अनुनाद

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कविता

सूंण मेरी सरम्याळी मायादार / रूचि बहुगुणा उनियाल

बुढ्या ह्वैगी पैली नी जागदी थै माँ अधरातीम मेरा पिताजी बणौंदा था चाहा सुबेर्योंकी दींदा था हम सब्युंक चाहा की प्याली बिछौंण्युम काळी गौड़ी ज्यू

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आलोचना / समीक्षा

मृत्‍यु कविताऍं – अरुण देव (समीक्षा- रविभूषण)

‘मृत्यु कविताएँ’ जीवन-विरोधी कविताएँ नहीं हैं   – रविभूषण निराला के बाद अरुण देव संभवतः हिन्दी के अकेले कवि हैं, जिन्होंने मरण का वरण किया है। निराला

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कथेतर गद्य

प्रयाग शुक्‍ल से शर्मिला बोहरा जालान का साक्षात्‍कार (प्रयाग शुक्‍ल जन्‍मदिन विशेष)

“हम छवियों के युग में रह रहे हैं। छवियों के युग में रहने के कारण कलाकृतियों को देखना आसान और मुश्किल दोनों हो गया है।”-

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कथेतर गद्य

दूरसंचार विभाग में हिन्‍दी अधिकारी की नौकरी के दौरान के कुछ किस्‍से – विजय प्रभाकर

(1) खादी ने किया हिंदी का आग्रह यह बात उन दिनों की है जब मेरा हिंदी अनुभाग तीसरी मंजिल पर था। दूरसंचार की सभी पुरानी

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आलोचना / समीक्षा

ऋष्यशृङ्ग की ख़राब कविताएँ की ख़राब भूमिका- अम्‍बुज कुमार पाण्‍डेय

कवियों का दुःख संसार का कठोरतम जीव मुझे कवि समझ में आता है। देसी भाषा में कहूँ तो बिलकुल ‘कठ करेज’। और हो भी क्यों

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कथेतर गद्य

हिन्‍दी साहित्‍य और न्‍यू मीडिया- कमलजीत चौधरी से मेधा नैलवाल का साक्षात्‍कार

मेधा- हिन्‍दी साहित्‍य और न्‍यू मीडिया के संबंध को आप किस तरह देखते हैं? कमलजीत – मेरी समझ से इस दौर में हिन्दी साहित्य और

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