अनुनाद

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मेरे समय में रोना

यह कविता प्रतिलिपि में प्रकाशित हुई है तथा पिकासो की यह विख्यात पेंटिंग यहाँ से साभार ! एक बच्चा सड़क पर रोता-रोता जाता थापीछे मुड़कर

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आओ,पर्चे बांटें – लाल्टू की एक कविता

आओ, पर्चे बांटेंआओ, पर्चे बांटेंउन कविताओं केजिन्हें न जाने कब से हमने नहीं लिखाउन सभी ख़तरनाक कविताओं केपर्चे बांटेंजिनमें हैं सभी प्रतिबंधित शब्दहैं जिनमें कोलाहलहै

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अगन बिंब जल भीतर निपजै!

यह कविता पिछले दिनों प्रतिलिपि में यहाँ छपी है। एक क़स्बे मेंबिग बाज़ार की भव्यतम उपस्थिति के बावजूद वह अब तक बची आटे की एक

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काला राक्षस- तुषार धवल की लम्बी कविता और उस पर वीरेन डंगवाल की टिप्पणी

“तुषार धवल की कविता ‘काला राक्षस ‘ को पढ़ते हुए मुझे कई बार मुक्तिबोध– खासकर उनकी ‘अँधेरे में’ की याद आई — और कभी बंगला

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बोधिसत्व की कविता

बोधिसत्व समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। कविता में अपनी शुरूआत उन्होंने आलोचना में कुछ बेहद प्रभावशाली कविताओं से की थी और

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माँ के लिए अपवित्र पंक्तियाँ – किम्फाम सिंह नॉन्गकिनरिः खासी कविता

यह कविता प्रतिलिपि से – गिरिराज किराडू के प्रति आभार के साथ। अनुवादक – तरुण भारतीय आर के नारायन मर गए आज की रात, उदास

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