
कुछ लिखने की ख़ातिर लिख लेना यूँ कब कविता कहलाता है – विपिन ध्यानी की कविताऍं
पहाड़ी औरतें आँखें छलकी ही रहती हैं उबाल पर रहता है कलेजा उनका पहाड़ी औरतें एक बड़े दरख़्त की मानिंद झुकी सी रहती हैं लिए

पहाड़ी औरतें आँखें छलकी ही रहती हैं उबाल पर रहता है कलेजा उनका पहाड़ी औरतें एक बड़े दरख़्त की मानिंद झुकी सी रहती हैं लिए

माँ बेटियों ने माँ को सिर्फ माँ समझा कभी लड़की क्यों नहीं क्यों नहीं समझा उसके भी सपने रहे होंगे उनकी ही तरह वो भी

वन्दे भारत वन्दे भारत बरेली में बैठते ही बंद हो गए कोच के दरवाज़े भीतर एक महिला की आवाज़ गूँजी अगला स्टेशन लखनऊ है

फूलों के रंग फूलों के रंग कैसे बदले जा सकते हैं रक्त के रंगों से? अगर इस वक़्त में बदले जाने के लिए खंजर

हिन्दी की दशा-दिशा — लिपिका भूषण की प्रचण्ड प्रवीर से बातचीत ******************* लिपिका : आज़ादी के ७७ साल बाद हिन्दी की स्थिति क्या है? प्रचण्ड

अनुनाद-जनवरी-जून.pdf

ग़ालिब नामवर सिंह के बहुत प्रिय कवि रहे। जिस मिसरे को मैं इस लेख का शीर्षक बना रहा हूं, उसका पहला मिसरा है – आईना

प्रेम का लिखा जाना सबसे कठिन हर आदमी के भीतर एक उपन्यास होता है जिसे लिखते हैं दूसरे लोग और इतने बेहतर तरीके से कि

पौ फूटिन लागि रै छि। लम्बी-काली रातक आन्यर गर्भ भटि एक हसीन-स्वाणी रात ब्यागे छि। सुरजाक घावाड् काल है पछिल छोड़ भैर अपुण पूरी रफ़्तार में दौड़ान

आदमी भले ही खाली हाथ हो उसकी भाषा हमेशा उसके साथ होती है। आज से कई साल पहले जब हमारे बड़े-बुजुर्ग, पिता या दादा पहाड़