मैं ऐसे बोलता हूँ जैसे कोई सुनता हो मुझे !
एक नई कविता ….. रात भरपुरानी फ़िल्मों की एक पसन्दीदा श्वेत-श्याम नायिका की तरहस्मृतियां मंडरातीसर से पांव तक कपड़ों से ढंकींकुछ
एक नई कविता ….. रात भरपुरानी फ़िल्मों की एक पसन्दीदा श्वेत-श्याम नायिका की तरहस्मृतियां मंडरातीसर से पांव तक कपड़ों से ढंकींकुछ
कविचित्र यहाँ से साभार सभ्यता के गलियारे में रखे हुए टायर–चेल्सिया, मैसाच्युसेट्स“जी हुज़ूर, चूहे हैं”मालिक-मकान ने जज से कहा,“पर मैं किरायेदारों
हाल ही में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी है और इस सन्दर्भ में संबोधन
भारतभूषण तिवारी द्वारा लगायी पिछली पोस्ट की एक कविता “दास्ताने -रेचल कोरी” के क्रम में प्रस्तुत एक और महत्त्वपूर्ण कविता…… अनुवाद
चौरासीवां जन्मदिन चीज़ें बेहतर हो जायेंगी इस उम्मीद में बिताये गए इन सब बरसों के बाद ख़ुशी मनाने का कोई
स्याह कपड़ों वाली औरतें स्याह कपडे पहने कुछ यहूदी और फिलिस्तीनी औरतें हर जुमे की शाम पश्चिमी तट और गाज़ा पर
गुज़री सदी में उर्दू शाइरी का नाज़ो-अंदाज़ बदलने वालों में फैज़ का नाम प्रमुख है. उनकी शाइरी ‘घटाटोप बेअंत रातों’ में
पर्तोव नूरी़ला इरान की प्रखर कवियित्री हैं। १९४६ में तेहरान में जनमी, वहीँ पलीं बढीं और पढीं। बाद में तेहरान यूनिवर्सिटी
इस अनुवाद और प्रस्तुति के लिए अनुनाद सिद्धेश्वर सिंह यानी जवाहिर चा का आभारी है। निज़ार क़ब्बानी (1923-1998) की गणना न
इस कविता का अनुवाद भी ‘दहलीज़’ के लिए ही किया गया था. अब शिरीष का अनुसरण करते हुए- बिना ‘दहलीज़’ का