
उँन कलम त नि देखी / मोहित नेगी ‘मुंतज़िर’
वोडु वोडु जमीन मां पढ़न सि पैली पड़दू दिलूँ मां अर वै हि वोडो छाप पड़दू जमीन पर अर जब ज़मीन अर दिल द्वी

वोडु वोडु जमीन मां पढ़न सि पैली पड़दू दिलूँ मां अर वै हि वोडो छाप पड़दू जमीन पर अर जब ज़मीन अर दिल द्वी

मोहनि दूर्गून धार* ठंडी बयाल वालि धार उ धार पलतर छिड़ा* मलतर दुरगूण* हूण लागिरौ बिरालू पोथ जै मोहनि दुरगूण। मोहनि आज पूजि रै

‘मृत्यु कविताएँ’ जीवन-विरोधी कविताएँ नहीं हैं – रविभूषण निराला के बाद अरुण देव संभवतः हिन्दी के अकेले कवि हैं, जिन्होंने मरण का वरण किया है। निराला

“हम छवियों के युग में रह रहे हैं। छवियों के युग में रहने के कारण कलाकृतियों को देखना आसान और मुश्किल दोनों हो गया है।”-

अनुक्रम क्र. सं. अनुक्रम/ अंक 4, खंड 2 / अक्टूबर- दिसम्बर 2024) कविता 1 ये सच है कि अपना कागज़ और अपनी

अहसास चोटी में चढ़ने के बाद नीचे उतरना शायद धरा में खड़े रहने के लिए जरूरी है इसीलिए चोटी अन्त भी है जिसके बाद एक

(1) खादी ने किया हिंदी का आग्रह यह बात उन दिनों की है जब मेरा हिंदी अनुभाग तीसरी मंजिल पर था। दूरसंचार की सभी पुरानी

कवियों का दुःख संसार का कठोरतम जीव मुझे कवि समझ में आता है। देसी भाषा में कहूँ तो बिलकुल ‘कठ करेज’। और हो भी क्यों

मेधा- हिन्दी साहित्य और न्यू मीडिया के संबंध को आप किस तरह देखते हैं? कमलजीत – मेरी समझ से इस दौर में हिन्दी साहित्य और

एक आँख कौंधती है (स्त्री केन्द्रित कविताएँ) । विनोद पदरज । प्रथम संस्करण : पेपरबैक, 2024 । पृष्ठ : 150 । मूल्य : 200/- विनोद