
हौले से गिरती बूंदों को अपनी पलकों पर रख लेना – निहाल सिंह की कविताऍं
मैं न आऊं लौटकर तो मैं न आऊं लौटकर तो तुम गॉंव के जवानों के पॉंव की माटी की जरा सी टुकड़ी अपने घर की

मैं न आऊं लौटकर तो मैं न आऊं लौटकर तो तुम गॉंव के जवानों के पॉंव की माटी की जरा सी टुकड़ी अपने घर की

(एक) नदियां अपना रास्ता मांग रही थी जंगल अपनी जमीन मांग रहे थे पहाड़ अपनी प्रकृति मांग रहे थे मनुष्य सब कुछ छीन

| नीलकंठ | अध्यापकों की मार से हमें कौन बचाता था ? एक ही रास्ता था मार से बचने का घर से पाठ याद करके

सँभालने की कला चीजें जब एक के बाद एक आती हैं तोअपनी जगह बनाती जाती हैंराख हो फूल हो कागज़ हो याकोई लकड़ी का टुकड़ाउनके

पहाड़ी औरतें आँखें छलकी ही रहती हैं उबाल पर रहता है कलेजा उनका पहाड़ी औरतें एक बड़े दरख़्त की मानिंद झुकी सी रहती हैं लिए

माँ बेटियों ने माँ को सिर्फ माँ समझा कभी लड़की क्यों नहीं क्यों नहीं समझा उसके भी सपने रहे होंगे उनकी ही तरह वो भी

वन्दे भारत वन्दे भारत बरेली में बैठते ही बंद हो गए कोच के दरवाज़े भीतर एक महिला की आवाज़ गूँजी अगला स्टेशन लखनऊ है

फूलों के रंग फूलों के रंग कैसे बदले जा सकते हैं रक्त के रंगों से? अगर इस वक़्त में बदले जाने के लिए खंजर

हिन्दी की दशा-दिशा — लिपिका भूषण की प्रचण्ड प्रवीर से बातचीत ******************* लिपिका : आज़ादी के ७७ साल बाद हिन्दी की स्थिति क्या है? प्रचण्ड

अनुनाद-जनवरी-जून.pdf