मनोज की कविता पर कुछ नोट्स, जिन्हें शायद कविता होना था ….
मनोज कुमार झा के पहले कविता संग्रह पर इस समीक्षा को कविसाथी अरुण देव ने अपनी ब्लागपत्रिका समालोचन के लिए किसी ज़िद की तरह लिखवाया
मनोज कुमार झा के पहले कविता संग्रह पर इस समीक्षा को कविसाथी अरुण देव ने अपनी ब्लागपत्रिका समालोचन के लिए किसी ज़िद की तरह लिखवाया
मेरे प्रिय समाज-राजनीति-साहित्य शिक्षक अपनी उधेड़बुनों में एक अज्ञानी कई तरह से उलझता है….मैं भी उलझता हूं….अगर ये उलझनें सच्ची हैं तो इनसे बाहर निकालने
अनुनाद पर पिछली दो पोस्ट से प्रेम का एक गुनगुना अहसास-सा बना हुआ है, जो मुझे सुखद लग रहा है…तरह-तरह की हिंसा के बीच। पहले
अग्रज और वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल के प्यारे-से नए कविता संग्रह ‘कभी के बाद अभी’ का शीर्षक बहुत आभार और विश्वास के साथ उधार
विचित्र लेकिन बहुत सुन्दर है आज की, अभी की हिंदी कविता का युवा संसार….कितनी तरह की आवाज़ें हैं इसमें….कितने रंग-रूप…कितने चेहरे…अपार और विकट अनुभव, उतनी
मेरी इस पोस्ट का मक़सद बस इतना है कि इधर लिखी हुई कविताएं सब एक जगह हो जाएं और कभी वक़्ते-ज़रूरत या कहिए कि वक़्ते-ज़ुर्रत
शमशेर बहादुर सिंह बात शुरु करने से पहले एक प्रश्न – क्या शमशेर की कविता ‘कालातीत की कविता’ है और शमशेर सिर्फ ‘कवियों के कवि’
ये हमारे समय के दो महत्वपूर्ण युवा कवि और उनकी कविताएं हैं। कवियों ने इन्हें अलग-अलग समयों, स्थानों और तनाव में सम्भव किया है। गीत
कुमार विकल आज आज़ादी की सालगिरह है। हर कहीं झंडे फहराए जाए रहे हैं। भारतमाता को याद किया जा रहा है। पैंसठ साल की इस
मैं ब्लागिंग की अपनी शुरूआत में काफी सक्रिय रहा…फिर ग़ायब-सा हो गया या कहिए कि होना पड़ा। इस बीच कुछ बहुत सुन्दर और सार्थक कर दिखाने