अनुनाद

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कविता

असल के पीछे का असल अकसर ख़ामोश खड़ा रह जाता है – अर्चना गौतम ‘मीरा’ की कविताऍं

प्रेम – 1 अत्यंत बलवती थी उसकी इच्छा जीवन वरण की डस गया तभी  प्रेम पिघला वाहिनियों में पीड़ा का स्वेद ज्वर मियादी का मार

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कविता

मैने मुट्ठी में भींच कर रखा एक ख़्वाब था – प्रीति आर्या की कविताऍं

  अपना एक कोना  एक स्त्री! अपने आस पास,  सब कुछ रचती है बड़े इत्मीनान से ख़ाली मकान को  बंजर ज़मीन को खंडहर को ख़ुद

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कविता

एक को तोड़े बिना दूसरे से जुड़ जाना बहुत मुश्किल होता है – शंकरानंद की कविताऍं

सँभालने की कला चीजें जब एक के बाद एक आती हैं तोअपनी जगह बनाती जाती हैंराख हो फूल हो कागज़ हो याकोई लकड़ी का टुकड़ाउनके

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कविता

कुछ लिखने की ख़ातिर लिख लेना यूँ कब कविता कहलाता है – विपिन ध्‍यानी की कविताऍं

पहाड़ी औरतें आँखें छलकी ही रहती हैं उबाल पर रहता है कलेजा उनका पहाड़ी औरतें एक बड़े दरख़्त की मानिंद झुकी सी रहती हैं लिए

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कविता

उसके भी सपने रहे होंगे उनकी ही तरह – रंजना जायसवाल की कविताऍं

माँ बेटियों ने माँ को सिर्फ माँ समझा कभी लड़की क्यों नहीं क्यों नहीं समझा उसके भी सपने रहे होंगे उनकी ही तरह वो भी

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कविता

वह मुझसे अधिक पैदल चलता होगा रोज़ – संदीप तिवारी की कविताऍं

वन्दे भारत वन्दे भारत बरेली में बैठते ही बंद हो गए कोच के दरवाज़े भीतर एक महिला की आवाज़ गूँजी अगला स्टेशन लखनऊ है  

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