नीलकमल का नया संग्रह ‘यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है’
कुछ बहसतलब खरी कविताओं के बीच नीलकमल का दूसरा कविता संग्रह ‘यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है’ कई दिन
कुछ बहसतलब खरी कविताओं के बीच नीलकमल का दूसरा कविता संग्रह ‘यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है’ कई दिन
लोकोन्मुख आस्वाद की कविताएं :पांव तले की मिट्टी – आशीष कुमार “ कहा जा रहा है कविता खत्म हो रही
इस अनुक्रम का पहला शोधालेख जितेन्द्र कुमार ने लिखा है, जिसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है। अंग्रेजी के
लोक की अवधारणा को बिलकुल नए अध्येता अब मिल रहे हैं। मेरे दो विद्यार्थी जितेन्द्र कुमार और शिव प्रकाश त्रिपाठी इसी
वैद्यनाथ मिश्रा,यात्री या फिर सबसे प्रसिद्ध व लोकप्रिय नाम बाबा नागार्जुन हिंदी एवम् मैथिली साहित्य के क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध नाम
कवि का रेखाचित्र : कुंवर रवीन्द्र लोकधर्मिता, न गाँव के दृश्य या घटनाओं को कविता में लाना भर है ,न पेड़-पत्ती-फूल
आज की आलोचना विशेषकर व्यवहारिक आलोचना का एक बड़ा संकट है-उसे न पढ़े जाने का।विडंबना यह है कि इसका कारण
It is midnight I keep awake, all by myself To see the midnight colors, they Have silent is vibrant and Rhythm
स्वानुभूति- हिन्दी दलित आत्मकथाओं में जो एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है वो है इन आत्मकथाओं में स्वानुभूति तथा
गिरिाराज किराड़ू ने इस बार न सिर्फ़ अपने बल्कि मेरी समझ के भी बहुत क़रीब के कवि महेश वर्मा पर लिखा