
हमर दयाप्त हमर जास छन / हर्ष काफर
पहाड़ का मसाण ऊ मुकूं फाटी दाड़ीम वाई चे रो छी निसवास छी वी आंखम् एक विश्वास छी वी आंखम् उन

पहाड़ का मसाण ऊ मुकूं फाटी दाड़ीम वाई चे रो छी निसवास छी वी आंखम् एक विश्वास छी वी आंखम् उन

बुढ्या ह्वैगी पैली नी जागदी थै माँ अधरातीम मेरा पिताजी बणौंदा था चाहा सुबेर्योंकी दींदा था हम सब्युंक चाहा की प्याली

वोडु वोडु जमीन मां पढ़न सि पैली पड़दू दिलूँ मां अर वै हि वोडो छाप पड़दू जमीन पर अर जब

मोहनि दूर्गून धार* ठंडी बयाल वालि धार उ धार पलतर छिड़ा* मलतर दुरगूण* हूण लागिरौ बिरालू पोथ जै मोहनि दुरगूण।

अहसास चोटी में चढ़ने के बाद नीचे उतरना शायद धरा में खड़े रहने के लिए जरूरी है इसीलिए चोटी अन्त भी

यहीं तो था यहीं तो था अज्ञात कूट संकेतों के अप्रचलित उच्चारणों में गूँजता तुम्हारी मौलिक हँसी का मन्द्र अनुनाद यहीं

(1) ये एक-एक स्त्री संपूर्ण धरती है पूरा गाँव हैं कीकर का फूलों से लदा पेड़ हैं इन्हीं की किसी झुकी

बोधिवृक्ष जब मैंने स्त्री को जाना जैसे छूकर मिट्टी को जाना जैसे छूकर जल को जाना जैसे छूकर अग्नि को जाना

(1) खुरदुरे हाथों वाली पहाड़ी लड़कियां गर्भ में सीख जाती हैं, कितनी कसकर थामनी है दरांती किस गोलाई में समेटनी है

(1) चंद लम्हों का प्यार का मौसम फिर वही इंतज़ार का मौसम एक मौसम वफ़ा का फूलों का इक जफ़ाओं