अनुनाद

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कवितार्थ प्रकाश

कवितार्थ प्रकाश -एक कुछ भी कहता हो नासाकम्प्यूटर की स्क्रीन कितनी ही झलमलाएपर इतना तय हैकि किसी सत्यकल्पित डिज़िटल दुनिया या फिर सुदूर सितारों से

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जिम कार्बेट पार्क में एक शाम – एक सफ़रनामा

जिम कार्बेट नेशनल पार्क में एक शामयही शीर्षोक्त स्थानजिसे मैं अपनी सुविधा के अनुसार आगे सिर्फ जंगल कहूँगामनुष्यों ने नहीं बनाया इसेहमने तो चिपकाया महज

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पहाड़

दोस्तो ये दो कविताएं 1991 की हैं और इनका कच्चापन साफ दिखाई देता है- आप इन्हें मेरी निजी और पुरानी डायरी के दो पीले पन्ने

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हाथों की व्याख्या

मैं व्याख्या करता हूँ ये मेरे हाथ हैं इन हाथों की मैं नहीं जानता कहाँ से आती है आवाज़ कुछ चीज़ें चींटियों की तरह चल

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1965

मैं आपा के बारे में बात कर रहा हूँ जो अम्मी के बारे में बात करती थी जो शौहर के बारे में बात करती थीं

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संस्कार

बीच के किसी स्टेशन पर दोने में पूड़ी साग खाते हुए आप छिपाते हैं अपना रोना जो अचानक शुरू होने लगता है पेट की मरोड़

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राजेन्द्र कैडा

दोस्तो ये बिना शीर्षक कविता एक बिलकुल नए कवि के पहले प्रेम की कविता है ! आप बताइए कैसी है ! *** सपनों पर किसी

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अप्रकाशित कविता

एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी होती जा रही है अब और ख़राब कोई इंसानी कोशिश सुधार नहीं सकती मेहनत से और बिगाड़

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