
कविता


सदा से ही तमाम जीवनों के लिए अपना जीवन जीती रही है इजा/ गिरीश अधिकारी की कविताऍं
लेसू रोटियां उनदिनों जब इजाके पास मडुवा था औरमेरे पास थी एक जि़द कि गेहूँकी ही रोटी खानी है तबपदार्पण

मन इच्छाओं का ज़ख़ीरा है देह उसके लालसाओं के बोझ से दबा मासूम/सुमन शेखर की कविताएं
बिना व्याकरण के बोली जाने वाली भाषा हो तुम तुम इतनी दूर रहीं कि कुछ भी कहा नहीं जा सकता

आकंठ प्रेम में डूब कर तुम्हें ऐसा ही पाती हूं/तुलसी छेत्री की कविताएं
मन के नील हमारे यहां जब शरीर पर नील पड़ जाता है तो कहते हैं डायन खून चूस लेती है

मेरी प्रार्थनाओं की वजह से वह बना रहा ईश्वर/रीना शाही की कविताएं
1 मैंने जब भी उसकी बात की आँखें भर कर की गालों में लाल कोंपलें फूटने तक आवाज़

मिट्टी से रोटी नहीं न बनती खाली चूल्हा बनता है/ इरा श्रीवास्तव की कविताएं
ठूंठ पिता के जाने के बाद उनकी अनुपस्थिति का अहसास सबसे अधिक कही नुमाया हुआ तो वो मां का सूना

मज़दूर के पसीने का बहना ही उसका सबसे बड़ा गहना है!/ राजेश पाठक की कविताऍं
गॉंव की औरतें दौर भले हो ग्लोबल विलेज का पर अब भी भोली हैं गांव की औरतें

अब वे प्रेम के मकबरे बन चुकी हैं/स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताऍं
अगर अगर भोजन करते हुए तुम्हें इस बात की शर्म आए कि दुनिया में करोड़ों लोग भूखे हैं तो समझ

इस हँसी पर कोई बंदिश नहीं लगा सकता/ मनोज शर्मा
आत्मकथ्य जिस रात चौबारे पर उतरी चाँदनी उस गांव में एक नयी किलकारी गूँजी चीन के हमले

सलगादो मारंय्यों की कविताएँ/अनुवाद एवं प्रस्तुति : शुभा द्विवेदी
1 मैं दुल्की चाल से चलते हुए घर पहुँचता हूँघंटों के उपरांत मेरे अतीत के बियाबान के एकमात्र आश्रय स्थल पर