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आलोचना / समीक्षा

जल, जंगल और ज़मीन का स्वर : कमल जीत चौधरी की कविता में पर्यावरणीय चेतना/बलवान सिंह

सारांश :     कमल जीत चौधरी की कविताओं में जल, जंगल और ज़मीन के स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं, जो हमारे समय के

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कविता

और इधर एक स्त्री यादों में खोई गाती रहती है ‘कलकतवा से मोर बलमू अइलें हो राम’/ चन्‍दन कुमार की कविताएं

चन्‍दन कुमार की कविताएं अटपटे सामाजिक बंधनों, दुर्व्‍यवस्‍थाओं और खोखलेपन से लिथड़े  समाज के प्रति अन्‍तर्मन की छटपटाहट को व्‍यक्‍त करती हैं। उत्‍तरआधुनिक हो चले

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कविता

हौले से धूप छुप रही है पहाड़ों की ऊंची चोटियों की ओट में/ निहाल सिंह की कविताएं

बकरी चराती लड़की   धूप उतर जाती है उसके  कपड़ो पर  ओढ़नी बनाकर ढ़क लेती है धूप से अपनी देह को वह ताकि पहाड़ों का

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कविता

घाटी की छोटी-छोटी जलधाराओं ने हमेशा ही रखना चाहा उसके रहवास को जीवित/ हिमांशु विश्‍वकर्मा की कविताएं

       हिमांशु की कविताएं अपने आस-पास बिखरे लोक की भावनाओं को उसी के डिक्‍शन में अभिव्‍यक्‍त करती हैं, जहां कहीं ये कविताएं उस

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कविता

हम कभी इतने रिक्त नहीं होते कि उनकी आवाज़ सुन सकें/ दीप्ति कुशवाह की कविताएं

दीप्ति कुशवाह की ये कविताएं, शोर से बहुत दूर पाठक को अपने भीतर के एकांत में ले जाती हैं। निरन्‍तर बाहर की उलझनों से क्‍लांत

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कहानी

देहरी/ कल्पना जसरोटिया

     कल्पना जसरोटिया की कहानी ‘देहरी’ आज के समय में भी गॉंवों में खेती-मज़दूरी से बसर करने वालों की ख़स्‍ता-हालत, शोषण और अंधविश्‍वासों की

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आलोचना / समीक्षा

इमिग्रेंट – विदेश में युवाओं के संघर्ष की रोचक कथा/ अतुल्य खरे

धर्मपाल महेंद्र जैन एक ऐसा व्यक्तित्व हैं जो वतन से दूर रहकर कभी अपनी मिट्टी से दूर न हो सका, और वहाँ रहकर भी सतत

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समाज और संस्कृति

ये कैसी हूक सी उठती है ख़ामोशी के सीने से…आत्मा को मथता आर्तनाद/ जगजीत सिंह पर कौशलेन्द्र सिंह का लेख

स्मृति की रेखाएँ जीवन में जितना पीछे जाती हैं एक धुंधली सी तस्वीर उभरती है, जहाँ किसी यात्रा में मैं वाहन में कोई संगीत सुन

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आलोचना / समीक्षा

मंगलेश डबराल के सहारे अंतर्यात्रा-बहिर्यात्रा / भास्‍कर उप्रेती

मुझे यात्रा संस्मरण बहुत लुभाते हैं। यह, अपने भीतर के उन खाली कोनों को भरने का इलहाम देते हैं, जो भरे नहीं जा सके या

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