अनुनाद

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बाँदा – वीरेन डंगवाल

मैं रात, मैं चाँद, मैं मोटे कांच का गिलास मैं लहर ख़ुद पर टूटती हुई मैं नवाब का तालाब उम्र तीन सौ साल मैं नींद,

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नगाड़े ख़ामोश हैं और हुड़का भी – रमदा

गिरदा पर एक स्मृतिलेख रामनगर में इंटरनेशनल पायनियर्स द्वारा आयोजित पहली अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता(1977) के दौरान गिरीश तिवाड़ी (गिरदा) से पहली बार मिला था।

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शमशेर से साझा

कुछ बातरतीब बातों की एक बेतरतीब पड़ताल हर युवा कवि अपनी रचना और विचार-प्रक्रिया में ख़ुद को पूर्वज कवियों से साझा करता है। मेरे लिए

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इसी रात में घर है सबका

(अग्रज राजेश जोशी को विनम्रता और विश्वास के साथ …..ये दाग़ दाग़ उजाला ये शबगज़ीदा सहर को याद करते हुए)इसी रात में घर है सबकाजो

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