ग़ज़ल
सुकूते- राह में उसके कयाम की दुनिया बहुत हसीन है अब मेरे नाम की दुनिया मुझे है चाह फजा में बिखर के रहने की ये
सुकूते- राह में उसके कयाम की दुनिया बहुत हसीन है अब मेरे नाम की दुनिया मुझे है चाह फजा में बिखर के रहने की ये
बोधि भाई की एक और छोटी – सी, लेकिन अर्थ विस्तार में खूब बड़ी और खुली कविता सिकंदर सिकंदर ! सैनिक थके हुए हैं सैनिक
बोधिसत्व की ये कविता उनके पहले संकलन से है और आप देख सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर आज कितनी प्रासंगिक है। ऐसी ही कुछ
सबसे पहले ये कविता कबाड़खाना पर अशोक ने लगाई। मैंने इसे पढ़ा और फिर जगूड़ी जी से फोन पर बात हुई। इसे अनुनाद पर लगाने
अधबना स्वर्ग हताशा और वेदना स्थगित कर देती हैं अपने -अपने काम गिद्ध स्थगित कर देते हैं अपनी उड़ान अधीर और उत्सुक रोशनी बह आती
आंखों की उदासी और एक सफ़र की तफसील एक अँधेरी याद है जिस पर चीनी के बुरे की तरह बिखरा हुआ है खेलते हुए बच्चों
ये स्मृति है एक अंकुर की जिसे बड़ा पेड बनना था लेकिन अब उसके अंकुराने के कुछ प्रमाण ही शेष हैं। उसके नाम से मुझे,
खुशीवह नहीं चाहतीकि मैं उसके बारे में कुछ बोलूंउसे कागज पर नहीं उतारा जा सकेगाऔर न हीउसके बारे में कोई भविष्यवाणी ही की जा सकती
अब बच्चा अब बच्चाकुछ देख रहा हैकुछ सुन रहा है कुछ सोच रहा है क्या वह देख रहा हैउस तरह की चीज़ों को जैसी देखी
ईश्वर से मुखामुखी मेरी चमकती आंखों से दूसरी पर भाग जाने कि आतुरता छीन कर उन्हें सिखालाओ पर्दा करना उन चमकीली आंखों से हे ईश्वरहे