हुई है 

चीते की चमड़ियां 

साथ टंगी हुई है 

पुरखों की तस्वीरें 

***

 

पहाड़ी चारवाहें

 

हौले से धूप छुप रही है 

पहाड़ों की ऊंची चोटियों 

की ओट में

चीनार के पेड़ पर 

खेल रही है ज्योत्स्ना

पत्तों को चूम रही है बयारें

दिन ढलते ही चारवाहें

 घेर लेते है अपनी भेड़ों को 

पहाड़ों की मिट्टी लगी होती है 

भेड़ों के बालों पर

जिससे पता चल जाता है 

कि वह चरकर आई है 

 

मैदानी इलाकों से घूमने 

आई हुई महिलाएं 

सेल्फी लेती है बड़े चाव से 

कुछ तो मेमीयों को गोद में 

बिठाकर कैद कर लेती है 

पलों को मोबाइल में 

लम्बी कतारों में 

भेड़ें एक दूसरे से 

चिपककर उतर जाती हैं 

ऊंची चोटियों से नीचे 

अपने बाड़ों में 

***

courtesy : Pablo Picasso

याद आता है अपना गांव

 

बिजली से चलती मेट्रो 

ट्रेन के डिब्बे में 

खचाखच भरे हुए हैं लोग 

खड़ा होकर सफ़र तय 

करना पड़ता है 

लोगों से भरी भीड़ में 

याद आता है अपना गांव 

खेतों का खुला और 

शांत माहौल 

जहां खाली मेड़ो पर 

बैठे रहते थे 

दोस्तों के साथ रात 

ढ़लने तक 

कोलड्रिंक के बोतलें 

खोलते थे 

 

पास से गुज़रता था

सफेद मृगों का झुंड

क्यारियों में सोये रहते थे 

खरगोश 

जो जगाने पर भी नही 

जागते थे 

धोरों में बहता था पानी

जिसमें डूबकी लगाती थी

नन्ही चीड़ियां 

अगले स्टेशन पर उतरकर 

वापस लौट जाऊंगा मैं 

अपने गांव, अपने खेतों में 

फिर कभी नही आऊंगा शहर 

की ओर

***       

 

परिचय 

नाम – निहाल सिंह 

जन्मतिथि – 17-02-1977

गांव- दुधवा 

जनपद – झुंझुनूं

राज्य -राजस्थान 

व्यवसाय – कृषि 

ई-मेल –nihal6376r@gmail.com 

मोबाइल – 6376145199

 

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