अपनी सरस्वती की अंदरूनी ख़बर – लीलाधर जगूड़ी
अपनी सरस्वती की अंदरूनी ख़बर और उस पर कड़ी से कड़ी नज़र इस ज्ञान निर्भर युग में हरेक को रखनी चाहिए
अपनी सरस्वती की अंदरूनी ख़बर और उस पर कड़ी से कड़ी नज़र इस ज्ञान निर्भर युग में हरेक को रखनी चाहिए
कवि-साथी गीत की लम्बी कहानियों पर पिछले दिनों चले उतने ही लम्बे आलाप में गिरह की तरह प्रस्तुत है उसकी एक
घर के लिए टोटके पानक्वा* दरवाज़े और आवाज़े शाम कीआशिक़ों की छुपन हराम कीयह जंगल नहीं शर्त साहित्य कीऔर नहीं तो
एक करवट और उसकी बेचैनी औंधे गिरे भृंग की तरह थी जो सिर्फ एक जीवनदायी करवट चाहता था.एक अर्ध-घूर्णन. फिर सब
गुप्त वस्तुओं की सूचना ज़बान के तरीक़े तमामइतने भी नहीं किशरबत के किस्से अधूरे पड़ जाएँ सुनोगी और हंसते—हंसतेनिकलोगी दरवाजे से
शिलोंग में रहने वाले तरुण भारतीय मैथिल फिल्मकार और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उनकी कविताएँ पहल, हंस, समकालीन भारतीय साहित्य, अक्षर पर्व,
काले द्वीप दारियो के लिए इएला नेग्रा* मेंनेरुदा की कब्र और बगीचे में पड़े लंगर के बीचउस आदमी ने, जिसके हाथ
(दुनिया में अनाचार और अनाचारियों की उपस्थिति कभी कभी किसी कवि को कितना क्रोधित, हताश और क्षुब्ध करती है, इसका एक
कविता इसलिए कि मेरे तलवे मेरी माँ जैसे हैंजन्नत है माँ के क़दमों तले -मुहम्मद साहब और ताज्जुब कर रही हूँ
हिन्दी कविता में इलाहाबाद सबसे ज़्यादा है तो वीरेन डंगवाल की कविता में। उनके हर संग्रह में यह शहर पूरी विकलता