अनुनाद

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कविता

निशाना लगाउण दी सही जगह नहीं है मनुक्खी देह/ स्‍वामी अंतर नीरव की कविताएं

    बीहड़, अघोर और प्यारे कवि स्वामी अंतर नीरव की नेटिविटी तो क्राॅस फायरिंग के लिए बदनाम इलाक़े पुंछ सेक्टर की है, पर अब

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आलोचना / समीक्षा

पत्‍थर के बिस्‍तरों पर पानी की चादरें हैं। मेरे हिमाल पर अब शानी की चादरें हैं।। / शिरीष कुमार मौर्य

नेत्रसिंह रावत की इस पुस्‍तक से पहला परिचय 1992 में हुआ, यानी इसके प्रकाशन के लगभग दस वर्ष बाद और मेरी ख़ुद की उम्र तब

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आलोचना / समीक्षा

जल, जंगल और ज़मीन का स्वर : कमल जीत चौधरी की कविता में पर्यावरणीय चेतना/बलवान सिंह

सारांश :     कमल जीत चौधरी की कविताओं में जल, जंगल और ज़मीन के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं, जो हमारे समय के

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कविता

और इधर एक स्त्री यादों में खोई गाती रहती है ‘कलकतवा से मोर बलमू अइलें हो राम’/ चन्‍दन कुमार की कविताएं

चन्‍दन कुमार की कविताएं अटपटे सामाजिक बंधनों, दुर्व्‍यवस्‍थाओं और खोखलेपन से लिथड़े  समाज के प्रति अन्‍तर्मन की छटपटाहट को व्‍यक्‍त करती हैं। उत्‍तरआधुनिक हो चले

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कविता

हौले से धूप छुप रही है पहाड़ों की ऊंची चोटियों की ओट में/ निहाल सिंह की कविताएं

बकरी चराती लड़की   धूप उतर जाती है उसके  कपड़ो पर  ओढ़नी बनाकर ढ़क लेती है धूप से अपनी देह को वह ताकि पहाड़ों का

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कविता

घाटी की छोटी-छोटी जलधाराओं ने हमेशा ही रखना चाहा उसके रहवास को जीवित/ हिमांशु विश्‍वकर्मा की कविताएं

       हिमांशु की कविताएं अपने आस-पास बिखरे लोक की भावनाओं को उसी के डिक्‍शन में अभिव्‍यक्‍त करती हैं, जहां कहीं ये कविताएं उस

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कविता

हम कभी इतने रिक्त नहीं होते कि उनकी आवाज़ सुन सकें/ दीप्ति कुशवाह की कविताएं

दीप्ति कुशवाह की ये कविताएं, शोर से बहुत दूर पाठक को अपने भीतर के एकांत में ले जाती हैं। निरन्‍तर बाहर की उलझनों से क्‍लांत

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कहानी

देहरी/ कल्पना जसरोटिया

     कल्पना जसरोटिया की कहानी ‘देहरी’ आज के समय में भी गॉंवों में खेती-मज़दूरी से बसर करने वालों की ख़स्‍ता-हालत, शोषण और अंधविश्‍वासों की

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आलोचना / समीक्षा

इमिग्रेंट – विदेश में युवाओं के संघर्ष की रोचक कथा/ अतुल्य खरे

धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका, और वहाँ रहकर भी सतत

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