कुँवर रवीन्द्र : बोध और द्वन्द के सजग शिल्पी – उमाशंकर सिंह परमार
कुंवर रवीन्द्र पर कुछ पहले किसी पत्रिका के लिए मैंने एक लेख लिखा था, जो छपा पर मुझसे कहीं गुम हो गया। अभी मुझे मेलबाक्स
कुंवर रवीन्द्र पर कुछ पहले किसी पत्रिका के लिए मैंने एक लेख लिखा था, जो छपा पर मुझसे कहीं गुम हो गया। अभी मुझे मेलबाक्स
अमित इधर लगातार राजनीतिक क्रूरताओं के बीच फंसी मनुष्यता के आख्यान रच रहा है। उसकी विकट बेचैनी उसके लिखे में गूंजती है। ऐसी बेचैनियों के
हाशिये की आवाजों से भरी मुखर कविता प्रखर पत्रकार व वाम राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठनों से लम्बे समय से सक्रिय रूप से जुड़े आंदोलनधर्मी, प्रतिबद्ध विचारक
13 अप्रैल को लैटिन अमेरिका के 74 वर्षीय विद्रोही रचनाकार पत्रकार एदुआर्दो गेलेआनो का कैंसर से निधन हो गया। भले ही उनकी कर्मभूमि उरुगुए रहा हो पर
संदीप नाइक की कविताएं मुझे उनसे एक फेसबुक संवाद के बीच मिलीं। उनकी पुस्तक ‘नर्मदा घाटी की कहानियां’ अभी अंतिका प्रकाशन से छपी है
कभी हमें ऐसी कविताएं मिलती हैं, जिनसे गुज़रने के अनुभव हमारे अब तक के लिखे-पढ़े को और समृद्ध करते हैं। दीपक तिरुवा की कविताएं, ऐसी
अनुनाद पर पिछली पोस्ट में विजय गौड़ की कविताएं आपने पढ़ीं। मेरे लिए विजय की एक पहचान देहरादून है, गो वे अब कोलकाता में रहते
विजय कई वर्षों से कथा और कविता के प्रदेश के नागरिक हैं। इस ख़ूब विचारवान और अनुभवसम्पन्न साथी की कविताएं बहुत समय बाद अनुनाद को
वीरू सोनकर सोशल मीडिया पर सक्रिय उन नौउम्र कवियों में हैं, जिनकी कविता मैं अकसर उत्सुक के साथ पढ़ता हूं। ये कविताएं मुझसे कहती हैं
गोविंद माथुर के हाल में प्रकाशित कविता संग्रह ‘ नमक की तरह ‘ को पढ़ना एक प्रीतिकर अनुभव है। भारतीय निम्न मध्य वर्ग का एक