मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग – मुक्तिबोध को याद करते हुए
( अप्रैल २००७ में मुझ पर एक आफ़त आई और मैंने बदहवासी की हालत में ख़ुद को एम० आर० आई० मशीन
( अप्रैल २००७ में मुझ पर एक आफ़त आई और मैंने बदहवासी की हालत में ख़ुद को एम० आर० आई० मशीन
1 अगस्त 1944 को पिपरिया, म0प्र0 में जन्मे गिरधर राठी अस्सी के दशक में हिंदी के सम्मानित कवि माने जाते रहे
शर्मनाक समय कैसा शर्मनाक समय है जीवित मित्र मिलता है तो उससे ज़्यादा उसकी स्मृति उपस्थित रहती है और उस स्मृति
मैंने जाना उसका लौटनावह जो हमारे मुहल्ले की सबसे खूबसूरत लड़की थीअब लौट आयी है हमेशा के लिएशादी के तीन साल
चारबाग़ स्टेशन : प्लेटफारम नं. 7 ‘तुम झूटे ओ’ यही कह रही बार-बार प्लेटफारम की वह बावली ‘शुद्ध पेयजल’ के नलके
पसीने कीएक आदिम गंध आती है मुझसेएक पाषाणकालीन गुफा मेंखुदा मिलता हैमेरा चेहरा हज़ारों साल पुरानेकैल्शियम और फास्फोरस कासंग्रहालय बन जाती
(इस कविता को वेणुगोपाल के लिए भी मेरी एक श्रद्धांजलि मानें , जो कुमार विकल के समानधर्मा कवि थे।) सभी कुछ
( हमारे कबाड़खाने से ये फोटो, उनकी, जिन्हें ये कविता संबोधित है …. इसे विश्व पुस्तक मेले में खेंचा गया )
(यह थमा हुआ वीडियो विजुअल 2004 के अंकुर मिश्र स्मृति सम्मान समारोह से) ” कहानी में कविता कहना विष्णु खरे
प्रदीपचन्द्र पांडे की ये बड़ी अर्थच्छवियों से घिरी छोटी-छोटी कविताएं एक 56 पृष्ठीय पतले-दुबले संकलन के रूप में मुझे एक पारिवारिक