
जांठि को घुङुर / दिवा भट्ट
जांठि को घुङुर, कै थें कूनूं दुखि-सुखि, को दिलो हुंङुर। (लाठी का घुंघरु (बजता है) मैं किससे कहूं अपने सुख-दु:ख, कौन देगा हुंङुर)। यह कुमाउनी

जांठि को घुङुर, कै थें कूनूं दुखि-सुखि, को दिलो हुंङुर। (लाठी का घुंघरु (बजता है) मैं किससे कहूं अपने सुख-दु:ख, कौन देगा हुंङुर)। यह कुमाउनी

अछ्यान मी कैं बड़ै सोच पड़ि रूनान। पैली ले कभतै सोचनै छ्युं कि हमरि बोलि क्यै नटी उंणै। हमि आपणि दुदबोलि कैं क्यै भुलण लागि

दुपहरीमै हाड़ गलूनी वालि घाम में उ हिटनमै छि। पाणी तीसलै गालण सुख गिछि। पसीणलै उ पुररी नै गिछि। पसीण पोछान-पोछान उईक धोतिक पाल लै

पौ भरि याँ इ काँ इ धार पार तुमरि फाम धरि छु जेठक सैव ह्यूण क निमैलि सुर्जजसि चौमासकि घोघ जसि यस छु यो पहाड़

गुरूत्वाकर्षण न्यूटन जेब में रख लो अपना गुरूत्वाकर्षण का नियमधरती का गुरूत्वाकर्षण ख़त्म हो रहा है । अब तो इस गोल-मटोल और ढलुआ पृथ्वी परकिसी

आङ्-आङ् चिचैल है गो ! आङ्-आङ् चिचैल है गो ! हिकौ-हिकौ कुकैल है गो । मुखां-मुखां म्वडैन फोकी गे । पौन-पाणी सैद विखेल है गो

पहाड़ का मसाण ऊ मुकूं फाटी दाड़ीम वाई चे रो छी निसवास छी वी आंखम् एक विश्वास छी वी आंखम् उन बखे ले, जाण बखे

बुढ्या ह्वैगी पैली नी जागदी थै माँ अधरातीम मेरा पिताजी बणौंदा था चाहा सुबेर्योंकी दींदा था हम सब्युंक चाहा की प्याली बिछौंण्युम काळी गौड़ी ज्यू

वोडु वोडु जमीन मां पढ़न सि पैली पड़दू दिलूँ मां अर वै हि वोडो छाप पड़दू जमीन पर अर जब ज़मीन अर दिल द्वी