पारुल की तीन कविताएँ
पारुल एक समर्थ और लोकप्रिय ब्लोगर हैं। वे झारखंड में रहती हैं…… …पारूल…चाँद पुखराज का…… किसी परिचय का मुहताज नहीं। मैंने
पारुल एक समर्थ और लोकप्रिय ब्लोगर हैं। वे झारखंड में रहती हैं…… …पारूल…चाँद पुखराज का…… किसी परिचय का मुहताज नहीं। मैंने
वे रहे, हू ब हू वैसे ही, जैसे वे थे उन्होंने चांद को पूजा – लेकिन थोड़ा कम उन्होंने टोकरियां बनाईं
आज दोपहरमेरे जीवन के भीतर एक औरत चली जा रही थीगुस्से मेंअपने चार साल के बच्चे के साथ बच्चे के कंधे
अंगारा मेरी ख्वाहिश– सारा शगुफ्ता इज्जत की बहुत सी किस्में हैंघूंघट, थप्पड़, गंदुमइज्जत के ताबूत में कैद की मेखें ठोंकी गई
हम गुनहगार औरतें किश्वर नाहीद ये हम गुनहगार औरतें जो अहले-जुब्बा की तमकनत से न रोआब खोयें न जान बेचें न
बारह फरवरी 1983 सईदा गजदार (पाकिस्तान में कानून-ए-शहादत के तहत किसी अदालत में औरतों की गवाही का कोई खास मूल्य नहीं
विशाल बहुत दिनों बाद अपनी चुप्पी तोड़ कर संबोधन में विष्णु नागर पर एक लेख और परिकथा में कुछ कविताओं के
वियतनामी भाषा में चूमना मेरी दादी ऐसे चूमती हैजैसे पिछवाड़े के आँगन में बम हों फूट रहे,रसोईघर की खिड़की से होकर
बस की लय को पकड़ते हुए ये बस दो रेगिस्तानी जिला मुख्यालयों को जोडती हैजो दिन में शहर और रात में
फ्रेम एक भरी पूरी उम्र लेकरदुनिया से विदा हुई दादी के बारे मेंसोचता है उसका पोताबड़े से फ्रेम में उसके चित्र