अनुनाद

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कविता

हम जो भी किसी को देते हैं वो ही लौटकर फिर अपने तक आता है – सोहन लाल की कविताऍं

फूलों के रंग फूलों के रंग कैसे बदले जा सकते हैं रक्त के रंगों से?   अगर इस वक़्त में बदले जाने के लिए खंजर

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कथेतर गद्य

हिन्‍दी दिवस पर विशेष (प्रचण्‍ड प्रवीर के साथ लिपिका भूषण की बातचीत)

हिन्दी की दशा-दिशा — लिपिका भूषण की प्रचण्ड प्रवीर से बातचीत ******************* लिपिका : आज़ादी के ७७ साल बाद हिन्दी की स्थिति क्या है? प्रचण्ड

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कहानी

भैंस का कट्या – विद्यासागर नौटियाल /अनुवाद : हिमांशु विश्‍वकर्मा

पौ फूटिन लागि रै छि। लम्बी-काली रातक आन्यर गर्भ भटि एक हसीन-स्वाणी रात ब्यागे छि। सुरजाक घावाड् काल है पछिल छोड़ भैर अपुण पूरी रफ़्तार में दौड़ान

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समाज और संस्कृति

कमज़ोर पड़ती पहाड़ी लोकगीतों और बोलियों की थाती – योगेश ध्‍यानी

आदमी भले ही खाली हाथ हो उसकी भाषा हमेशा उसके साथ होती है। आज से कई साल पहले जब हमारे बड़े-बुजुर्ग, पिता या दादा पहाड़

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समाज और संस्कृति

जांठि को घुङुर / दिवा भट्ट

जांठि को घुङुर,  कै थें कूनूं  दुखि-सुखि, को दिलो हुंङुर। (लाठी का घुंघरु (बजता है)   मैं किससे कहूं अपने सुख-दु:ख, कौन देगा हुंङुर)। यह कुमाउनी

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समाज और संस्कृति

भाषा बुलाण-चुलाण में ऐ जाली त बचि रौलि / नवीन जोशी

अछ्यान मी कैं बड़ै सोच पड़ि रूनान। पैली ले कभतै सोचनै छ्युं कि हमरि बोलि क्यै नटी उंणै। हमि आपणि दुदबोलि कैं क्यै भुलण लागि

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समाज और संस्कृति

फसक / ज्ञान पंत

  फसक …..               हमा्र पहाड़ में एक फसक भै और जो मस्तु फसक मारौं, उ फसकी भ्यो ।

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