राजेश सकलानी की एक कविता
राजेश सकलानी अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उम्र के लिहाज से देखें तो कुमार अम्बुज, लाल्टू, एकांत श्रीवास्तव, कात्यायनी के समकालीन बैठेंगे। हालाँकि वे उतने सक्रिय
राजेश सकलानी अत्यंत महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उम्र के लिहाज से देखें तो कुमार अम्बुज, लाल्टू, एकांत श्रीवास्तव, कात्यायनी के समकालीन बैठेंगे। हालाँकि वे उतने सक्रिय
मैं बेहद परेशान हूं इन दिनों पलट डाले आलमारी में सजे सारे शब्दकोश कितनी ही ग़ज़लों के नीचे दिये शब्दार्थ गूगल की उस सर्वज्ञानी बार
१.१०.२००२ उर्वर कविताओं के अनेक डिम्ब बिखरे हैं सब तरफ़ जिज्ञासु, आतुर और श्रमशील पाठक की समझ के गतिमान शुक्राणु उसे भेद पाते हैं। बाक़ी
खाना पकानानानी ने जाने से एक रोज़ पहले कहा – सच बात तो यह है कि मुझे कभी खाना पकाना नहीं आया उसकी मृत्युशैया के
पब्लिक एजेंडा के साहित्य विशेष से मैंने पिछली पोस्ट में राजेश जोशी की कविता लगाई थी. इस बार अग्रज कवि-अनुवादक नरेन्द्र जैन की तीन कविताएँ
राजेश जोशी अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक चर्चित कवि हैं। साधारण लोगों से जुड़ी कई असाधारण और महत्वपूर्ण कविताएँ उन्होंने लिखी हैं। अभी पब्लिक एजेंडा की
ताल के ह्रदय बले दीप के प्रतिबिम्ब अतिशीतल जैसे भाषा में दिपते हैं अर्थ और अभिप्राय और आशय जैसे राग का मोहतड-तड़ाक-तड-पड़-तड-तिनक-भूम छुटती है लड़ी
मैं यहाँ दो छोटी अमेरिकी कवितायेँ दे रहा हूँ जिन दोनों का सामान विषय है—बुढ़ापा….पर इन दोनों में इस विषय के साथ खेलने में अद्भुत
सिर्फ हम कर सकते हैं सोने का अवमूल्यन बाज़ार में उसके चढ़ने या गिरने की परवाह न करके. पता है, जहाँ भी सोना होता है
आप तो नाहक ही डर गए मैं तो अभी गुस्से में नहीं मुहब्बत में झपटता हूँ हर आने वाले पर उसकी अंगुलियां अपने मुंह में