
पॉंच लघुकथाएं/ सुनील गज्जाणी
पानी “यूँ एक टक क्या आकाश को ताक रहे हो?” “नहीं, बादलों को!” “मगर आकाश तो एक दम सूखा है रेगिस्तान की

पानी “यूँ एक टक क्या आकाश को ताक रहे हो?” “नहीं, बादलों को!” “मगर आकाश तो एक दम सूखा है रेगिस्तान की

छद्म रात की स्याही में चाँद चंद्रबिंदु के समान चमक रहा था अनगिनत तारे अनंत आकाश ज़मीं पर दूर तक फैली रेत रेत

बिली वीवर लंदन से अपराह्न वाली धीमी गति की रेलगाड़ी से, रास्ते में स्विंडन में गाड़ी बदलता हुआ, यात्रा करके आया था। जिस समय वह

सेमल का फूल चैत के महीने में बिखरे घमाते सेमल के फूल अलसाये उनींदे फिर भी मुस्कुराते सेमल के

बौज्यू कब से कह रहे थे कि गांव ले चलो ले चलो गांव बस एक बार इसे मेरी आखिरी बार की ही यात्रा समझो

नदी का पानी (अरुण कमल के लिए ) पहाड़ से गिरता हुआ पानी नहीं जानता कि उसे जाना कहाँ है वह मिठास और चमक के

कुछ सीखें बच्चों की बड़ों के लिए कितना कुछ बचा लेते हैं ये नन्हे-नन्हे हाथ: धरती भर मानवता अंबर भर संवेदनाएँ वसंती

आश्वस्ति बसंत के माथे पर खिलते फूलों को देख लौट लौट आती हैं तितलियाँ जबकि पूस की रातों में जुगनू नहीं लौटते ऋतुएँ

आरती के पश्चात घाट पर हमारे बैठे-बैठे गंगा से डाल्फिनें ग़ायब हो गईं गुम हो गई उस पार की हरियाली और गंगा भी मटमैली