पाकिस्तानी कविता में स्त्री तेवर- दूसरी कड़ी
हम गुनहगार औरतें किश्वर नाहीद ये हम गुनहगार औरतें जो अहले-जुब्बा की तमकनत से न रोआब खोयें न जान बेचें न
हम गुनहगार औरतें किश्वर नाहीद ये हम गुनहगार औरतें जो अहले-जुब्बा की तमकनत से न रोआब खोयें न जान बेचें न
बारह फरवरी 1983 सईदा गजदार (पाकिस्तान में कानून-ए-शहादत के तहत किसी अदालत में औरतों की गवाही का कोई खास मूल्य नहीं
विशाल बहुत दिनों बाद अपनी चुप्पी तोड़ कर संबोधन में विष्णु नागर पर एक लेख और परिकथा में कुछ कविताओं के
वियतनामी भाषा में चूमना मेरी दादी ऐसे चूमती हैजैसे पिछवाड़े के आँगन में बम हों फूट रहे,रसोईघर की खिड़की से होकर
बस की लय को पकड़ते हुए ये बस दो रेगिस्तानी जिला मुख्यालयों को जोडती हैजो दिन में शहर और रात में
फ्रेम एक भरी पूरी उम्र लेकरदुनिया से विदा हुई दादी के बारे मेंसोचता है उसका पोताबड़े से फ्रेम में उसके चित्र
घर गृहस्थी में धंसता पुराना प्रेम पत्र (एक काव्यकथा) ” श्री गोपीवल्लभ विजयते” बम्बोई(तिथि अस्पष्ट) प्यारी सुगना, मधुर याद. श्री कृष्ण
आत्मकथ्य इन कविताओं में हिमालय का घूमंतू जीवन है. हिमालय के भीतर और ट्रांस हिमालय के आदिम समुदायों में दो तरह
होमलैंड सिक्योरिटीघंटे दर घंटे दिन प्रतिदिन एअरपोर्ट सुरक्षाकर्मी खड़ी रहती है एक्सरे मशीन के पास बगल से गुज़रते भूतों को मॉनिटर
एक पुरस्कार समारोह से लौटकरवह सीकरी का दरबार ही था भरा-पूराऔर वहां संत ही थे सारेयह ग़र्मियों की एक ख़ुशनुमा शाम