हँसो हँसो जल्दी हँसो – रघुवीर सहाय
आधुनिक हिंदी कविता में मुक्तिबोध के बाद के सबसे महत्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर बहुत ख़ास
आधुनिक हिंदी कविता में मुक्तिबोध के बाद के सबसे महत्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर बहुत ख़ास
पहली मार्च इकहत्तर को उ0प्र0 के एक निहायत छोटे गांव में जन्मे और फिर जे0एन0यू0 में दीक्षित अनिल त्रिपाठी को आलोचना
कुमार अम्बुज हमारे समय के महत्वपूर्ण कवियों में एक हैं। मेरे लिए वे ऐसे अनदेखे-अनमिले-अपरिचित बड़े भाई हैं, जिनकी कविता की
अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही अगर तुम्हें नींद नहीं आ रही तो मत करो कुछ ऐसा कि जो किसी तरह
विमल कुमार, मेरा अनुमान है कि कुमार अम्बुज और देवीप्रसाद मिश्र की पीढ़ी के कवि हैं। मैं उन्हें उनके संकलन `सपने
किरीट मेरे लिए व्यक्ति से ज़्यादा एक व्यक्तित्व हैं। उन्हें अपने अनुभव अभी प्राप्त करने हैं। वे अपने पहाड़ी गांव से
दोस्तों के डेरे पर एक शाम – एक बहुत कुछ नहीं रहा जब बाक़ीहमारे जीवन मेंहमने टटोली अपनी आत्मा जैसे आटे
पुराने उम्रदराज़ दरख्तों से छिटकती छालें कब्र पर उगी ताज़ा घास पर गिरती हैं अतीत चौकड़ी भरते घायल हिरन की तरह
एक अद्वितीय तत्व हमें नरेश सक्सेना की कविता में दिखाई पड़ता है जो शायद समस्त भारतीय कविता में दुर्लभ है और
एक फूल सभी जब नींद में गुम है , महके अब पुरवाई क्या इतने दिनों में याद जो तेरी, आई भी