मैं चुपके से कहता अपना प्यार: जॉन बर्जर
(महाकवि नाज़िम हिकमत की कालजयी कविता यादवेन्द्र जी के सुन्दर अनुवाद में पढ़ने के बाद बारी है जॉन बर्जर के इस निबंध की. हिकमत की
(महाकवि नाज़िम हिकमत की कालजयी कविता यादवेन्द्र जी के सुन्दर अनुवाद में पढ़ने के बाद बारी है जॉन बर्जर के इस निबंध की. हिकमत की
इस पोस्ट के साथ प्रतिभा कटियार अनुनाद की टीम का हिस्सा बन रही हैं। अनुनाद परिवार की ओर से मैं उनका स्वागत करता हूँ। ब्लॉग
अनुवाद एवं प्रस्तुति : यादवेन्द्र तुर्की के विश्व प्रसिद्द कवि नाज़िम हिक़मत की ये बेहद चर्चित युद्ध विरोधी कविता हिरोशिमा पर अमेरिकी अणु बम गिराए
कुबेरदत्त समकालीन हिन्दी कविता के एक सुपरिचित और आत्मीय सहभागी है। उन्होंने दूरदर्शन के लिए लगातार साहित्य के कई ऐसे कार्यक्रम बनाए हैं, जिन्हें आज
दहशत पारे सी चमक रही है वह मुस्कुराते हुए होंठों के उस हलके दबे कोर को देखो जहाँ से रिस रही है दहशत एक दृश्य
१९६२ में अल्बानिया की राजधानी तिराना में जनमी रीता पेत्रो स्टालिन कालीन साम्यवादी पाबंदियों से मुक्त हुए अल्बानिया की नयी पीढ़ी की एक सशक्त कवियित्री
चम्बा की धूप ——– ठहरो भाई, धूप अभी आएगी इतने आतुर क्यों हो आखिर यह चम्बा की धूप है- एक पहाड़ी गाय- आराम से आएगी.
गर हुए खुशकिस्मत इस जहाँ में हमयुद्ध के मैदान में एक खिड़की आ खड़ी होगी दो सेनाओं के बीच और जब सैनिक झांकेंगे उस खिड़की
हमीं हम हमीं हम रहेंगे जहाँ में हमीं हम हमीं हम ज़मीं आसमाँ में हमीं हम हमीं हम नफीरी ये बाजे नगाड़े ये तासे कि
अग्रज कवि विजय कुमार का नाम समकालीन कविता और कवितालोचना में एक विशिष्ट, महत्वपूर्ण और ज़रूरी नाम है। विजय कुमार जी ने अपने सतत् अनुवादकर्म