
बा्ज कुड़िक बा्ट सुनसान छु / अनिल कार्की
पौ भरि याँ इ काँ इ धार पार तुमरि फाम धरि छु जेठक सैव ह्यूण क निमैलि सुर्जजसि चौमासकि घोघ जसि यस छु यो पहाड़

पौ भरि याँ इ काँ इ धार पार तुमरि फाम धरि छु जेठक सैव ह्यूण क निमैलि सुर्जजसि चौमासकि घोघ जसि यस छु यो पहाड़

गुरूत्वाकर्षण न्यूटन जेब में रख लो अपना गुरूत्वाकर्षण का नियमधरती का गुरूत्वाकर्षण ख़त्म हो रहा है । अब तो इस गोल-मटोल और ढलुआ पृथ्वी परकिसी

आङ्-आङ् चिचैल है गो ! आङ्-आङ् चिचैल है गो ! हिकौ-हिकौ कुकैल है गो । मुखां-मुखां म्वडैन फोकी गे । पौन-पाणी सैद विखेल है गो

पहाड़ का मसाण ऊ मुकूं फाटी दाड़ीम वाई चे रो छी निसवास छी वी आंखम् एक विश्वास छी वी आंखम् उन बखे ले, जाण बखे

बुढ्या ह्वैगी पैली नी जागदी थै माँ अधरातीम मेरा पिताजी बणौंदा था चाहा सुबेर्योंकी दींदा था हम सब्युंक चाहा की प्याली बिछौंण्युम काळी गौड़ी ज्यू

वोडु वोडु जमीन मां पढ़न सि पैली पड़दू दिलूँ मां अर वै हि वोडो छाप पड़दू जमीन पर अर जब ज़मीन अर दिल द्वी

मोहनि दूर्गून धार* ठंडी बयाल वालि धार उ धार पलतर छिड़ा* मलतर दुरगूण* हूण लागिरौ बिरालू पोथ जै मोहनि दुरगूण। मोहनि आज पूजि रै

‘मृत्यु कविताएँ’ जीवन-विरोधी कविताएँ नहीं हैं – रविभूषण निराला के बाद अरुण देव संभवतः हिन्दी के अकेले कवि हैं, जिन्होंने मरण का वरण किया है। निराला

“हम छवियों के युग में रह रहे हैं। छवियों के युग में रहने के कारण कलाकृतियों को देखना आसान और मुश्किल दोनों हो गया है।”-

अनुक्रम क्र. सं. अनुक्रम/ अंक 4, खंड 2 / अक्टूबर- दिसम्बर 2024) कविता 1 ये सच है कि अपना कागज़ और अपनी