
और इसी भीड़ में सबसे बड़ा अकाल मनुष्य का है/ शैलेन्द्र चौहान की कविताएं
शैलेन्द्र चौहान की कविताएं वैश्विक स्तर पर व्याप्त विषमताओं से व्याकुल कवि मन को दर्शाती हैं। चारों ओर फैले कुहासे में

शैलेन्द्र चौहान की कविताएं वैश्विक स्तर पर व्याप्त विषमताओं से व्याकुल कवि मन को दर्शाती हैं। चारों ओर फैले कुहासे में

कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएं पहाड़ की सड़कों की तरह मोड़दार हैं। वैश्विक दृश्यों में चलती हुई, अचानक से संवेदनाओं में

ज्योतिकृष्ण वर्मा की ये कविताएं आकार में छोटी और कहन में बड़ी हैं। हमारे आस-पास के रूपकों को बरतते हुए वे

अनामिका अनु की कविताओं का स्वर अलहदा है। उनकी एकान्तिक अनुभूतियों में भी एक अलग तरह की सामूहिकता है, जो पाठक

पल्लवी की कविताएं समाज में व्याप्त विसंगतियों,पाखंड से संवेदना भरे मन में होने वाली उथल-पुथल को सामने लाती हैं। इन विसंगतियों

प्रेम – 1 अत्यंत बलवती थी उसकी इच्छा जीवन वरण की डस गया तभी प्रेम पिघला वाहिनियों में पीड़ा का स्वेद

। एक । कबसे किसे जप रहा जल कल कल कल कल ।। । दो । पहाड़ पार जाते आते आधी

अपना एक कोना एक स्त्री! अपने आस पास, सब कुछ रचती है बड़े इत्मीनान से ख़ाली मकान को बंजर ज़मीन

मैं न आऊं लौटकर तो मैं न आऊं लौटकर तो तुम गॉंव के जवानों के पॉंव की माटी की जरा सी

(एक) नदियां अपना रास्ता मांग रही थी जंगल अपनी जमीन मांग रहे थे पहाड़ अपनी प्रकृति मांग रहे थे