अनुनाद

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अशोक कुमार पांडे की नई कविता

मैं बेहद परेशान हूं इन दिनों पलट डाले आलमारी में सजे सारे शब्दकोश कितनी ही ग़ज़लों के नीचे दिये शब्दार्थ गूगल की उस सर्वज्ञानी बार

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कुमार अम्बुज की डायरी

१.१०.२००२ उर्वर कविताओं के अनेक डिम्ब बिखरे हैं सब तरफ़ जिज्ञासु, आतुर और श्रमशील पाठक की समझ के गतिमान शुक्राणु उसे भेद पाते हैं। बाक़ी

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असद ज़ैदी की कविता

खाना पकानानानी ने जाने से एक रोज़ पहले कहा – सच बात तो यह है कि मुझे कभी खाना पकाना नहीं आया उसकी मृत्युशैया के

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नरेन्द्र जैन की तीन कविताएँ

पब्लिक एजेंडा के साहित्य विशेष से मैंने पिछली पोस्ट में राजेश जोशी की कविता लगाई थी. इस बार अग्रज कवि-अनुवादक नरेन्द्र जैन की तीन कविताएँ

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राजेश जोशी की एक कविता

राजेश जोशी अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक चर्चित कवि हैं। साधारण लोगों से जुड़ी कई असाधारण और महत्वपूर्ण कविताएँ उन्होंने लिखी हैं। अभी पब्लिक एजेंडा की

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बुढापे की कविता – चयन, अनुवाद और प्रस्तुति: यादवेन्द्र

मैं यहाँ दो छोटी अमेरिकी कवितायेँ दे रहा हूँ जिन दोनों का सामान विषय है—बुढ़ापा….पर इन दोनों में इस विषय के साथ खेलने में अद्भुत

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सिर्फ हम : एलिस वाकर

सिर्फ हम कर सकते हैं सोने का अवमूल्यन बाज़ार में उसके चढ़ने या गिरने की परवाह न करके. पता है, जहाँ भी सोना होता है

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पंकज चतुर्वेदी की तीन कविताएँ

पंकज चतुर्वेदी कल कुमाऊं विश्वविद्यालय के एकेडेमिक स्टाफ कालेज में चल रहे हिंदी के रिफ्रेशर कोर्स में हिंदी आलोचना पर व्याख्यान देने आये और मेरे

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