कृष्ण कल्पित की बारह कविताएं
कवि कृष्ण कल्पित ‘भारतनामा’ शीर्षक से कविता की एक सिरीज़ लिख रहे हैं। उनके जन्मदिन के अवसर पर बधाई देते हुए इसी सिरीज़ से बारह
कवि कृष्ण कल्पित ‘भारतनामा’ शीर्षक से कविता की एक सिरीज़ लिख रहे हैं। उनके जन्मदिन के अवसर पर बधाई देते हुए इसी सिरीज़ से बारह
मुझे कुछ ही देर पहले ये कविताएं मिली हैं और मैं इन्हें एक सांस में पढ़ गया हूं। आज और अभी के हिंसक प्रसंगों के
मित्रों, उत्तर सदी की हिन्दी कहानी का विकास दुनिया के किसी भी साहित्य में उपलब्ध प्रक्रिया के तहत अपने आप में अनूठा होगा इस लिहाज
हिंदी में बहुत सारी रॉ एनर्जी है। वह उतनी अनगढ़ है, जितना एक मनुष्य को होना चाहिए। उसे बाहर से साधना हिंसा की तरह होगा।
वीरेन डंगवाल पर उनके आत्मीय मित्र कथाकार बटरोही की लम्बी टिप्पणी मैं फेसबुक से साभार ले रहा हूं। बटरोही से वीरेन डंगवाल की संबंधों की
नहीं जानता कि अनुपम सिंह पहले किन पत्रिकाओं में मौजूद रही हैं और कवि के रूप में उनकी यात्रा अब तक कैसी रही है, मेरी
इंसानियत के एक समूचे घराने जितना विराट था उनका व्यक्तित्व. कवि, पत्रकार, अध्यापक, दोस्त, पिता, भाई वगैरह तो वे बाद में थे. ज़रा भी कम
1०वाँ विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन 10-12 सितम्बर 2015 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में संपन्न हुआ वैश्विक परिदृश्य पर हिंदी की
अमित ने अपनी कविताओं में कई स्तरों पर प्रयोग किए हैं। उनमें कुंभ पर लिखी एक कविता मेरी याद में सबसे ऊपर है। ये प्रयोग,
तीस छोटी कविताएँ 1. प्रेमियों का एकांत …और जबकि इतनी धूप खिली है प्यार कैसे तुमको छू रहा है क्या अब भी आकाश के किसी कोने में प्रेमियों का एकांत है? 2. नदी, पत्ती और प्रेम कई बार नदी पर तैरती पत्ती से भी हो