विजय सिंह की नई कविताएं : विशेष प्रस्तुति
विजय सिंह अपनी उत्कट लोक प्रतिबद्धता के कारण हिंदी कविता में एक सुपरिचित नाम हैं। उन्हें लिखते कई बरस हुए। उनके
विजय सिंह अपनी उत्कट लोक प्रतिबद्धता के कारण हिंदी कविता में एक सुपरिचित नाम हैं। उन्हें लिखते कई बरस हुए। उनके
कमाल सुरेया (1931-1990) एक दिन स्त्री चल देती है चुपचाप …दबे पाँव कोई स्त्री रिश्तों को निभाने में सहती है बहुत
गिरिराज के यहां कविता एक नाज़ुक विषय है, गो वो अकसर ख़ुद को कठोर कवि कहता पाया जाता है। मैंने पहले
बहुत उम्मीद जगाने, भरोसा बढ़ाने वाले युवा कवि-साथियों में अच्युतानन्द मिश्र का नाम ख़ास तौर पर लिया जाना चाहिए। अनुनाद को
बातों का पुलिंदा सब सच नहीं है, अभिलेखागार के कागजों में, प्रमाण सिर्फ कागज़ का होना है, उसकी बातों का सच
अशोक कुमार पांडेय की ये कविता कल मिली….कई बार पढ़ी। जब कविता अर्थ से अभिप्रायों में चली जाती है तो उसे
कमल जीत चौधरी मेरे इंतज़ारों की कविता – अब तक इस वाक्य का प्रयोग कुछ चुनिन्दा अग्रजों की कवियों की कविता
ये एक नौजवान कवि की कविताएं हैं, जिनमें उसकी उम्र छलकती-सी दीखती है। इतना उत्साह और हर जगह भागीदार होने का
आज कई महीने बाद अपने उचाट सूनेपन में मेरे क़दम अब तक स्थगित रखे गए फेसबुक की ओर बढ़ गए और
रात में इस रात में सितारों जैसे हज़ार हज़ार लोगों से मिलता हूं