वो भारी आवाज़ अब कभी नहीं सुनाई देगी
भगवत रावत नहीं रहे। बहुत प्यार करने वाले बुज़ुर्ग कवि। फोन पर कितनी बातें होती थीं उनसे। वो भारी आवाज़ अब कभी नहीं सुनाई देगी. निकट की कविता का एक पूरा इतिहास घूमने लगता है
भगवत रावत नहीं रहे। बहुत प्यार करने वाले बुज़ुर्ग कवि। फोन पर कितनी बातें होती थीं उनसे। वो भारी आवाज़ अब कभी नहीं सुनाई देगी. निकट की कविता का एक पूरा इतिहास घूमने लगता है
नैनीताल के भोटिया मार्केट यानी तिब्बती मूल के लोगों के बाज़ार और तिब्बत को लेकर चल रहे आन्दोलन में उनकी भागीदारी
रसोईघरों में तीन सौ साठ अंशों की व्यस्तता के फलक में हर लम्हा-हर एक छोटे से कोण में मौजूद दिखतीं स्त्रियाँ
वहाँ कोई नहीं है मैं भी नहीं वह जो पड़ी है देह हाथ बांधे दांत भींचे बाहर से निस्पन्द भीतर से
मेरा पालतू कुत्ता जो पहले चिडि़यों को हैरत से तका करता और भौंकता था घात लगाने लगा है आजकल उनपर छोटे
एक लम्बे इंतज़ार के बाद जबकि मैं अपना मकान बनवा रहा हूँ…और तरह तरह की मुश्किलों से दो चार हो रहा
थोड़ी ही बच रही हिंदी की समकालीन जनवादी कविता के प्रमुख कवि अदम गोंडवी के दुखद प्रस्थान से अनुनाद शोकसंतप्त है. ***
बहुत दिनों बाद किसी उपहार की तरह मनोज कुमार झा की कविताएँ अनुनाद को मिली हैं. युवा हिंदी कविता में बिलकुल
कभी कभी फेसबुक पर भी कुछ कविताएँ अलग अलग कारणों से अपनी ओर ध्यान खींचती हैं. कल्पना पन्त की कविताएँ भी ऐसे
इधर नवभारत टाइम्स का दीपावली अंक आया है। उसमें सम्मिलित यतीन्द्र की एक कविता और उनके कविकर्म पर दो आलोचकीय टिप्पणियां