अनुनाद

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कविता

कुछ लिखने की ख़ातिर लिख लेना यूँ कब कविता कहलाता है – विपिन ध्‍यानी की कविताऍं

पहाड़ी औरतें आँखें छलकी ही रहती हैं उबाल पर रहता है कलेजा उनका पहाड़ी औरतें एक बड़े दरख़्त की मानिंद झुकी सी रहती हैं लिए

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कविता

उसके भी सपने रहे होंगे उनकी ही तरह – रंजना जायसवाल की कविताऍं

माँ बेटियों ने माँ को सिर्फ माँ समझा कभी लड़की क्यों नहीं क्यों नहीं समझा उसके भी सपने रहे होंगे उनकी ही तरह वो भी

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कविता

वह मुझसे अधिक पैदल चलता होगा रोज़ – संदीप तिवारी की कविताऍं

वन्दे भारत वन्दे भारत बरेली में बैठते ही बंद हो गए कोच के दरवाज़े भीतर एक महिला की आवाज़ गूँजी अगला स्टेशन लखनऊ है  

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कविता

हम जो भी किसी को देते हैं वो ही लौटकर फिर अपने तक आता है – सोहन लाल की कविताऍं

फूलों के रंग फूलों के रंग कैसे बदले जा सकते हैं रक्त के रंगों से?   अगर इस वक़्त में बदले जाने के लिए खंजर

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कथेतर गद्य

हिन्‍दी दिवस पर विशेष (प्रचण्‍ड प्रवीर के साथ लिपिका भूषण की बातचीत)

हिन्दी की दशा-दिशा — लिपिका भूषण की प्रचण्ड प्रवीर से बातचीत ******************* लिपिका : आज़ादी के ७७ साल बाद हिन्दी की स्थिति क्या है? प्रचण्ड

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कहानी

भैंस का कट्या – विद्यासागर नौटियाल /अनुवाद : हिमांशु विश्‍वकर्मा

पौ फूटिन लागि रै छि। लम्बी-काली रातक आन्यर गर्भ भटि एक हसीन-स्वाणी रात ब्यागे छि। सुरजाक घावाड् काल है पछिल छोड़ भैर अपुण पूरी रफ़्तार में दौड़ान

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समाज और संस्कृति

कमज़ोर पड़ती पहाड़ी लोकगीतों और बोलियों की थाती – योगेश ध्‍यानी

आदमी भले ही खाली हाथ हो उसकी भाषा हमेशा उसके साथ होती है। आज से कई साल पहले जब हमारे बड़े-बुजुर्ग, पिता या दादा पहाड़

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