
धन्ना का खोखा और 2003 का विश्व कप – देवेश पथ सारिया
2003 के क्रिकेट विश्व कप के समय मैं सत्रह साल का था। किराए पर कमरा लेकर अलवर में रहता था। वह पहली बार घर से

2003 के क्रिकेट विश्व कप के समय मैं सत्रह साल का था। किराए पर कमरा लेकर अलवर में रहता था। वह पहली बार घर से

बहुत दिनों से वह अपनी नींद ढूँढ रहा था … कभी कभी वह अपनी रातों की नींद ढूँढ़ते हुए मेरी दोपहर में आ जाता और

छत की मुंडेर से सटकर खड़े पुराने नीम के पेड़ की डाल से पत्तियां तोड़ते हुए, वो ढलती सांझ के सूरज को देख रहा था।

कुबेरनाथ राय और धर्मवीर भारती ने समर्पित कलासाधक को ‘संपाती’ के तुल्य बताया है। सौंदर्य का ऐसा उपासक जो सच्ची कला को निरावरण देखने की

दिन के 12 बज गए थे पुलिस को उग्रवादियों की लाशें उठवाते और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ इकट्ठा करते-करते। बीती रात 6-7 घंटों तक दोनों ओर से

प्रेम – 1 अत्यंत बलवती थी उसकी इच्छा जीवन वरण की डस गया तभी प्रेम पिघला वाहिनियों में पीड़ा का स्वेद ज्वर मियादी का मार

। एक । कबसे किसे जप रहा जल कल कल कल कल ।। । दो । पहाड़ पार जाते आते आधी सी बातें तो वे

अपना एक कोना एक स्त्री! अपने आस पास, सब कुछ रचती है बड़े इत्मीनान से ख़ाली मकान को बंजर ज़मीन को खंडहर को ख़ुद

मैं न आऊं लौटकर तो मैं न आऊं लौटकर तो तुम गॉंव के जवानों के पॉंव की माटी की जरा सी टुकड़ी अपने घर की

(एक) नदियां अपना रास्ता मांग रही थी जंगल अपनी जमीन मांग रहे थे पहाड़ अपनी प्रकृति मांग रहे थे मनुष्य सब कुछ छीन