
ये कैसी हूक सी उठती है ख़ामोशी के सीने से…आत्मा को मथता आर्तनाद/ जगजीत सिंह पर कौशलेन्द्र सिंह का लेख
स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन में कोई संगीत सुन

स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन में कोई संगीत सुन

मुझे यात्रा संस्मरण बहुत लुभाते हैं। यह, अपने भीतर के उन खाली कोनों को भरने का इलहाम देते हैं, जो भरे नहीं जा सके या

योगेन्द्र पांडेय की कविताएं प्रकृति, प्रेम, सौन्दर्य, आशा-निराशा, जीवन दर्शन के बीच विचरती रहती हैं। समकालीन कविता संसार में ये कविताएं कहीं-कहीं छायावाद और

शैलेन्द्र चौहान की कविताएं वैश्विक स्तर पर व्याप्त विषमताओं से व्याकुल कवि मन को दर्शाती हैं। चारों ओर फैले कुहासे में सूरज की किरण

कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएं पहाड़ की सड़कों की तरह मोड़दार हैं। वैश्विक दृश्यों में चलती हुई, अचानक से संवेदनाओं में लौटती इन कविताओं का

ज्योतिकृष्ण वर्मा की ये कविताएं आकार में छोटी और कहन में बड़ी हैं। हमारे आस-पास के रूपकों को बरतते हुए वे आख्यान के रूप में

अनामिका अनु की कविताओं का स्वर अलहदा है। उनकी एकान्तिक अनुभूतियों में भी एक अलग तरह की सामूहिकता है, जो पाठक को इन कविताओं से

पल्लवी की कविताएं समाज में व्याप्त विसंगतियों,पाखंड से संवेदना भरे मन में होने वाली उथल-पुथल को सामने लाती हैं। इन विसंगतियों से पार पाने के

दोनोँ रचनाओँ की अन्यत्र अस्वीकृति के कारण निम्न हैँ: – महाकवि पिण्टा की अस्वीकृति के कारण इस तरह बताए गए थे –१. विद्वेषपूर्ण रचना –

मैं अपनी शोक सभा का कार्यक्रम सुन रहा था। सुनना ही था; देख तो नहीं सकता था, क्योंकि जमीन पर तो कुछ हो नहीं रहा
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